पाटोत्सव के पद

Radhavallabh Patotsav

श्री राधावल्लभ लाल जी के पाटोत्सव के पद

श्री राधावल्लभ लाल जी कौ पाटोत्सव-कार्तिक सुदी १३ कौ-मंगल छंन

जै जै श्रीहरिवंश व्यास कुल मंडला। रसिक अनन्यन मुख्य गुरु जन भय खंडना ।। श्रीवृन्दावन बास रास रस भूमि जहाँ। क्रीड़त श्यामा स्याम पुलिन मंडल तहाँ ।। पुलिन मंजुल परम पावन त्रिविध तहाँ मारुत वहै। कुंज भवन विचित्र शोभा मदन नित सेवत रहै ॥ तहाँ संतत व्यास नंदन रहत कलुप बिहंडना। जै-जै श्रीहरिवंश व्यास कुल मंडना ॥१॥

जै-जै श्रीहरिवंश चन्द्र उद्दित सदा। द्विज कुल कुमुद प्रकास विपुल सुख संपदा ।। पर उपकार बिचार सुमति जग बिस्तरी। करुणा सिन्धु कृपाल काल भय सब हरी। हरी सब कलिकाल की भय कृपा रूप जु वपु धस्यौ। करत जे अनसहन र्निदक तिनहुँ पै अनुग्रह कस्यौ ।। निरभिमान निर्वैर निरुपम निहकलंक जु सर्वदा। जै जै श्रीहरिवंश चन्द उद्दित सदा ॥२॥

जै-जै श्रीहरिवंश प्रसंसत सब दुनी। सारासार विवेकत कोविद बहु गुनी। गुप्त रीति आचरण प्रगट जब जग दिये। ज्ञान-धर्म-व्रत-कर्म भक्ति किंकर किये ॥ भक्ति हित जे शरण आये द्वन्द दोष जु सब घटे। कमल कर जिन अभय दीने कर्म बन्धन सब कटे ॥ परम सुखद सुशील सुन्दर पाहि स्वामिनि मम धनी ॥ जै जै श्रीहरिवंश प्रसंसत सब दुनी॥३॥

जै-जै श्रीहरिवंश नाम गुण गाइ है। प्रेम लक्षणा भक्ति सुदृढ़ करि पाइ है । अरु बाढ रस रीति प्रीति चित ना टरै। जीति विषम संसार कीरति जग विस्तरै ॥ विस्तरै सब जग बिमल कीरति साधु संगति ना टरै। वास वृन्दाविपिन पावै श्रीराधिकाजू कृपा करें। चतुर जुगल किशोर सेवक दिन प्रसादहि पाइ हैं। जै-जै श्रीहरिवंश नाम गुण गाइ है॥४॥१॥ गो० श्रीसुन्दरवरजू कौ जनम कुवार सुदी पूनो को उत्सब कार्तिक सुदी तेरस कौ-मंगल छंद-राग सूही बिलावल-

जै-जै श्रीसुन्दर वर गुनन गरिष्ट जू। तरुनि मुकट मणि कृपा रहत सुख वृष्टि जू॥ प्रभु रासेस्वरि रवन भई जु सुदृिष्टि जू। मन-क्रम-बच करि सेवत अपने इष्ट जू॥ इष्ट श्रीराधिकावल्लभ ते लड़ाये विधि भली। शरण आये अभय कीने भजन सुख तत्पर अली ॥ गोरंग-पद्धति प्रचुर करता विदित जस सब सृष्टि जू। जै जै श्रीसुन्दर वर गुनन गरिष्ट जू॥१॥ नंदन श्रीवनचन्द साधुता उर भरी। भक्ति तेज जगमगे रहन सब तें खरी ।। मृदु मन सील सुभाव दया मनु सचि धरी। कानन महिमा महत प्रीति सौं आदरी ॥ प्रीति सों आदरी महिमा महत जुगल किशोर की। परम कमनी कुंज क्रीड़ सुघ न जहाँ निसि भोर की। श्रीहरिवंश उदार कीरति सुमुख सुंदर विस्तरी। नन्दन श्रीवनचन्द साधुता उर भरी ॥२॥ आरज गादी बैठि ओप अतिसै दई। जे चरनन अनुसरे कुमति तिनकी गई। हित मारग रस रीति निवाही नित नई। कुल मंडन दुख खंडन अति करुना मई। करुणा कुशल पर हेत लाइक भूषन रसिक सभा महा। सुमति संच्यौ सार दंपति प्रनतपाल कहौं कहा। बरसै अमी वचनावली अति कृपा दृष्टि जहाँ भई। आरज गादी बैठि ओप अति सै दई ॥३॥ वृन्दारन्य अलौकिक सुभ रविजा तटी। तहाँ दंपति दुलरावन रहै मन चटपटी। मुदित विहंग अनेक नाम राधा रटी। जहाँ करें राधालाल सुरत आरंभटी ॥ आरंभटी जहाँ सुरत पुलिन पुनीत बसि लाहौ लियौ। जो रस निगम दुराधि बरन्यौ ता रस सों पूस्यौ हियौ ।। वृन्दावन हित रूप वैभव श्रीसुन्दर वर उर जटी। वृन्दारन्य अलौकिक सुभ रविजा तटी ॥४॥२॥

बधाई-

मधुरितु माधव मास सुहाई। भाग प्रकाश व्यास नंदन मुख फूल्यौ कमल अमल छवि छाई॥ श्रवत मधुर मकरन्द सुयश निज कुंज केलि सौरभ सरसाई। सेवत रसिक अनन्य भ्रमर मन कृष्णदास सुख सार सदाई॥३॥

बधाई-राग सारंग-ताल आड़

आजु कानन रंग बधावनौ। श्रीसुन्दर वर जनम लियौ भयौ जननी जनक मन भावनौ ॥१॥ श्रीवनचंद सुकृत कौ बिरवा उपज्यौ परम सुहावनौ। देत असीस निरखि मुख वनिता चिरुजीवौ कुशरावनौ॥२॥ श्रीहरिवंश सुवन कौ निर्मल सुजस वितान तनावनौ। श्रीराधावल्लभ इष्ट मिष्ट कल कीरति गहकि गवावनौ॥३॥ वंश सबासि साथिये रोपत सबहिनु कौ पहिरावनौ। विप्र सभा बैठे जु तात ढिंग सब सिर तिलक करावनौ ॥४॥ कुलहि ओप दाइक सुख वर्द्धन जोतिस वर्ति बतावनौ। पूरे चौक धरी दीपावली कदली हरखि रुपावनौ ॥५॥कातिक सुदी तेरस सुभ बासर फूलन मंडप छावनौ। श्रीहरिवंश गिरा गरुवतन प्रगट्यौ सुविधि चितावनौ ॥६॥ भवन भीर बरषत पट भूषन एक जात इक आवनौ। वृन्दावन हित रूप अभय कियौ भजन भीख रुचि पावनौ ॥७॥४॥

राग जैतश्री-तालमूल

आजु उदौ है कुल वनचन्द के सुत भयौ भक्ति निकेत ॥टेक ॥ कुल कीरति विस्तारन कमनी देखि वदन छवि जैना। आवौ री मिलि गावो मंगल सुविध सिराने नैना।। रसिक नृपति गादी कौ मंडन धर्म अनन्य निवाहू। श्रीहरिवंश तनय मन हरषित दान देत सब काहू। आरज सबै सिहाने यह दत इष्ट कृपा कौ पायौ। गहकि घुरे सहदाने बंदिनु द्विज कुल सुजस सुनायौ।। वृन्दारन्य तीर रवि तनया गहकि मंदिरला वाजै। बर बस प्रेम उदौ उर सबकैं जै जै वानी राजै ॥ आई मनु प्रानन की थाती प्रभुदित रसिक सजाती। श्रीराधा-पद्धति प्रचार लखि भक्ति धुजा फहराती ॥ सीलवंत गुनवंत कहत है होइ सुख विर्द्धि जु भैसी। वृन्दावन हित रूप चितावत व्यास वंश भई जैसी ॥५॥

राग सोरठ-तालमूल

भैया मंगल को दिन एहा रे। कातिक सुदि तेरस जु सुभ घरी बरषत सुख कौ मेहा रे॥ मंगल गावे दर्वि लुटावें भीजत परम सनेहा रे। आवत जात नारि नर जूथन छवि कौ परतु न छेहा रे। औसौ उदौ प्रेम कौ काहू रही सम्हार न देहा रे। कौन सुकृत कौ उदौ व्यास कै वंश भक्ति कौ तेहा रे ।। देत गुनिन कौं दान रीझि कें कहत लेहु पुनि लेहा रे। विविध भाँति मंगल साजत हैं हिय जिय हित उरझेहा रे ॥ प्रगट प्रकाश जान सुंदर वर जुगल रहसि कहें भैहा’ रे। वृन्दावन हित रूप तात कौ जगमग है रह्यौ ग्रेहा रे॥६॥

राग गौरी-तालमूल

श्रीहरिवंश तनय कुल मंडन। श्रीसुन्दर वर जनम लियौ है प्रनत पाल सबके भ्रम खंडन ॥ कर्मठ कायर कूर ने चलैं तेज नवावैं विमुख प्रचंडन। वृन्दावन हित रूप निवाहैं धर्म अनन्य प्रवल भुज दंडन ॥७॥

राग सारंग-

कार्तिक शुभ तेरस उजियारी। राधावल्लभ नाम प्रगट करि श्रीहरिवंश रीति विस्तारी ॥ मंत्र अर्थ यह नाम धाम वर राजत वृन्दाविपिन बिहारी। नित्य खेल सुख नव निकुंज कौ प्रगट कियौ रसिकन हितकारी ॥ नित्यसिद्ध ललितादिक सेवत तिहीं भाँति सेवा अनुसारी। राजभोग जुत समय-समय हित असन वसन सिज्जा मनुहारी ॥ रास विलास प्रकाश किये बहु श्रीहरिवंश कृपा चित धारी। सब उत्सवन तिलक उत्सव यह जै श्रीकमलनैन हित चित जु महारी॥८॥

राग सारंग-

कार्तिक सुदि तेरस सुखदाई। पाट महोत्सव राधावर कौ हित जु करी बधाई॥ ताही दिन वनमालीजी कौ तिलक कियौ शुभ माईआश्विन पून्यौं सुन्दर प्रगटे इहाँ बधाई गाई। प्रभु कौ बूँदी मठरी बहुविध बीरी देत बनाई। जे श्रीहित ब्रजलाल कुंज मंडल पर भोग प्रसाद बटाई॥९॥

राग सारंग-

बैठे गुरु गादी वनचन्द। राधा-पद्धति प्रचुर करन कौ रसिक नृपति कुल नंद ॥ प्रणत पाल करुणा रस आलय दैन अखिल आनंद। कनक मेरु सम गुण गरुवतन रस उद्धारक छन्द॥ भक्ति-तेज मनु ढिपत दिवाकर तिमिर हरन जग बन्द। दरसायौ हित पंथ दुहेलौ काटे हिय के फन्द ॥ आसै उदभि पार कौ पावै जुगल रहसि रस कन्द। दसधा भक्ति प्रकाश चहूँ दिसि कीनौं रसिक नरिन्द॥ रसिक जनन रस दान द्रवत मुख कमल भजन मकरंद । वृन्दावन हित रूप जाऊँ बलि नीरस कीन्हे मन्द ॥१०॥

पद-

आजु बधाई सबनु सुहाई श्रीहरिवंश सुधाम। प्रगट भये श्रीराधावल्लभ रसिक जनन विश्राम ॥ कार्तिक सुदि तेरस उजियारी हिय मधि प्रिया विचारी। रसिक जनन पद्धति थापन हित कुंज-केलि विस्तारी ॥ श्रीहितजू करि अभिषेक दुहुँन कौ पट्ट महोत्सव कीन्हों। लै पधरायौ निज प्राणन प्रिय रसिकन आनँद दीन्हों॥ गादी प्रिया थापि बाईं दिसि सेवा सुख विस्तारयौ। सात भोग अरु पाँच आरती रीति कुंज हिय धास्यौ । सखी भाव निज प्रगट कियौ जग सब जीवन सुखदाई। तत्सुख सेवा लाड़ चाव नित प्रीतम दई सेवकाई॥११॥