मंगल विदित अवनि श्रीमोहन नाम कौ। श्रीहरिवंश तनय अति मति अभिराम कौ । कहा विशेखौं भाग वास नित धाम कौ। मन-क्रम-वच नित सेवन स्यामा स्याम कौ। सेवत जु स्यामा स्याम निरखत कुंज विवि छवि माधुरी। लोकेश तरसत जहाँ कौं सुपने न यह वैभव फुरी।। रसना लड़ावत हरषि लहि सुख लवधि आठौ जाम कौ। मंगल विदित अवनि श्रीमोहन नाम कौ ॥१॥
जै जै श्रीहरिवंश आतमज अतिलड़े। तजी न वन की सींव कुंज कौतुक अड़े ॥ मन जु मानसिक टहल महल कमनी जहाँ। सुख दै रुख लै प्रिया रजत सिज्या तहाँ ।। सिज्या रचत हित अली आज्ञा पाइ प्रफुलित बदन है। क्रीड़त जु राधा रसिक कौतिक मय अलौकिक सदन है।॥ श्रीव्याससुबन प्रसाद उर अभिलाष जहाँ भरियत बड़े। जै जै श्रीहरिवंश आतमज अति लड़े ॥२॥
जै-जै हित जस वर्द्धन जन मन भावने। पिय-प्यारी हिय हिलग भाव दरसावने ।। पद्धति रासेश्वरी सदा सुख बरसने। भजन जजन अति कोविद हिय जिय हरसने ।। हरसने हिय सदा सादर इष्ट पद आराधने। आरज दिखायौ पंथ सुचि रुचि सोई साधन साधने ॥ गिरा श्रीहरिवंश की छकि प्रेम सों गुन गावने। जै-जै हित जस वर्द्धन जन मन भावने ॥३॥
जै-जै श्रीमोहनलाल प्रीति प्रभु पद खरी। श्रीहरिवंश सु दृष्टि भक्ति उर बर भरी। आसय गहर गंभीर रीति रस आगरी। जिन हित करुना ढरी तरुनि मणि नागरी ॥ नागरी करुनासिंधु हित नाते जु मन लरजै महा। प्रेम रूपी विपिन संपति दई सो बरनों कहा। वृन्दावन हित रूप कीरति व्यास कुल की विस्तरी। जै-जै श्रीमोहनलाल प्रीति प्रभु पद खरी ॥४॥९॥