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Padawali Utsav

होरी धमार के पद

  • November 28, 2025
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होरी धमार के पद
अथ होरी धमार के पद

माघ सुदी पूर्णमासी से प्रारम्भ-फागुन सुदी पूर्णमासी
( श्रृंखला)  – गो० श्रीहितहरिवंशचन्द्र महाप्रभुजी कृत-राग गौरी (यह पद नित्य होय है)।

प्रथम यथामति प्रणउँ श्रीवृन्दावन अति रम्य । श्रीराधिका | कृपा बिनु सबके मनन अगम्य ॥ १ ॥ वर यमुना जल सींचन दिन ही शरद बसन्त । विबिध भाँति सुमनस के सौरभ अलि कुल मन्त॥२॥ अरुण नूत पल्लव पर कूजत कोकिल कीर । निर्त्तन करत शिखी कुल अति आनन्द अधीर ॥ ३ ॥ बहत वन रुचिदायक शीतल मन्द सुगन्ध । अरुण नील सित नुकुलित जहाँ तहाँ पूषनबन्धु ॥४॥ अति कमनीय विराजत मन्दिर नवल निकुंज। सेबत सगन प्रीत जुत दिन मीनध्वज पुंज ॥५॥ रसिक रासि जहाँ खेलत श्यामा स्याम किशोर । उभय बाहु परिरंजित उठे उनींदे भोर ॥६॥ कनक कपिस पट शोभित सुभग साँवरे अंग । नील बसन कामिनि उर कंचुकी कँसूभी सुरंग ॥७॥ ताल रबाब मुरज डफ बाजत मधुर मृदंग । सरस उकत गति सूचत वर बँसुरी मुख चंग ॥८ ॥ दोऊ मिलि चाँचर गाबत गौरी राग अलाप। मानस मृग बल बेधत भृकुटी धनुष दूग चाँप ॥९॥ दोउ कर तारिन पटकत लटकत इत उत जात। हो-हो-होरी बोलत अति आनन्द कुलकात ॥ १० ॥ रसिक लाल पर मेलत कामिनि बन्दन धूरि । पिय पिचकारिनु छिरकत तकि-तकि कुमकुम पूरि॥११॥

कबहुँ-कबहुँ चन्दन तरु निर्मित तरल हिंडोल। चढ़ि दोऊ जन झूलत फूलत
करत कलोल ॥ १२ ॥ वर हिंडोर झकोरन कामिनि अधिक निर्मित तरल हिंडोल। चढ़ि दोऊ जन झूलत फूलत पुलकि-पुलकि बेपथ अँग प्रीतम उर लपटात॥१३॥ हित चिन्तक निज चेरिनु उर आनन्द न समात। निरखि निपट नैनन सुख तृण तोरत बलि जात||१४|| अति उदार विवि सुन्दर सुरत सूर सुकुमार। जय श्रीहित हरिवंश करौ दिन दोऊ अचल बिहार ॥ १५ ॥

श्रीगोविन्द स्वामीजी कृत – राग गौरी – होरी डाँड़ौ – माघ सुदी पूनौ

रितु बसन्त सुख खेलिये हो आयौ फागुन मास । होरी डाँड़ौ रोपियो सब ब्रज जन हिये हुलास ॥ १ ॥ गोकुल के राजा ॥ टेक ॥ रजनी मुख हरि आइयौ हो गोधन खिरक निवारि । सखा नाम लै लै बोलियौ हो घर घर दै सब गारि ॥ गोकुल० ॥२॥ बड़े गोप वृषभान के हो सब मिलि आये पौरि। श्रवन सुनत प्यारी राधिका हो चढ़ी अटा पै दौरि ॥ गोकुल० ॥३॥ उझकि झरोखा झाँकियौ हो दुहुँअन मन आनन्द। औसी छवि तब लागही मनु निकस्यौ घटा मधि चन्द || गोकुल० ॥४॥ नर नारी एकत भये हो घोषराइ दरबार । सब सनमुख ह्वै दौरहीं, नहिं भूषन बसन सम्हार ॥ गोकुल० ॥५॥ वासर खेल मचाइयो हो नियरें आयौ फाग। भूमक चैत व गावहीं मनमोहन गौरी राग ॥ गोकुल० ॥६॥ अगनित बाजे बाजहीं हो रुंज मुरज नीसान। डफ दुन्दुभि अरु झालरी पै कव न सुनियत कान॥ गोकुल० ॥७॥ पिचकारी कर कनक की हो सौंधे अरगजा घोर। प्रान प्रिया कौं छिरकहीं हो तकि तकि नवल किशोर ॥ गोकुल० ॥८॥ बहुरि सखा सनमुख
भये हो बल मोहन लै संग। प्रमदागन पर बरषहीं हो उड़त गुलाल सुरंग ॥ गोकुल० ॥ ९ ॥ ललित विसाखा मतौ मत्यौ हो लीने सुबल बुलाइ। चेरी तेरे बाप की नेंक गिरधर कौं पकराइ॥ गोकुल०॥१०॥ तबहि सुबल कूटक रच्यो हो सुनहु सखा इक बात। इनकौं भीतर जान दै नेकु बोलत जसुमति मात॥ गोकुल० ॥११॥ हरे-हरें सब रिंग चलीं हो निया पहुँचीं आइ। सबै सैंन दै दौरहीं हो मोहन पकरे धाड़ || गोकुल० ॥१२॥ प्यारी कौ अंचल लियौ हो अरु पिय को पट पीत। सुकृतन’ गठजोरौ कियौ हो भले मिले दोऊ मीत।। गोकुल० ॥१३॥ फगुवा में मुरली लई हो अरु उर कौ लियो हार। प्यारी राधा कों पहिराइ कैं हो हँसि कर देत हैं तार ॥ गोकुल० ॥१४॥ मेवा बहुत मँगाइयौ हो फगुवा दियौ निबेरि। नैनन काजर आँजि कैं हो हँसत वदन तन हेर ॥ गोकुल० ॥ १५ ॥ इहि बिधि होरी खेलहीं हो ब्रजवासी संग लगाइ। जुगल कुँवर के रूप पै हो जन गोबिन्द बलि बलि जाइ ॥ गोकुल० ॥ १६॥

श्रीभगवानदासजी कृत-राग विहागरौ (फागुन बदी १ परवा कौ)

अहो, रंग हो-हो-हो-हो होरी खेलै लाड़िलौ ब्रजराज कौ। साँवरे गात कमल दल लोचन नाइक प्रेम समाज कौ ॥ १ ॥ प्रथमहिं रितु बसन्त बिलसे हुलसे होरी डाँड़ौ रोप्यो। मानों फाग प्रान जीवन धन आनन्दन सब ब्रज ओप्यौ ॥२॥ | मृगमद मलय कपूर अगर केसर ब्रजपति बहु जोर धरे। सरस सुगन्ध सँवारि संग दे रंगन कंचन कलस भरे॥३॥ प्रेम भरी खिलरावन के हित सुख कौ सार सिंगार किया। भाग अपार जसोमति मैया बार बार जल वारि पियौ ॥४॥ फेंट भराइ लई जननी पै आज्ञा लई ब्रज ईस सौं। नन्दराइ तब रतन पेच’ रचि बाँध्यौ गिरधर सीस सौं॥५ ॥ तापर मोर चन्द्रिका सोभित ग्रीव डुलन लहकात है। मदन जीत कौ बानों मानौं रूप ध्वजा फहरात है ॥६॥ भई रँगीली भीर दुवारें प्रीतम दरसन कारनें। अब बन ठनि निकसे मन्दिर तें कोटि काम किये वारनें ॥७॥ तैसेई सखा संग रंग भीने हरखि परस्पर मन मोहैं। बरन बरन ज्योति के कमल मानौं अमृत दिनमणि संग सोहैं ॥ ८ ॥ आनन्द भरि बाजे बाजत नाचत मधुमंगल रंग कियौ । हरि की हँसन दसनन की किरन नैनन की दुरन मन मोह लियौ ॥९॥ अबीर गुलाल उड़ाइ चले खेलत जैसें सब कोऊ हरषै। छिरकत भरत छैल नवरंगी कहा कहियै रस घन बरपैं ॥ १० ॥ कोउ द्वारन कोउ चढ़ी अटारिन कोऊ खिरकिन बदन सुहाये। गोकुल चन्द्रमा देखन कौं मनौं इन्दु विमानन चढ़ि आये॥११॥ श्रीराधाजू दृष्टि परत ही मोहन फूलि फूलि नैंनन घूम्यौ। सनमुख ह्वै पिय कलप तरोवर महाभाग फल रस भूम्यौ ॥१२॥ प्रमदागनमणि स्यामा रसिक सिरोमणि साँ खेलन आई। दुहुँ दिसि सोभा उमँगि रंग मच्यौ गान बेनु धुन धुनि लाई॥१३॥ नैनन बैनन खेल मच्यौ गैंदुक नवलासिन भार मची। कमलनेंन कर लई पिचकारी मृगनैनिन की भौंह नची ॥१४॥ छिरकीं छैल छबीली भाँतिन मनहरनी जोबन वारी। रँग रँग छींट बनी तिय बसनन फूल रही छबि फुलवारी॥१५॥ पुहुप पराग उड़ाइ दाइ रचि अछन-अछन नियरें आईं। दौरि दामिनिनु घन घेरयौ पिय बात बनी सब मन भाई ॥१६॥ कोउ मुख माड़त दै गरबहियाँ कोऊ पौंछत आछी छबि सौं। अलकन’ भौंहन मूल रंग रह्यौ शोभा कही न जाइ कवि सौं ॥ १७॥ कोऊ रचि पान खबावत पुलकित सुन्दर अधरन परस कियें। कोऊ भुज गहि लड़काइ फाग माँगत पिय नैंनन चैंन दियें ॥ १८ ॥ (श्री) राधाजू नागर स्याम सुन्दर पर प्रीत उमग केसर ढोरी। महा मनोहरता कौ राज अभिषेक कियौ कहि हो होरी ॥ १९ ॥ सरसुती सहित महामुनि मोहे यह सोभा सम्पति हेरें । कहि भगवान हित रामराय प्रभु हँसि चितवन बसि जिय मेरें ॥ २० ॥

श्रीसूरदास मदनमोहनजी कृत-राग गौरी (फागुन बदी दोज कौ)

खेलत हैं हरि हो हो होरी। ब्रज तरुनी रस सिन्धु झकोरी ॥१॥ बाला वैसन्धी नव तरुनी। जोवन भरी चपल दृग हरनी॥२॥ नवसत करि गृह-गृह तें निकसीं । मानहु कमल कली सी विकसीं ॥३॥ पिक बचनी तन चम्पक बरनी। उपमा कौं नहिं मनसिज घरनी॥४॥ बरन बरन कंचुकी अरु सारी। मानहुँ काम रची फुलवारी ॥५॥ द्वादस अभरन सजि कंचन तन। मुख ससि आभूषन तारा गन॥६॥ मन मनोभव मनतें कीनी। अरु त्रिभुवन की सोभा दीनी ॥७॥

देखत दृष्टि छिन न ठहराई। जनु जल झलमलात रवि छाई ॥८॥ ताल मृदंग उपंग बजावत। डफ आबझ स्वर एक सजावत॥९॥ मधुरितु कुसुमित वन नव न्यौरी । गाबत फाग राग रति गौरी ॥ १० ॥ आईं सबै नन्दजू के द्वारें । अगनित कलश सुगन्ध सँवारें ॥११॥ भूम-झूम झूमक सब गाबत । नमित’ भेद दुहुँ दिसि तें आबत ॥ १२॥ रस सागर उमग्यौ न समाई। मानहुँ लहर दुहूँ दिसि आई ॥ १३ ॥ खोर खिरक गिरि जहाँ ही पावैं। धाइ जाइ ताही गहि ल्यावैं ॥ १४ ॥ कर छाँड़त अपनौं मन भायौ। उड़त गुलाल सकल नभ छायौ ॥ १५ ॥ मोहन आइ द्वार है झाँके । दूर भये तें जुवतिनु ताके ॥ १६ ॥ एकहि बेर सबै जुरि धाईं । पौरि तोर मन्दिर में आईं ॥१७॥ माहन गहत गहत छुटि भागे। पीताम्बर तजि भये तन नागे ॥१८॥ दौर अटा चढ़ि दई दिखाई। मानौं स्याम घटा जुर आई ॥१९॥ सुन्दर स्याम नगन तन राजैं। गिरा गंभीर मेघ लौं गाजैं॥२०॥ टेर टेर पीताम्बर मागें । गोपी कहैं आइ लेहु आगें ॥२१॥ पीताम्बर राधिकाहि उढ़ायौ। हरि जू निरखि परम सुख पायौ ॥२२॥ पीताम्बर हू सोभा पाई। घन तजि दामिनि खेलन आई॥२३॥ तबहिं अरगजा स्याम मँगायौ । अपने करवर घोर बनायौ ॥२४॥ ऊँचे चढ़ि घन लौं बरसायौ । धाराधर जनौं ऊनै आयौ ॥ २५ ॥ तब इन जसुमति ठाड़ी पाई। सौंधै गागर सिर तें नाई॥२६॥ उततें निरखि रोहिनी धाई। बिच ठाड़ी है महरि बचाई॥२७॥ आँगन भीर भई अति भारी। जसुमति देत दिबावत गारी ॥२८॥ गोपिन नन्द दुरे गहि काढ़े। कंचन गिरि से आगें ठाढ़े ॥ २९॥ जनौं जुवती ऐरावत। ल्याईं। पूजत हँसत गौरि की नाईं ॥ ३० ॥ जसुमति मानौं गौरा गौरी। छिरकत चन्दन बन्दन रोरी ॥ ३१ ॥ पूजि पूजि माँगत मोहन। बिनु पाये छाँड़त नहिं गोहन ॥३२॥ एक कहत मोहनहिं बतावहु। तब तुम हमपै छूटन पावहु ||३३|| एक सिखावत एक बचावत। तारी दै दै एक नचावत ||३४|| एक हैं कर फगुवा मागें। एक नैंन काजर दै भागें ॥ ३५ ॥ बसन अभूषन नन्द मँगाये। दिये सबन जैसे जिहिं भाये ॥ ३६ ॥ देत असीस चलीं ब्रजबाला । जुग जुग राज करौ नँदलाला ॥३७॥ मदन मोहन पिय के गुन गावै। सूरदास चरनन रज पावै ॥३८॥

श्रीमाधुरीदासजी कृत-राग धनाश्री-फागुन बदी तीज कौ-

हो-हो होरी बोलहीं नवल कुँवर मिलि खेलहिं फाग । आगम सुनि रितुराज कौ प्रगट्यौ मन कौ अति अनुराग ॥१॥ बरस दिवस लागी रहै या सुख की आशा जिय माहिं। जो क्यौंहूँ बिधना रचै सबै द्यौस होरी है जाहिं ॥२॥ अति हुलास हिय में बढ्यौ अब कापै यह रोक्यौ जाइ। उमड़ि चल्यौ रस सिन्धु ज्यों अपनी मरजादा बिसराई॥३॥ सुबल सुबाहु सखा सबै जोरि लियौ सब संग समाज। अपने अपने तें करि निकसे खेलन कौ साज ॥४॥ एक दिगम्बर रूप धरें नख सिख अंग भभूत लगाइ। एक कोऊ कामिनि है। चले दुहुँन की गाँठ जुराइ ॥ ५ ॥ एक सखा हो-हो करैं एक करें कछु उलटी रीत। मधुमंगल नाचत चल्यौ गावत फागुन के गीत ॥ ६ ॥ ताल पखावज बाजहीं बाजत रुंज मुरज सहनाइ । डफ दुन्दुभी अरु झालरी रह्यौ कुलाहल सौं ब्रज छाइ ॥ ७ ॥ सैंनन ही में साँवरे कह्यौ सबन सौं यों समुझाइ । आज भैया या साज सौं खेलैं बरसाने में जाइ ॥ ८ ॥ आये वट संकेत में तब कीनी मुरली की घोर । श्रवन सुनत प्यारी राधिका चौंक परी चित रह्यौ न ठौर ॥९॥ निकसीं संग समाज लै खेलन कौ सब साज बनाइ । पावस की सरिता मनौं उमगी रस सागर कौं धाइ ॥ १० ॥ एकन कर गेंदुक सोहैं एकन नवलासी’ बहु रंग। झुण्डन मिलि गावत चलीं झोलिन भरे गुलाल सुरंग ॥११॥ सुरमण्डल अरु सारंगी सुरबीना बीना बहु संग। मधुर मधुर स्वर बाजहीं मदन भेरि मुँह चंग उपग ।।१२।। आइ प्रिया पहुँची तहाँ खेलत हैं प्रीतम जिहिं ठौर। मदन खेत संकेत में रुपे सूर सनमुख दुहुँ ओर ॥१३॥ विबिध भाँति कुसुमन गुहीं पहिलें गेंदुक दई चलाइ । मानहुँ रस संग्राम के आगें दिये बसीठ पठाइ ॥१४॥ पिय पिचकारी पूरि कें दई प्रिया उर ऊपर तान। अगर अरगजा घोरि कैं मुख सौंधौ लपटायौ आन॥१५॥ छिरकत हैं चहूँ ओर तें मनहुँ मेघ उमड़े जल रासि । गौर घटा अरु साँवरी परषत केशर नीर सुवास ॥१६॥ सब सखियन मिलि स्याम कौं दीनौं लाल गुलाल उड़ाई। दुरि पाछें हैं घात सौं गहे कुँवर मन मोहन आइ ॥ १७॥ एकन कर गाढे गहे एक बनावत कपोल। एक निडर ऑजन लगी नैन कमल दल परम सलोल ॥ १८ ॥ एकन मुरली हरि लीनी एकन उतार। नव केसर मुख माँड़ि के एक नाचत दै-दै करतार ॥११॥ इक सनमुख मुख चाहहीं एक कहत कर चिबुक उठाई। बहुत दिनन तें आजु हीं अब बस परे हमारे आइ ॥ २० ॥ इक बैनन गारी गावहीं एक कहत सैनन मुसिकाइ । बहुत कहाबत हौ आपुन आजु बदौं जो जाहु छुड़ाइ ॥ २१ ॥ दये सबन मिलि स्याम के केसर कलश सीस तें ढार। एकन गहि गूँथी बैनी एक बनावत माँग सँवार॥ २२ ॥ तनसुख की सारी झीनीं अरु लीनी सौंधे सौं सान। मृगमद केसर बोरि कैं प्रीतम कौं पहिराई आन॥२३॥ उर ऊपर कंचुकी कसी पहिरायौ मोतिन कौ हार। नूपुर कंकन किंकिनी नख सिख भूषन सजे सिंगार ॥ २४ ॥ कर पर कर धर लै चलीं बैठारी प्यारी ढिंग जाइ । आई नई यह सहचरी चाहत है देखन कौं पाँइ ॥२५॥ अति प्रवीन गुन आगरी बीन बजावत परम अनूप। सेवा अंग सिंगार कौं सुघर सखी साँवरे सरूप॥२६॥ उतकण्ठा तुव मिलन की लगी रहत पाके जिय माहिं। हँसि भेटौ दोऊ अंक भरि जैसें तन मन नैंन सिराहिं ॥ २७॥ अति आनन्द हुलास मिलीं सखी दोऊ भरि अँकवार। जब जान्यौं यह भेद कछु रही सकुचि मुसिकाइ निहार ॥ २८ ॥ जो आनन्द उर में बढ्यो इक रसना बरन्यौ क्यों जाइ। दिन दिन यह सुख दुहुन का
निरखि माधुरी नैन सिराइ ॥ २९ ॥

श्रीआसकरनजी कृत-राग धनाश्री-फागुन बदी चौथ (४)
कौ

या गोकुल के चौहटे। रंग राची ग्वाल ॥ मोहन खेलत फाग। नैन सलौंन री, रँग राची ग्वाल ॥ नर नारी आनन्द भयौ। रँग राची ग्वाल ॥ खेलन को अनुराग । नैंन सलौंन री रंग राची ग्वाल ॥१॥ उमहे मानस घोष के रंग० ॥ भवन रह्यौ नहि कोइ॥ नैन०॥ दुन्दुभि बाजै गहगही ॥ रंग० ॥ नगर कुलाहल होइ। नैन० ॥२॥ डफ बाँसुरी सुहावनी | रंग० ॥ ताल मृदंग उपंग ॥ नैन० ॥ झाँझ झालरी किन्नरी ॥ रंग० ॥ आबझ वर मुख चंग ॥ नैन० ॥३॥ इतहि संग गोपाल के रंग० ॥ बल’ जुत नन्द कुमार। नैन०॥ उत गोपी नव जोवनी ॥ रंग० ॥ अम्बुज लोचन चारु ॥ नैन० ॥४॥ चोबा चन्दन अरगजा । रंग० ॥ चरचे चित्र सुठान ॥ नैन० ॥ केसू कुसुम निचोर कें ॥ रंग० ॥ भरत परस्पर आन । नैन० ॥५॥ गारी दैहि सुहावनी ॥ रंग० ॥ गावत मदन बिडम्ब ॥नैन०॥ करतल ताल बजावहीं ॥ रंग० ॥ प्रमुदित गोप कदम्ब ॥नैन०॥६॥ पिचकारी कर कनक की। रंग० ॥ कर गहि गोकुल नाथ। नैन०॥ तकि छिरकें तिय वृन्द कों। रंग०॥ जे राधा के साथ॥७॥ नैन०॥ अबीर गुलाल उड़ावहीं ॥ रंग० ॥ धूका बन्दन धूल ॥ नैन० ॥ चढ़ि बिमान सुर देखही ॥ रंग० ॥ देह दशा गई भूल ॥८॥ नैन० ॥ श्रीराधाजू के हेत तें ॥ रंग० ॥ मोहन करैं विनोद ॥ नैन०॥ वृन्दावन ब्रज लोक में। रंग०॥ उपजत है मन मोद॥९॥ नैन० ॥ युगलकिशोर कौ विहरबौ ॥ रंग०॥ कहत सुनत सुख पाइ ॥ नै० ॥ राधा रसिक रसज्ञ की। रंग राची० ॥ आस करन बलि जाइ।। नैन सलौन री, रंग राची ग्वाल ॥१०॥ |

श्रीगदाधर भट्टजी कृत-राग काफी-फागुन बदी पंचमी (५) कौ

गोकुल राजकुमार लाल रंग भीने हैं। खेलत डोलत फाग सखा संग लीने हैं ॥१॥ वेष विचित्र सुवयस सबै अनुकूले हैं। राजत रंग बिरंग सरोज से फूले हैं ॥२॥ एकन के कर कंचनजेरी’ जराय’ की। एकन पै पिचकारी हेम भराय की ॥३॥ कुंकुम घोर भरे घट हाटक के घने। पंकज पुंज पराग मृगामद सों सने॥४॥ ढोलक ढोल निसान मुरज डफ बाजहीं। मैन के मेघ मनौं रस वृष्टि सौं गाजहीं ॥५॥ सुन-सुन धुनि अकुलाइ चलीं ब्रज नागरी । एक तें एक सबै गुन रूप की आगरी ॥६॥ राधा के संग सुहाईं अनेक सहेली हैं। काम के कानन की मनौं कंचन बेली हैं । ७ । वेष बनाइ जेती-केती की बात न जात बखानी हैं। जेती- केती उपमा मन में बिलखानी हैं ॥८॥ कोकिल कूर कहा सुर भेदहि जानहीं। कुंजर कायर कौन कहा गति ठानहीं ॥९॥ केरन कौ जु सुभाव पर्यो अति कम्प कौ। हेम लियौ हठ नेम सपावक झम्प’ कौ ॥ १० ॥ खंजन खंज” से लागि रहे गति लास तें। केहरि कन्दर-मन्दिर में दुश्यौ त्रास तें ॥११॥ पंकज पंक मूल रहे छबि लाज तें। नित्य प्रकाश बिलास मिट्या द्विजराज ते ॥१२॥ ताल पखावज आबझ बाजे बजन्त गान मनोहर मोहन मैन के मन्त्र हैं ॥ १३ ॥ सो इतकी उतकी धुनि लागे सुहाई है। मानौं अनंग के आँगन बाजे बधाई है॥१४॥ गोकुल खोरिन गोरिन खेल मचाया है। रंग सुरंग अबीर सौं अम्बर’ छायौ है ॥ १५॥ लाल गुलाल की धूंधर में मुख यों लसै । प्रात पतंग प्रभा बिच कंचन कंज से ॥१६॥ दृष्टि करी पिचकारी भरी अनुराग सौं। जाइ लगी ब्रजराज लला बड़ भाग सौं॥१७॥ मंजुल हास कपूर की धूर उड़ावहीं। सुन्दर स्याम सुजान के नैन जुड़ावहीं ॥ १८ ॥ गावत गारिन नारि सबै झुकि प्रीत की। बात बनावत आपनी-अपनी जीत की ॥ १९॥ आइ घिरीं अबला सब लाल गुपाल सौं। हेमलता * लपटीं मनौं स्याम तमाल सौं॥२०॥ कोऊ गहै पट पीत कोऊ बनदाम कौं। एक निसंक है अंक भरैं घनस्याम कौं॥२१॥ स्याम के सीस तें स्यामाजू केसर ढोरी है। दै करतारी कहैं सब हो-हो होरी है ॥२२॥ ऐसौई ध्यान सदा हरि कौ हिय जो रहै। तौपै गदाधर ताके भागहिं को कहै ॥२३॥

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