उजियारी के पद
गो० श्रीरूपलालजी कृत-राग केदारौ-ताल चौतालौ
पद-
वदन बिध जोति उज्यारी निरखत लाल बिहारी।
रूप अनूपम वेली अंग-अंग अमी रस फूली मैन फुलवारी॥
मन मधुकर सुहाग सौरभ छकि सेवत अनुदिन अद्भुत आनंद वारी।
जै श्रीरूपलाल अवलोकत इक टक रंध्रन सुध बुध सबै विसारी ॥१॥
चाचा श्रीवृन्दावनदासजी कृत-पद-ताल ध्रुपद
रही शरद छ्या छाइ बिहरत वन रसिक राइ जहाँ तहाँ जगमगाइ प्रिया कौं दिखावैं। सरसिनु कुमुदिन प्रकास फैलि रही भुव सुवास मनु अनंग दत्त त्रिविध पवन चल्यौ आवै।। अहो मंद गवन भाम कौतिक मय यह सुधाम कैसी तरु बेलिनु कौ लसन गसन भावै। बीच-बीच पत्र छाँह चाँदनी प्रकास माहिं चित्रकारी रची मानौं अवनि छवि बढ़ावैं ॥ कुंज शिखर वल्लव नव अरुन-अरुन शोभित सब ओस कनी शशि की किरन मिलि दुति दरसावैं। बलि-बलि वृन्दावन हित रूप बन बिहार चारु दम्पति को धाम-धाम दम्पति दुलरावैं॥२॥
पद-
सुनि मोह्यौ मन लाल हो, अस गोरी गाई रस भरी। बिहँसि-बिहँसि तानैं लई सब विद्या कोविद वाल हो॥ अस०॥ हौं बलि अब पूरन करौ हो ज्यौं सचेत पियु होइ। रवकि प्रिया भुज भरि लये जागे मनु रजनी सोइ हो ।। अचंल पवन करत सखी प्यारी मुख वीरी देत। मन घूमत रसना दरस नागरि गहि अंगन लेत हो । चित चेते नागर जबहि चितये तब लोचन कोर। वृन्दावन हित रूप बलि कछु प्रीतम प्रीति न ओर हो ॥३॥
पद-
भूरि सुहागिनि प्यारी राधिका लाल रसिक मनि राइ। रजधानी जाकी हो वृन्दारण्य में सम्पति बरनी न जाइ ॥ पलक हानि नहिं हो प्रीतम सहि सकें वीधे गाढे प्रेम। मानौं लपटी हो ललित तमाल सौं कोमल बेली हेम।। इहि धर उपजत हो गरुवौ रूप रस यही बिहार अहार। सागर भरियत हो साँवल गौर द्वै नाहिंन तिनकौ पार॥ सजनी पीवत हो नैनन ओक करि तजत न पल छिन याम। मूरति मानौं हो दम्पति लाड़ की तकत रहत रति धाम ॥ जीतन सुरत रन हो नागर-नागरी धरे हैं सेहरे सीस। परम विचक्षन हो रसिकानन्द ये कानन कमनी ईस ॥ संध्या फूली हो तामें जगमगत ये आनन विवि चंद। यह रविजा तट हो अतिसय रन्य लखि बिनुमित जहँ आनंद ।। निकसि कुंज तें हो आवत लाड़िली करनी की मल्हकन अंग। लाल दुलरावत हो कछु इक दृष्टि कौं हो समझत सब ढंग ।। मुसिकन बरषत हो कृपा उदार है कछू चिते मो ओर। रहसि बधाई हो में ताछिन दई जैसे देत हो भोर ॥ चतुर मुदित भये हो मो सनमान लहि आनि • दिखाये फूल। रसिक जु बलि गई हो हौं हित रूप इहि भये ■ हो टहल अनुकूल ॥ रवकि लये हैं हो कुसम जु गोद ते ■ धन्य-धन्य मुख भाखि। वृन्दावन हित हो स्यामा निकट हरि ■ आये सखी रुख राखि ॥४॥
पद-
लाल माई गौरी गावत आवै। सुरन लेत मुख श्रवत अमी रस श्रवन पान अति भावै ॥ रुरकत अलक रुचिर आनन पर इहि विधि शोभा पावै। कमल कोष मनु भ्रमत मत्त अलि भृकुटी मदन नचावै ॥ लोचन बंक विशाल छवि भरे चितवन चितहि चुरावै। गोल कपोलन में कुण्डल दुति दामिनि निकर लज्यावै ॥ नासा सुभग दमक दसनावलि कर वर कमल फिरावै। सत्य जगत विजई यह मुरली तानन रंग बढ़ावै॥ मुकट लटक अभिराम स्याम तन ग्रीवा ललित दुरावै। यौवन कौंप मंजरी बलहत तरुनिनु मैन जगावै । ठठकि-ठठकि मद गज गति गवनै नैनन छवि उरझावै। श्री राधा विपुल सुहागवती कौं कला अनेक दिखावै।। नटवर वपु कंदर्प विमोहन शेखर रसिक कहावै। वृन्दावन हित रूप उडैलन अहा कहा वरषावै ॥५॥
राग गौरी-ताल आढ
विराजत कानन सर जुग हंस। साँझ समैं गावत मिलि गौरी धरै विमल भुज अंस ॥ सोभा अमल कमल मकरंदहि पीवत करत प्रसंश। रस लोभी रस दाइक लाइक समझत रस के गंशा॥ प्रीतम उर अहिलादनि मनसिज पीड़ा करनी नंश। वृन्दावन हित रूप निकर वपु दंपति मम अवतंश॥६॥ पद-
उदित रहै कानन उभय मयंक । निसि वासर छवि कला अखंडित वह ससि सम नहिं रंक ॥ सखि मंडल मनु सोभा पारस वह संकित ये रहै निसंक। ये कमलन के मित्र
देखियत वह अरि चितवन बंक॥ रवि समीप इनकी दुति दूनी कुंडल जुत ताटंक। वृन्दावन हित रूप विमल ये वामें दोष कंलक॥७॥
राग गौरी-ताल चर्चरी
बीन धरि अंक गौरी गहकि गावनी। चलत अँगुरी ललित परम सोभा वलित कहा कहाँ राग मूरत जु दरसावन ।। नखन की काँति ससि पाँति निर्त्तत मनौं कमल के दलन पर चढ़ि करी आवनी। ग्रीव की दुरन अरु मुरन लोचन चपल रूप सर तरत मनु मीन मन भावनी ।। निकर विद्या सची कौन विधि इहि जु वपु गति अपूरव नई तान उपजावनी। अहा-अहा करत प्रीतम जु मुख आपने करन लाघव निरखि पलक नहिं लावनी।।॥ रंग की वढन अरु कढन गुन गुपत की लाल गुनवंत चित विर्त्ति उरझावनी। चकित-से थकित से प्रेम घूमत महा विपुल आनंद अस जलद वरषावनी।। सहचरिनु निकर अरु खग मृगन के हिये नाद के स्वाद अनुराग सरसावनी। वृन्दावन हित रूप धन्य नव नागरी श्रवन रस भवन किये अमी अँचवावनी ॥८॥
पद-
लाल के वदन गौरी सु छवि पावहीं। भेष नटवर वन्यौ स्याम सौभागमणि उठत वैसंधि यह छकन सौं गावहीं ।। सुघर गुन उघरि कैं रंग वोरत सबै नई-नई तान कौ रूप दरसावहीं। रजनिमुख भस्यौ सुख महा अति कौतिकी जलद अनुराग मनु उमँगि बरषावहीं ॥ अमी की धार उझली मनौं कंठ मग न्याइ सेखर रसिक कहत नहिं आवहीं। ललित अँग-अँग नव रंग भीज्यौ हियौ राधिका रवन हिय के हिये भावहीं ॥ ग्रीव छवि
सींव आनन सु सोभा निकर लेत सुर साधि करताल पटकावहीं। मैन सैना परी मुरझि झुकि पगन तल विस्व थिरचर सवन बुद्धि बौरावनी ॥ कलन कौ धाम विश्राम आनंद कौ रसिकनी हियौ बहु भाँति सरसावहीं। वृन्दावन हित रूप मान बर्द्धन प्रिया दुहुँन रस जनित सखि दृगन अचवावहीं ॥९॥
पद-
नाद रस कौ गहर आजु कानन भयौ। बहस परी राधिका लाल दोऊन सखी कौन आनंद कौ हिये बिरवा बयौ ।। बुद्धि बल धरत हैं मान अरु तान बहु गुनन कौ हियन तें देखि उद्धव नयौ। सप्त सुर कढन में बढन भई प्रेम की चढन भई रंग की देखि चेटक दयौ। नाद भयौ रसिक सो मथत सबके मनन श्रवन लगे प्रान सब और सुमिरन गयौ। अहा कहा गौर अरु स्याम की सुघरता सबन अपनाइ कैं आपनी दिस लयौ।। देखि तरु-बेलि मकरंद कौं श्रवत हैं दूवत पाखान अस प्रेम सौं हिय तयौ । वारि रविजा गवन भूलि गई आपनौ देखि विधि श्रृष्टि कछु और विधि निर्मयौ।। अवनि आनंद अंकुरित अस रीति सौं मनहुँ रोमांच अति प्रेम-भर सौं ठयौ ॥ वृन्दावन हित रूप जुगल विद्या कुशल रीझि रहे दुहुँन कौ मन जु इक रँग रयौ ॥१०॥
पद-
चाँदनी की सोभा देखे दृग न अघाहीं। फिरत हैं प्यारी लाल दियें गरवाँही। मन मिले मोद भरे डोलत हैं ऐसैं। अति मदमाते रमैं करनी-गज जैसैं।॥ द्रुमन की परछाँही चाँदनी निहारी। मानौं कलम लै कैं करी काम चित्रकारी। कहूँ पत्र
छाया कह ससि की मयुखें। कानन त्रिपित करी दूगन की भूखें।। पल्लव अरुन ओसकन सौं लसे हैं। रजनी के भागनु मनाइकें हँसे हैं। कुसुम विकास लखि लीजियै वलैया। खेलै तरु बेलिन मानौं चाँदनी के छैया ॥ कुसुमन झौंरा देखि प्यारी लाल बोले। हीरन के डवा मानौं जौहरिन खोले । सरद की जन्हैया आजु कानन छवि पाई। वृन्दावन हित रूप निधि बढ्यौ महाई ॥११॥
राग बिहागरौ-ताल रूपक
आनन की ओभा कानन की दई सोभा हियें प्रेम गोभा निरखि भये आली। चंद नैं विछाइ दई चाँदनी अवनी मानो तहाँ विहरत राधा-वनमाली। लोकन निकाई सचि धरो मनौं याही धाम और सब रचना रची विधि ठाली। वृन्दावन हित रूप गौर स्याम रस-जस बिनु बरनत कवि तिन मत्ति खाली ॥१२॥
पद-
रविजा परस कियें कुसुम सुवास लियें कुंजन विरमि मंद मारुत ढरत है। मानौं करि चंद सौं विरस आई चाँदनी कानन निवास कियौ आगैं न टरत है। रीझि रही अतिही गुनज मोहि लागे सखी अनुरागी राधा लाल दास्य कौं करत है। वृन्दावन हित रूप कहा कहौं भाँति-भाँति दृगन सिराइ उर आनंद भरत है।॥१३॥
पद-
चंद्रमा की चढ़न बढ़न छवि कानन की राधा-हरि दूग भये कौतिकी चकोर री। कहा कहौं चाह चित सिंधु को न
लहौं मित फिरत हैं कुंज-कुज दोऊ भुज जोर री ॥ कलप द्रुमन चैनी देखि कहै मृग नैनी चाँदनी ररी है पत्र मैन चित चोर री। वृन्दावन हित रूप मुदित है राधा-लाल कहें मृदु वतियाँ लहैं न सुख ओर री ॥१४॥
पद-
अमल पस्यौ दोऊन के नैनन सरद जुन्हैया देख्यौई चाहै चटक। खसि गई रजनी निरखि नैन सजनी फिरैं प्रेम उनमद मानत काकी अटक । कानन सिंध मीन मन इनकौं तरिबोर्ड भावे और तजी खटक। वृन्दावन हित रूप बिकि जानत नेह कौ निकर दोऊ काम लज्यावन कटक ॥१५॥
राग सोरठ- ताल आड़
अरी हेली राधा लाल सुहाग कौं दुलरावौ सुख लेह। सरद सरवरी जगमगै हेली जगमगै जुगल सनेहु ॥ हेली० ॥१॥ कृपा उझलि हम दिस रही हेली देखौ नैन निहारि। गुनवंती-गुनवंत पै हेली देहु अपनपौ बारि ॥२॥ लोचन रक्षक पलक हैं हेली तजत न अपनी रीति । इहि विधि नागर-नागरी हेली तुमकौं पोषत प्रीति ॥३॥ गौर स्याम सब गुन निकर हेली तुम परखे सब अंग। तद्यपि रीझत हम गुनन हेली भरे अधिक रस रंग॥४॥ पूरित आनन्द बारि सौं हेली कानन सर अभिराम ।। क्रीडत करत प्रसंस कौं हेली निसि दिन स्यामा-स्याम।॥५॥ लहनौं गहनौं सखिनु कौ हेली ये दोऊ ललित किशोर। कुंजन सोभा गहर कौं हेली बरषत लहत न ओर ॥६॥ दै असीस तृन तोरि कैं हेली बैठे धरि भुज अंस। वृन्दावन हित रूप वलि हेली जीवन श्रीहरिवंश ॥७॥१६॥
पद-
अरी हेली नैनन मन के भाँवते दोऊ कुंज गगन के चंद। निरखि चकोरी अलि मुदित हेली परी प्रेम के फंद ॥ हेली० ॥ टेक ॥१॥ नित सरसत सोभा कला हेली अमी श्रवत दिन रात। वह सदोष निरदोष यह हेली उपमा दई न जात ॥२॥ प्रिया अंक बीना ललित हेली पिय लीनी मुख चंग। बहस परी है गान की हेली बरसत अति रस रंग॥३॥ नख मणि दुति अँगुरी सुभग हेली चपल चारु गति फिर्त। मनहुँ दामिनी के तनय हेली सीखत हैं कुल किर्त॥४॥ वेसर कौ मोती डुलत हेली ललित मुरत है ग्रींव। वैनी बिलुलित पीठ पै हेली मनु सोभा की सींव ॥५॥ सोभा कौ धुरवा मनौ हेली लाल लेत है तान। समझि अवधि नव नेह हद हेली प्रिया देत सनमान॥६॥ दोऊ रसिक रस भोगता हेली कानन कीयौ ऐन। वृन्दावन हित रूप वलि हेली फलदाइक सखी नैन ॥७॥१७॥
राग मँबारो-छन्द ॥ ताल आड़ चौतालौ
बिसरि दूगंचल हो दृष्टि मिलावहीं। प्रेम गहर कौ हो अन्त न पावहीं ।। पावैं न अन्त जु प्रेम सागर बढ़न दोऊ ओर हैं। माधुरी भरु गौरंग तन आसक्त ललित किशोर हैं। मुहुँचहा दोऊ दुहुँन के वपु उभै प्रान जु एक हैं। पस्यौ अमल गरुवे नेह कौ रस स्वाद लेत अनेक हैं। भोगता सुख समुदाइ के बतियान रंग बढावहीं। बिसरि दूगंचल हो दृष्टि मिलावहीं ॥१॥ नहिं अस जोरी हो वोरी रंग की। छिन छिन सरसन हो उरन उमंग की। उमंग बदलत मन परस्पर और बदलन कौ गनौं।
परम कौतिक देखि इनके एक रसना कहा भनौं। उन रीझ में रीडमैं ज ये इन रीझ में वे मुदित हैं। निसि द्यौस जान्यौ जात नहिं आनन मयंक सु उदित हैं। हमहें बितावत छिन घरी विवि हिलग कथन प्रसंग की। नहिं अस जोरी हो बोरी रंग की ॥२॥ कवह उनमद हो छकि छकि गावहीं। थिरचर हीये हो प्रेम घुमावहीं । घुमावहीं हिय प्रेम थिरचर को अस लोक प्रवीन हैं। लाल मुख मुरली वजै प्यारी बजावत वीन हैं। सुर ग्राम साधैं लेत हैं बरषत अमी मनु धार हैं। रस जु बलकन हिये ललकन तान सचत अपार हैं। सनमान दोऊ ओर तें बांछित जु दोऊ पावहीं। कवहूँ उनमद हो छकि-छकि गावहीं ॥ ३॥ श्रीराधा-सी हो को भाग्यन भरी। प्रीतम रुख लियें हो रहत धरी-धरी॥ रहत रुख लीयें जु प्रीतम प्रिया गुन विस्तरत है। लाल कौ चित प्रेम सौं घावरौ अति ही करत है। कहा रस आनंद कानन की करी परजा सुखी। वृन्दावन हित रूप कौतिक निरखि यह बारिज मुखी। इन बाँसुरी इन गान स्वामिनि सृष्टि विधि उलटी धरी। श्रीराधा-सी हो को भाग्यन भरी ॥१८॥
राग बिहागरौ-
जैसी जू निर्मल गगन ऐसौ बिहारिनि तिहारो मन। राका ससि तें सतगुनौं आनन भूषन रतन राजें उडगन। रजनी नीलाम्बर तन दुति जगमगै फैली जुन्हैया मानौं हस्यौ तम बन घन। वृन्दावन हित रूप वचन मनु अमी झरत है मो हिय जिय अति पोषन ।॥१९॥
राग गौरी-
मेरी कानन रानी राधिका हो अरी जाके मोहन मोह्यौ है रूप। परम रसिक मरली धरन जित कंदर्प कोटि अनूप ।। नव नीरद दूति तन हरै री मुख निर्दक राकेश। दामिनि की दूति गंजही राजै पट पियरौ जु सुदेश ।। गंडन पर अलकें रुरैं लसै श्रवनन कुंडल जोत । भौंहैं गोल लोचन ललित बेसर दुति जगमग होत।। नख सिख ललित किशोर वपु रहै प्रेम छक्यौ रिझवार। प्रान प्रिया रुख लै चले कंजन रस रंग-बिहार।। गौरंगी सोभा निकर ताके भावंता आधीन। वृन्दावन हित रूप के सागर संतत दोऊ मीन॥२०॥
राग कल्याण-
प्रसंसत चंद चाँदनी राधा मोहन अहा-अहा सुख कहत। उज्वल कुसुम बिकास जु कानन किरननु पूरित पवन सुवासित बहत।। रविजा पुलिन जगमगत अतिसै तहाँ फिरत देखि थकित जु रहत। वृन्दावन हित रूप महा रजनी रंग भीनी लोचन लाही लहत ॥२१॥
कल्प तरु लगि भये ठाड़े दिये अंस भुज कानन के गुन गावैं। छाया पत्र चाँदनी बिच-बिच चित्रित-सौ कियौ प्रीतम प्रियहि दिखावैं॥ सरसन माँहि कमोदिनि विकसी तिनकी सुगंध पवन मिलि आवै। वृन्दावन हित रूप परम कोविद जु धनी-धन आगैं चलि सोभा जु बतावैं॥२२॥
चाँदनी के बीज झरैं वृन्दारन्य भूमि परैं सरद निसा में जगमगत है सोई। भई है अमी वृष्टि ऊगे हैं परत दृष्टि
नागरी प्रवीन बिनु पारखू न कोई । उपजी कालिन्दी तीर अद्भुत सुख सीर अद्भुत विधि प्रेम तुम हित बोई। वृन्दावन हित रूप बिलसौ किशोरी नित अस आनंद कह लोकन न होई॥२३॥
राग बिहागरौ-ताल आड़
प्यारी जू राजत अंक तैबूरौ। तान अपूरव लेत ललक सौं झलकत कर मणि चूरौ।।॥ रीझि-रीझि कैं ग्रीव दुरावत त्यौं हालत सिर जूरौ। प्रीतम दृष्टि बांधि बस कीनी दिपत माँग सेंदूरौ॥ फैली हैं मयूख चहुँ दिसि कौं वदन कलावर पूरौ। वृन्दावन हित रूप स्वामिनी सदा सुहाग जु रुरौ ॥ २४॥
प्रेम भरु प्रीतम हियें भयौ है। अहा-अहा मुख कहत रहि गये तन सुध बिसरि गयौ है। प्रिया अंक तें धस्यौ तंबूरा आकौं भरि जु लयौ है। चेते बड़ी बार तन परसत दूगन कोर चितयौ है। पुनि गावौ सर्वेश्वरि मोकौ अति अहलाद दयौ है। वृन्दावन हित रूप महा सुख वरवस चित भिजयौ है॥२५॥
राग गौरी छन्द-
सरद निसा अति सोहै लाल। उपमा दैऊँ सु कोहै लाल॥ देखि मुदित भये भारी लाल। वन घन रवन विचारी लाल॥ वन घन रवन विचरी नागर अखिल कला गुन रुरौ। उज्वल पुलिन रेंनुका दमकत उदित भयौ ससि पूरौ। महमहात सौरभवन कमनी मोहन कौ मन मोहै। सप्त श्रोत रस उमगीं मुरली सरद निसा अति सोहै ॥१॥ वघुन उमाहौ दीनौ लाल। नाद मोहिनी कीनौ लाल ॥ चट दै सवन बुलायौ लाल। देखत प्रेम
निकायो लाल ।। देखत प्रेम विकायौ जब श्री राधा विहँसत भाई। फूलि बन्यौ वृन्दावन चहुँ दिसि मानों मानि बधाई। अगनित यूथ सखिनु के लारें पिय आगैं हैं लीनौ । इहि विधि नाम रसिक चूड़ामनि वधुन उमाहौ दीनौ ॥२॥ रजनी रंग चढ्यौ है लाल। अति अनुराग मढ्यौ है लाल । मनि मंडल तन कौंधे लाल। निरखि मदन दल चौधैं लाल ॥ निरखि मदन दल चौधैं अगनित बनिता रास कलोलें। चढे कनक मनु रतन अलौकिक टोल ससिनु के डोलैं। थेई-थेई वदन अमी मनु बरसत बिमल प्रकास बढ्यौ है। निर्त्तत बहस परी पिय प्यारी रजनी रंग चढ्यौ है।॥३॥ गति लै चलत नवेली वाल। मूरति रूप मनु बेली वाल।। लाड़ भरी अरबीली वाल। निर्त्त भेद गरबीली वाल ॥ निर्त्त भेद गरबीली चरनन परसत मनु धर नाहीं। हारै लिखत सारदा कोटिक जेतिक गुन इन माही॥ श्री राधा लावन्य रूप हद पिय अंसन भुज मेली। वृन्दावन हित रूप जाऊँ बलि गति लै चलत नवेली ॥४॥२६॥
राग गौरी-छन्द
राका सरद सुसाई आजु। शशि की उज्वलताई आजु॥ शशि अति उज्वलताई पाई मुरली मधुर बजाई। सुनि वर भामिनि लखि छवि यामिनि गज गामिनि तहँ आई। जगमगात कानन अति कमनी अवनी बहु छवि छाई। मारत त्रिविध बहत रुचि लीयें राका सरद सुहाई ॥१॥ कुसुमित है बनराई आजु। नव पल्लव अरुताई आजु ॥ नव पल्लव अरुनाई सरसिनु विकसीं कुमुदिनु ऐसैं। छटा छबीली देखि रीझिकै
हँसत मोद भरि जसें ।। मोहन राग अलाप रसिक पिय रास रवन मन भाई। ललना यूथ लिये तहँ विहरत कुसुमित है बनराई ॥ २ ॥ उरप तिरप गति लैहीं आजु । मदन चुनौती दैही आजु ॥ मदन चुनौती दैहीं लैहीं गति संगीत विशेखी। रसिक शिखामनि लाल प्रसंसत इन सम येही देखीं।॥ श्री राधा सर्वेश्वरि अगनित गुन नहिं परत गर्नेही। खेलत रास रसिकनी प्रीतम उरप तिरप गति लेहीं ॥३॥ थेई-थेई मृदु मुख भाखै आजु । ठुमकि-ठुमकि पग राखें आजु ॥ ठुमकि-ठुमकि पग राखें नाना हस्तक भेद दिखावैं। ढुरन मुरन आवन पुनि उलटन कवहूँ मिले स्वर गावें ।॥ बरषत परमानंद आजु बन भरत उरन अभिलाखै। वृन्दावन हित रूप उलड़ परत थेई-थेई मुख भावैं॥४॥२७॥