NewIncredible offer for our exclusive subscribers!Read More
Padawali Utsav

व्याहुला के पद

  • November 28, 2025
  • 1 min read
  • 123 Views
व्याहुला के पद
व्याहुला(विवाह)उत्सव के पद

श्रीहित हरिवंशचन्द्रमहाप्रभु जी कृत

(रासुनिश्लो५६)

प्रीतिं कामपि नाममात्रजनितप्रोद्दामरोमोद् गमां

राधामाधवयोः सदैव भजतोः कौमार एवोज्ज्वलाम्।

वृन्दारण्यनवप्रसूननिचयानानीय कुंजान्तरे

गूढं शैशवखेलनैर्बत कदा कार्य्यो विवाहोत्सवः॥

 

श्रीहित हरिवंशचन्द्रमहाप्रभु जी कृत (चतुरासीजी पद सं-६२)

रास का पद

खेलत रास दुलहनि दुलहु ।

सुनहु न सखी सहित ललितादिक,

निरखि-निरखि नैंनन किन फूलहु ॥

अति कल मधुर महा मोहन धुनि,

उपजत हंस-सुता के कूलहु ।

थेई- थेई वचन मिथुन मुख निसरत,

सुनि-सुनि देह दशा किन भूलहु ॥

मृदु पदन्यास उठत कुमकुम रज,

अद् भुत बहत समीर दुकूलहु ।

कबहुँ श्याम श्यामा-दसनांचल,

कच-कुच हार छुवत भुज मूलहु ॥

अति लावन्य रूप अभिनय गुन,

नाहिन कोटि काम समतूलहु ।

भृकुटि विलास हास रस बरषत,

जै श्रीहित हरिवंश प्रेम रस झूलहु ॥

श्रीहित ध्रुवदासजी कृत

 व्याहुला के पद

सखियनि के उर ऐसी आई । ब्याह-विनोद रचैं सुखदाई ।

यहै बात सबकैं मन भाई । आनँद-मोद बढ्यौ अधिकाई ॥

बढ्यौ आनँद मोद सब कैं, महा प्रेम सुरँग रँगी ।

और कछु न सुहाइ तिनकौं, जुगल सेवा-सुख पगी ॥

निसि-द्यौस जानत नाँहि सजनी, एक रस भींजी रहैं ।

गोप-गोपिनु आदि दुर्लभ, तिहिं सुखहि दिन-प्रति लहैं ॥१॥

यह नव दुलहिनि अति सुकुमारी । ये नव दूलहु लाल-विहारी ।

रँग-भीने दोउ प्रान-पियारे । नवसत अंगनि अंग सिंगारे ॥

नवसत सिंगारे अंग-अंगनि, झलक तन की अति बढ़ी ।

मौर-मौरी सीस सोहैं, मैंन-पानिप मुख चढ़ी ॥

जलज सुमन सुसेहरे रचि, रतन हीरे जगमगैं ।

देखि अद्भुत रूप मनमथ, कोटि रति पाँइनिं लगैं ॥२॥

सोभा मंडप कुंज द्वारैं । हित की बाँधी बंदनवारैं ।

कुम-कुम सौं लै अजिर लिपायौ । अद्भुत मोतिनु चौक पुरायौ ॥

पुराइ अद्भुत चौक मोतिनु, चित्र-रचना बहु करी ।

आइ दोउ ठाढ़े भये तहाँ, सबनि की गति-मति हरी ॥

सुरँग महँदी रंग राचे, चरन-कर अति राजहीं ।

विविध रागिनि किंकिनि, अरु मधुर नूपुर बाजहीं ॥३॥

वेदी सेज सुदेस सुहाई । मन दृग अंचल ग्रंथि जुराई।

रीति-भाँति विधि उचित बनाई । नेह की देवी तहाँ पुजाई ॥

पूजि देवी नेह की दोउ, रति-विनोद विहारहीं ।

तिहि समैं सखि ललितादि हित सौं, हेरि प्राँननि वारहीं ॥

एक वैस सुभाव एकै, सहज जोरी सोहनी ।

एक डोरी प्रेम की ‘ध्रुव’, बँधे मोहन-मोहनी ॥४॥

—————-

श्री वृंदावन धाम रसिक मन मोहई ।


दूलहु दुलहिनि ब्याह सहज तहाँ सोहई ॥१॥


नित्य सहाने पट अरु भूषन साजहीं ।


नित्य नवल सम वैस एक रस राजहीं ॥२॥


सोभा कौ सिरमौर चंद्रिका मोर की ।


बरनी न जाइ कछू छबि नवल किसोर की ॥३॥


सुभग माँग रँग-रेख मनौं अनुराग की ।


झलकत मौरी सीस सुरंग सुहाग की ॥४॥


मनिनु-खचित नव-कुंज रही जगमग जहाँ। 


छबि कौ बन्यौ वितान सोई मंडप तहाँ ॥५॥


वेदी सेज सुदेस रची अति बानि कैं ।


भाँति-भाँति के फूल सुरँग बहु आँनि कैं ॥६॥


गावत मोर मराल सुहाये गीत री ।


सहचरि भरी आनंद करति रस-रीति री ॥७॥


अलबेले सुकुँवार फिरत तिहिं ठाँव री ।


दृग-अंचल परी ग्रंथि लेत मन भाँवरी ॥८॥


कँगना प्रेम अनूप कबहुँ नहिं छूटही ।


पोयौ डोरी-रूप सहज सो न टूटही ॥९॥


रचि रहे कोमल कर अरु चरन सुरंग री ।


सहज छबीले कुँवर निपुन सब अंग री ॥१०॥


नूपुर कंकन किंकिनी बाजे बाजहीं ।


निर्त्तत कोटि अनंग-नारि सब लाजहीं ॥११॥


बाढ्यौ है मन माहिं अधिक आनंद री ।


फूले फिरत किसोर वृंदावन-चंद री ॥१२॥


सखियनि किये बहु चार अनेक विनोद री ।

दूधाभाती हेत बढयौ मन मोद री ॥१३॥

 

ललित लाल की बात जबहि सखियनि कही ।


लाज सहित सुकुँवारि ओट पट दै रही ॥१४॥


नमित ग्रींव छबि सींव कुँवरि नहिं बोलही ।


बुधि-बल करत उपाइ घूँघट पट खोलही ॥१५॥


कनक-कमल कर-नील कलह अति कल बनी ।


हँसतिं सखी सुख हेरि सहज सोभा घनी ॥१६॥


वाम-चरन सौं सीस लाल कौ लावहीं ।


पानी वारि कुँवरि पर पियहि पिवावहीं ॥१७॥


मेलि सुगंध उगार सौं बीरी खवावहीं ।


समझि कुँवर मुसिकाइ अधिक सुख पावहीं ॥१८॥


और हास-परिहास रहसि रस-रँग रह्यौ ।


नित्य-विहार विनोद जथामति कछु कह्यौ ॥१९॥

 

अंचल ओट असीस सखी सब दैहिं री ।

पल-पल बढ़ौ सुहाग नैंन-सुख लैहिं री ॥२०॥


जैसैं नवल-विलास नवल-नवला करैं ।


मन-मन की रुचि जानि नेह-विधि अनुसरैं ॥२१॥


बैठी है निज कुंज कुँवरि मन-मोहनी ।


झलकत रूप अपार सहज अति सोहनी ॥२२॥


चाहि-चाहि सो रूप रसिक-सिरमौर री ।


भरी आये दोउ नैंन भई गति और री ॥२३॥


अति आनँद कौ मोद न उरहि समात री ।


रीझि-रीझि रस भींजि आपु बलि जात री ॥२४॥


अरुझे मन अरु नैंन बढ़्यौ अनुराग री ।


एक प्रान द्वै देह नागर अरु नागरी ॥२५॥


यौं राजत दोउ प्रीतम हँसि-मुसिकात री ।


निरखि परस्पर रूप न कबहुँ अघात री ॥२६॥


तिनही के सुख रंग सखी दिन रँग-मँगी ।


और न कछू सुहाइ एक-रस सब पगी ॥२७॥


उभय रूप रस-सिंधु मगन जहाँ सब भये ।


दुर्लभ श्रीपति आदि सोई सुख दिन नये ॥२८॥


‘हित-ध्रुव ‘ मंगल सहज नित्य जो गावही ।


सर्वोपरि सोइ होइ प्रेम-रस पावही ॥२९॥

 

गो॰ श्रीहित रूपलालजी कृत

असीस का पद

लाड़ी जू थारौ अविचल रहौ जी सुहाग ।


अलक लड़े रिझवार छैल सौं, नित नव बढ़ौ अनुराग ॥


यौं नित विहरौ ललितादिक सँग, वृंदावन निजु बाग ।


‘रूप अली’ हित जुगल नेह लखि, मानत निजु बड़ भाग ॥

About Author

asutosinc@gmail.com