दशहरा के पद

Radhavallabh Patotsav

दशहरा के पद

श्रीहित हरिवंशमहाप्रभुजी कृत-

प्रात समय दोऊ रस लंपट, सुरत-जुद्ध जय-जुत अति फूल। श्रम-वारिज घनविन्दु वदन पर, भूषण अंगहि अंग विकूल ॥ कछु रह्यौ तिलक शिथिल अलकावलि, वदन कमल मानौं अलि भूल। जै श्रीहित हरिवंश मदन-रंग रँगि रहे, नैन-बैन कटि शिथिल दुकूल ॥१॥

चाचा श्रीवृन्दावनदासजी कृत-

पद-

मोहन पूज्यौ दशहरा लै अक्षत रोरी। बैठे विप्र पुजावहीं भई भीर न थोरी ॥ निगम महा धुनि होत है, रहे हरि कर जोरी। ब्रजपति दछिना देत हैं, भरें रतनन झोरी ॥ लाये विविध श्रृंगार कै, पूजे घोरा-घोरी। हरि-हलधर सिर तिलक करि, धरे जौ जु बहोरी ॥ जुवती मंगल गावहीं, लै अंचल छोरी। चिरजीवौ नंदन नंद कौ, वृषभानु किशोरी।। नव दुल हिनि मंदिर फिरै, छबि सींवा जोरी। सुकृत यशोदा-नंद कौ, जोरी रंग बोरी॥ पट भूषन वारें निरखि सुत वधू जु ओरी। वृन्दावन हित रूप पै डारत तृन तोरी ॥२॥

राग विलावल ताल मूल-

दसमी विजय विचारि कैं सब सखियन बुद्धि उपाई जू। पूजन कीजै स्याम कौ यह बात सबन मन भाई जू॥१॥ श्रीराधाजू कौं प्रथमहीं चलि दीजै आज बधाई जू। बहुविध दुहुँन सिंगारकैं बैठे सिंघासन आई जू॥२॥ तुंगविद्या विद्या-भरी तब राधाजू विनय सुनाई जू। आज विजय जिहि बात की सो जानों विजय सदाई जू॥३॥ उतहि सिंगारे स्याम घन इत राधेजू चौंप बढ़ाई जू। सखिजन नव सत साजि कैं तब मणि मंदिर लै आई जू॥४॥ दृग-दृग मिलि पूजन कस्यौ हरि हरष न हियै समाई जू। भुवपति लोचन अलिनु के मनु कर धरें भेट सुहाई जू॥५॥ रोरी अक्षत सजि आरतौ बहुत अधीन महाई जू। मंत्री नेह विचारि कैं चितवन करि रीझ दिबाई जू॥६॥ मदन मनोरथ रथ चढ़े चौगान तलप मन भाई जू। हाव भाव जोधा रुपे तब विजय सकल विधि पाई जू॥७॥ जीत मनोज मवास कौं हरि सैना मान भगाई जू। वृन्दावन हित निरखि कैं हित रूपा कुशल मनाई जू॥८॥३॥

राग बिलावल ताल आड़-

बाबा मोकौं दसहरा आज सुविध पुजावौ। या पूजा कौ फल कहा, सो अरथ बतावौ ॥१॥ बेटा कुशल जु देस पुनि,होइ गोपन कुल में। गोधन रहै निरोग नित, सुख बाढ़े गोकुल में॥२॥ छत्रिनु कौ त्यौहार यह, विधि निर्मित कीयौ। सूरज कुल पुनि सोमकुल, पूजन जस दीयौ ॥३॥ आज विजय श्रीराम करि लंका दिये डेरे। दस सिर छेदि जु रावना, दस दिसन बगेरे ॥४॥ यह सुनि कह्यौ लक्षमन कहाँ लाबौ जनक कुमारी। नंद कहत मेरे मोहना डरप्यौ मन भारी ॥५॥ गरग आइ के कर गह्यौ, गृह में लै आये। तात सहित पूज्यौ दसहरा, वधू मंगल गाये ॥६॥ विप्र सवासिन जौ धरैं, हरि-हलधर सीस। ब्रजपति दक्षिना देत हैं, वे दैहिं असीसैं ।॥ ७॥ रोरी अक्षत तिलक करि, बैठे मित्रन माहीं। हीरो गावत जील स्वर, हलधर गरबाहीं ॥८॥ मेवा अरु पकवान सों, गोदी जु भराई। वृन्दावन हित रूप बलि देंहि महरि बधाई ॥९॥४॥

श्रीप्रेमदासजी कृत-राग सारंग-

आजु दसहरा शुभ दिन नीकौ। गिरिधरलाल जवारौ पहिरत बन्यौ है भाल कुमकुम कौ टीकौ । दैहि असीस सकल गोपी जन चिरजियौ कुँवर भाँवतौ जीकौ। प्रेमदास प्रभु कौ मुख निरखत त्रिभुवन कौ सुख लागत फीकौ॥५॥

श्रीरसिकप्रभुजी कृत-

आज दसहरा शुभ दिन नीकौ, बिजय करौ पिय प्यारी पै आज। घेरी है विकट मदन गढ गाढे, तोरि मेंड लालन करि हो राज ।। इतनी बात सुनत नँद नंदन, बिहँसि उठे दल कीनों साज। रसिक प्रभु पिय रति पति जीत्यौ, नूपुर किंकिणि रुनझुन बाज॥६॥

श्रीपरमानन्ददासजी कृत-राग सारंग-

आज दसहरा शुभ दिन नीकौ। श्रीगिरिधर लाल जवारे पहिरें, बन्यौ भाल कुमकुम कौ टीकौ।। आरति करत देत नौछावर, चिरजीवौ लाल भाँवतौ जीको। परमानंद प्रभु कौ मुख निरखत, त्रिभुवन कौ सुख लागत फीकौ ॥७॥

राग कान्हरौ-

तिलकहि सोहे भाल, जवारे धरें गिरिधर लाल। स्वेत जरकसी बाँधे चीरा, मोर चंद्रिका सोहै लाल ।। तनसुख कौ बागौ अति झीनौ, मनिमय कुंडल लाल। कर पहोंची नासा गज मोती चितवन नैन विशाल ॥ फेंटा बन्यौं जराव जरकसी सूथन पहिरें लाल। फूदे पदिक नग जगमगात, पग नूपुर शब्द रसाल।। उर बनमाल बनी अति सुन्दर, निरखत नैन विशाल। परमानंद दास के जीवन, गोकुल के प्रतिपाल ॥८॥