मोहन भोग के पद
माह सुदी दोज कौं टोपा के दर्शन (मोहन भोग के पद)
बाबा ध्रुवालिशरणजी कृत-
-राग भेरव-
मोहन भोग अरोगत रुचि सों श्रीराधावल्लभ लाल प्रभात। केसरिया मेवा मिश्रित करि सौरभ सहित सुहात।। हिमरितु अधिक श्याम सुखदायक मिलत गात सों गात। ओढ़ दुशाला मोरत छोरन सकुचत संगम रात॥ आलस वस अँगरात अंग-अंग चुटकी देत जँभात। हित रूपा ललितादिक गावत सुरत रंग की बात। मंगल भोग भली विधि भोगत हित सजनी के हाथ। माखन मिश्री सहित मिष्ट दधि जेंवत है मुसकात ॥ तूल भरौ टोपा सोभित सिर लसत वदन जल जात। तह कौतुक नित नयौ कुंज थल हित ध्रुव अलि बलि जात ॥१॥
चतुर्भुजदास पाठक कृत-
रितु हेमन्त मंगली विरियाँ, मोहन भोग जैवत पिय प्यारी। बहु विध मेवा मिल्यौ केशरी अरु घृत सों कोमल रुचिकारी।। बासोंधी जुत मधुर मलाई माखन मध्य सिता बहु डारी। बँध्यौ मिष्ट दधि दुग्ध अधौटा लाईं सहचरि सज-सज थारी।। अमित लाड़ भर ख्वावत दोउन प्यारी सजनी बारी-बारी एई सबके प्राण जीवन हैं कुँवरि लाड़िली और विहारी॥ ख्वाइ प्याइ अचवन दै बीरी चिंतत सुखद उपाय सदारी। तब हित प्रेरित शीत पवन अति चल्यौ जहाँ राजत सुकुमारी ।।
शीतल पवन परस पिय के हिय लपट गई कोमल लतिका री। अपनौं शाल उढ़ाय हृदय कस हँस यौं बोले रसिक महा री। जब लग सियरौ पवन बहत है यों ही रहौ होउ जिन न्यारी। अपनें-अपनें हिय अरु नैनन देख सिरावत हैं सहचारी॥ प्रवल पवन रोकत इक सहचरि करत फिरत है बंद किवारी। इक चंदन परचाइ अँगीठी दहकत दंपति सन्मुख धारी ॥ एक शाल में दोऊ लपटे ऐसे ही आरती उतारी। जय हो जय हो कहत सखीजन दास चतुर्भुज हित बलिहारी ॥२॥
पद (यह पद जुगल-दर्शन पड़वा कौं होय है)
अरी मेरी वारी कौ भँवरवा लोभी कहूँव न जाय री ॥टेक ॥ रेसम कौ बाँध्यौ भौरा उड़ि-उड़ि जाय री। अरी वा हियरा कौ बाँध्यौ लोभी कहूँव न जाय री ।। नेह लता के बीच बँगला छवाय री। अरी वा बँगला के बीच पीय सेज री विछाय री ॥ सेजरी के बीच हिय आनन्द बढ़ाय री। अरी वा आनन्द के बीच हित रूप दरसाय री ॥३॥