श्रीरास-उत्सव के पद
क्वार सुदी १५ सरद पूर्णमासी से प्रारम्भ
गो० श्रीहितहरिवंशचन्द्रमहाप्रभुजी कृत-राग गौरी (त्रिभँगी छंद चारी)
मोहन मदन त्रिभँगी। मोहन सुनि मन रंगी।। मोहन मुनि सघन प्रगट परमानंद, गुण गंभीर गुपाला। शीश किरीट श्रवण मणि कुंडल, उर मंडित बनमाला।। पीताम्बर तन धातु विचित्रित, कल किंकिणि कटि चंगी। नख मणि तरणि चरण सरसीरुह, मोहन मदन त्रिभंगी ॥१॥ मोहन वेणु बजावै। इहि ाव नारि बुलावै॥ आईं ब्रज नारि सुनत वंशी रव, गृहपति बंधु बिसारे। दरसन मदन गुपाल मनोहर, मनसिज ताप निवारे। हरषित बदन बंक अवलोकन, सरस मधुर ध्वनि गावै। मधुमय श्याम समान अधर धर, मोहन वेणु बजावै॥२॥ रास रच्यौ वन माँहीं। विमल कल्पतरु छाँहीं।। विमल कल्पतरु तीर सुपेसल, शरद रैन वर चंदा। शीतल-मंद-सुगंध पवन बहै, तहाँ खेलत नंदनंदा। अद्भुत ताल मृदंग मनोहर, किंकणि शब्द कराहीं। जमुना पुलिन रसिक रस सागर, रास रच्यौ वन माहीं॥३॥ देखत मधुकर केली। मोहे खग मृग बेली। मोहे मृग धेनु सहित सुर सुन्दरि, प्रेम मगन पट छूटे। उडगन चकित थकित शशि मण्डल, कोटि मदन मन लूटे ॥ अधर पान परिरंभन अति रस, आनँद मगन सहेली। जय श्रीहित हरिवंश रसिक सचु पावत, देखत मधुकर केली ॥४॥१॥
राग कल्याण- (कार्तिक वदी दोज कौं यह पद गायौ जावै है) द्वितीय शरद
लाल की रूप माधुरी नैनन निरख नैक सखी। मनसिज मन हरन हासि, साँमरौ सुकुमार रासि, नख-सिख अंग अंगन उमँगि सौभग सींव नखी ॥ रँगमगी सिर सुरँग पाग, लटकि रही वाम भाग, चंपकली कुटिल अलक, बीच-बीच रखी। आयत दृग अरुण लोल, कुण्डल मंडित कपोल, अधर दसन दीपति की छबि क्यों हूँ न जात लखी ॥२॥ अभयद भुज दण्ड मूल, पीन अंस सानुकूल, कनक निकष लसि दुकूल दामिनी धरखी। उर पुर मंदार हार, मुक्तालर वर सुढार, मत्त दुरद गति तियन की देह दसा करखी ॥३॥ मुकलित वय नव किशोर, वचन रचन चित के चोर, मधुरितु पिक शाव नूत मंजरी चखी। जय श्री नटवत हरिवंश गान, रागिणी कल्याण तान, सप्त स्वरन कल इते पर, मुरलिका बरखी ॥४॥२॥
राग बिलाबल –
चलहि राधिके सुजान तेरे हित सुख निधान, रास रच्यौ श्याम तट कलिंद नन्दिनी। निर्त्तत जुवती समूह राग रंग अति कुतूह, बाजत रस मूल मुरलिका अनन्दिनी ॥१॥ वंशीवट निकट जहाँ, परम रमनि भूमि तहाँ, सकल सुखद मलय बहै वायु मन्दिनी। जाती० ईषद विकास कानन अतिशय सुवास, राका निशि शरद मास विमल चन्दिनी ॥२॥ नरबाहन प्रभु निहार लोचन भरि घोष नारि, नख-सिख सौदर्य्य काम दुख निकंदिनी। बिलसह भुज ग्रीव मेलि भामिनि सुखसिंधु झेलि, नव निकुंज श्याम केलि जगत बन्दिनी ॥३॥३ ।।
राग आसाबरी-
खेलत रास रसिक ब्रजमंडन। जुवतिन अंस दियें भुज दण्डन॥ शरद विमल नभ चन्द्र बिराजै। मधुर-मधुर मुरली कल बाजै ।। अति राजत धनश्याम तमाला। कंचन बेलि बनी ब्रजवाला।। बाजत ताल मृदंग उपंगा। गान मथन मन कोटि अनंगा ।। भूषन बहुत बिबिध रंग सारी। अंग सुधंग दिखावत नारी॥ बरषत कुसुम मुदित सुर योषाः। सुनियत दिविदुन्दुभि कल घोषा। जै श्रीहित हरिवंश मगन मन श्यामा। राधा रमण सकल सुख धामा ।।४।।
राग धनाश्री-
आज गोपाल रास रस खेलत, पुलिन कल्प तरु तीर री सजनी। शरद बिमल नभ चन्द्र विराजत, रोचक त्रिबिध समीर री सजनी ॥ चंपक बकुल मालती मुकलित, मत्त मुदित पिक कीर री सजनी। देसी सुधंग राग रंग नीकौ, ब्रज जुवतिन की भीर री सजनी। मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड्यौ मुनि धीर री सजनी। जै श्रीहित हरिवंश मगन मन श्यामा, हरत मदन घन पीर री सजनी ॥५॥
राग सारंग-
आज वन नीकौ रास बनायौ। पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट, मोहन बैनु बजायौ।। कल कंकन-किंकिनि नूपुर ध्वनि, सुनि खग-मृग सचु पायौ। जुवतिन मंडल मध्य श्याम घन, सारंग राग जमायौ ।॥ ताल मृदंग उपंग मुरज डफ, मिलि रससिंधु बढायै। विबिध विशद बृषभानु नन्दिनी, अंग सुधंग दिखायौ। अभिनय निपुन लटकि लट लोचन, भृकुटि अनंग नचायौ। तता थेई-ता थेई धरत नौतन गति, पति ब्रजराज रिझायौ।। सकल उदार नृपति चूड़ामणि, सुख वारिद बरषायौ। परिरंभन चुम्बन आलिंगन उचित जुवति जन पायौ।। बरषत कुसुम मुदित नभ नायक, इन्द्र निसान बजायौ। जै श्रीहित हरिवंश रसिक राधा पति, जस बितान जग छायौ ।।६।।
राग गौरी-
खेलत रास दुलहिनी दूलहु। सुनहुँ न सखी सहित ललितादिक, निरखि-निरखि नैनन किन फूलहु ॥ अति कल मधुर महा मोहन ध्वनि, उपजत हंससुता के कूलहु। थेई-थेई वचन मिथुन मुख निसरत, सुनि-सुनि देह दसा किन भूलहु ॥ मृदु पदन्यास उठत कुमकुम रज, अद्भुत बहत समीर दुकूलहु। कबहुँ श्याम श्यामा दसनांचल, कच-कुच-हार छुबत भुजमूलहु॥ अति लाबन्य-रूप-अभिनय गुन-नाहिंन कोटि काम समतूलहु। भृकुटि बिलास हास रस बरषत, जै श्रीहित हरिवंश प्रेमरस भूलहु ॥७॥
राग गौरी-
मदन मथन घन निकुंज खेलत हरि, राका रुचिर शरद,रजनी। जमुना पुलिन तट सुरतरु के निकट, रचित रास चलि मिलि सजनी ॥ बाजत मृदु मृदंग नाचत सबै सुधंग, तै न श्रवन सुन्यौ बैन बजनी। जै श्रीहित हरिवंश प्रभु राधिका रमन, मोकौं भावै माई जगत भगत भजनी ॥८ ॥
राग कल्याण-
रास में रसिक मोहन बने भामिनी। सुभग पावन पुलिन सरस सौरभ नलिन, मत्त मधुकर निकर शरद की जामिनी।। त्रिविध रोचक पवन ताप दिनमनि दवन, तहाँ ठाड़े रवन संग सत कामिनी। ताल वीना मृदंग सरस नाचत सुधंग एकते एक संगीत की स्वामिनी ।। राग रागिनी जमी विपिन बरषत अमी, अधरर्बिबन रमी मुरलि अभिरामिनी। लाग कट्टर उरप सप्त स्वर सौं सुलप, लेत सुन्दर सुधर राधिका नामिनी। तत्त-थेई-थेई करत गतिव नौतन धरत, पर्लाट डगमग ढरत मत्त गज गामिनी।। धाय नव रँग धरी उरसि राजत खरी, उभै कल हंस हरिवंश घन-दामिनी ॥९॥
राग कल्याण-
मोहिनी मोहन रंगे प्रेम सुरंगे, मत्त मुदित कल नाचत सुधंगे। सकल कला प्रवीन कल्याण रागिनी लीन, कहत न बनै माधुरी अंग-अंगे।॥ तरनि तनया तीर त्रिबिध सखी समीर, मानों मुनि व्रत धस्यौ कपोती कोकिला कीर। नागरी नव किशोर, मिथुन मनस् चोर, सरस गावत दोऊ मंजुल मन्दर घोर। कंकन किंकिनि धुनि मुखर नूपुरन सुनि, जै श्रीहित हरिवंश रस बरषै नव तरुनि ॥१०॥
राग कल्याण-
श्याम संग राधिका रास मंडल बनी। बीच नंदलाल ब्रज बाल चंपक बरन, ज्यौंव घन तडित बिच कनक मर्कत मनी।। लेत गति मान तत्त थेई हस्तक भेद, सा-रे-ग-म-प-ध-नि ये सप्त सुर नंदनी। निर्त्तरस पहिर पट नील प्रगटित छबी, वदन जनों जलद में मकर की चाँदनी ॥ राग रागिनि तान मान संगीत मत, थकित राकेश नभ शरद की जामिनी। जै श्रीहित हरिवंश प्रभु हंस कटि केहरी, दूरि कृत मदन मदमत्त गज गामिनी ।।११।।
राग कान्हरौ-
सुधंग नाचत नवल किशोरी। थेई-थेइ कहत चहत प्रीतम दिशि, वदन चन्द्र मनौ त्रिषित चकोरी ॥ तान बंधान मान में नागरि, देखत श्याम कहत हो-होरी। जै श्रीहित हरिवंश माधुरी अंग-अंग बरबस लियौ मोहन चित चोरी ॥१२॥
राग केदारौ-
बृषभानु नंदनी मधुर कल गावै । विकट औधर तान चर्चरी ताल सौं, नन्दनंदन मनसि मोद उपजावै॥ प्रथम मज्जन चारु चीर कज्ञ्जल तिलक, श्रवन कुंडल बदन चंदन लजावै। सुभग नक बेसरी रतन हाटक जरी अधर बंधूक दसन कुंद चमकावै॥ वलय कंकण चारु उरसि राजत हारु, कटिब किंकिणि चरण नूपुर बजावै। हंस कल गामिनी मथतमद कामिनी, नखन मदयंतिका रंग रुचि द्यावै ॥ निर्त्त सागर रभस रहसि नागरि नवल चंद चाली विविध भेदन जनावै।। कोक विद्या विदित भाइ अभिनय निपुन, भ्र विलासन मका केतन नचावै॥ निविड़ कानन भवन बाहु रजित रवन, सरस आलाप सुख पुंज बरषावै। उभय संगम सिंधु सुरत पूषनबंधुः द्रवत मकरंद हरिवंश अलि पावै ॥१३॥
राग टोडी-
आज मेरे कहे चलौ मृग नैनी। गावत सरस जुवति मंडल में, पिय सौं मिले भलैं पिक बैनी ।। परम प्रबीन कोक विद्या में, अभिनय निपुन लाग गति लैनी। रूप रासि सुनि नवल किशोरी पल-पल घटत चाँदनी रैनी ॥ जै श्रीहित हरिवंश चली अति आतुर, राधा रवन सुरत सुख दैनी। रहसि रभसि आलिंगन चुम्बन मदन कोटि कुल भई कुचैनी ॥१४॥
राग धनाश्री-
मोहिनी मदन गोपाल की बाँसुरी। माधुरी श्रवण, पुट सुनत सुनि राधिके, करत रतिराज के ताप कौ नासुरी।। शरद राका रजनि विपिन वृन्दा सजनि, अनिल अति मद शीतल सहित बासुरी। परम पावन पुलिन भंग-सेवित नलिन, कल्पतरु तीर बलबीर कृत रास री ॥ सकल मंडल भली तुम जु हरि सौं मिलीं, बनी बर बनित उपमा कहौ कासु री। तुम जु कंचनतनी लाल मर्कत मनी जै श्रीउभै कल हंस हरिवंश बलि दासुरी ॥१५॥
राग गौरी-
बैनु माई बाजै बंशीवट। सदा बसंत रहत वृन्दावन,पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट ॥ जटित कीट मकराकृत कुंडल मुख अरविन्द भँवर मानौं लट। दसनक कुन्द कली छवि लज्जित, सज्जित कनक समान पीतपट ।। मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट। दास अनन्य भजन रस कारन, जै श्रीहित हरिवंश प्रगट लीला नट ।।१६।।
राग कान्हरौ-
रहसि रहसि मोहनपिय के संगरी लड़ैती अति रस लटकत। सरस सुधंग अंग में नागरि थेई-थेई कहत अवनि पद पटकत। कोक कला कुल जानि शिरोमनि, अभिनय कुटिल भृकुटियन मटकत। विवस भये प्रीतम अलि लंपट, निरखि करज नाना पुट चटकत॥२॥ गुण गन रसिक राइ चूड़ामणि, रिझवत पदिक हार पट झटकत। जै श्रीहित हरिवंश निकट दासी जन लोचन चषक रसासब गटकत ।।१७।
पद-
मैं जु मोहन सुन्यौ वेणु गोपाल कौ। व्योम मुनियान सुर नारि बिथबित भईं, कहत नहिं बनत कुछ भेद पति ताल कौ॥ श्रवण कुंडल छुरितु रुरत कुंतल ललित, रुचिर कस्तूरि चन्दन तिलक भाल कौ। चंद गति मंद भई निरखि छबि काम गई, देख हरिवंश हित वेष नन्दलाल कौ ॥१८॥
गो० श्री कृष्णचन्द्रजी कृत-राग मालब-
नाँचत मोहन संग राधिका ब्रज जुवतिन के जूथ लिये। बाहु परसार जोरि प्रेम बस, मुदित गंड पर बंड दिये। कंकन कनित रुनित बर नूपुर, सुनत श्रवण खग उपरनियें। बाजत ताल रसाल सरस गति, मालब राग सुदेस गियें।। सुघर संगीत प्रबीन नागरी, तिरप लेत आनन्द हिये। लटकत सीस सुभग पग पटकत, वदत श्याम हो-होव कियें।॥ सुख भर भरित परस्पर मंडल, सस्मित रस लोचनन पिये। जै श्री कृष्णदास हित वदत सदा यह, वृथा कहा सत कल्प जियें ॥१९॥
राग ईमन-
मंडल मध्य रंग भरे श्यामा श्याम राजैं। सुधर ररररररररस मुरली घोर गाजैं। गान करत ब्रज भाम लेत सुन्दर सुघर तान, अंग-अंग अभिराम मनमय छबि लाजैं। धिगतां धिगतां धिगतां ताधिलांग ताधिलांग ताधिलांग धिधिकिट धिधिकिट धिधिकिट गिडि गिडां गिडि गिडांग गिडि गिडां गगिड गिड गिड गाजैं। ररर रैन रीझि रही जजज जमुना थकित भई चचच चन्द गगग पपप पच्छिम रथन साजैं। जै श्रीकृष्णदास हित विलास सोभित रस-रूप रासि, वृन्दाविपिने विलास रंग रह्यो आजै ॥ २०॥
राग ईमन-
तरनिसुता कल तौरै। रोचक त्रिविध समीरे ॥ रोचक त्रिविध समीर सुभग अति वृन्दारण्य निकुंजे। हरषित केकि नाद कल पूरित; प्रेम महा रस पुंजे ॥ विविध प्रसून प्रफुल्लित उद्भट नदित कोकिला कीरे। जै श्रीकृष्णदास हित कुंज विराजत तरनि सुता कल तीरे ॥१॥ शरद निसा वर चन्दा। पूरन आनन्द कन्दा ।। पूरन आनन्द कन्दा चन्दा देखि श्याम मन मान्यौ। मुरली रव ललना कुल मोह्यौ रहसि विनोद सुठान्यौ। आईं सुतपति छाँड़ि एक चित भजे आइ नँद नन्दा। जै श्रीकृष्णदास हित सुख निधि निर्मल शरद निसावर चन्दा।।२। नाचत नारि सुधंगे। सूचत तान तरंगे ।। सूचत तान तरंगे रंगे हरि कर वाजत बैना। मृदु पद न्यास सुवास सुपेशल उत्थित कुमकुम रैना।। ताल रबाब मृदंग सुतुंबर नव जस नाद उपंगे। जै श्रीकृष्णदास हित नूपुर कूजत नाचत नारि सुधंगे ॥३॥ राजत ब्रजयूव संगे । दीपन प्रवल अनंगे ।। दीपन प्रबल अनंगे संगे नीरज-नैन बिराजैं। अद्भुत मौलि गुडालक’ पंकति बंक बिलोकन साजैं ।। अनुपम केलि सुधानिधि बरषत रहसि रास रस रंगे। जै श्रीकृष्णदास हित मोहन सुन्दर राजत ब्रजयूव संगे ॥४॥२१॥
गो० श्रीदामोदरबरजी कृत-राग हमीर-
लटकि पटकि पद हो-हो थेई-थेई। रचत नाम स्याम प्यारी कौं उघटत बोलत हरि थेई-थेई। चलत ग्रीव चंचल छबि निरखत कोटि मदन सटकत भव थेई-थेई। सुलप भेद गति भाव नैन सुख सोभित भुव सुधंग कल थेई-थेई। कबहूँ अधर धरें कर मुरली निर्त्तत ताल सहित स्वर थेई-थेई। जै श्रीदामोदर हित प्राण प्रिया पीउ उर धरे अंग भरे तब थेई-थेई॥२२॥ राग हमीर-
नागरी वृषभानु कुंवरि मंद गामिनी । चलत ग्रीव नैन सैन बोलत मृदु मधुर बैन, तत्त थेई-तत्त थेई बदत भामिनी ।।चंचल गति बर सिरोधि भुकूटि कुटिल अलक सोभि, बदन चन्द पिय चकोर मुदित कामिनी। अंसन पर बाहु धरें सनमुख रुख नैन करें, ताल चाल गति मराल चमकत घन दामिनी।। प्रियता भरि हरि समूह आनन्द बह लखि कुतूह, निर्त्तत वा मधुर स्वरन शरद जामिनी। जै श्रीदामोदर हित सुवेस नवल जुगल सुख सुदेस, अद्भुत अति गौर स्याम रसिक स्वामिनी ॥२३॥
राग ईमन-
दोऊ रंगे हैं प्रेम सुरंगे। लटकि-लटकि पद पटकि धरनि पर, नाँचत जुत अँग अंगे। पुलकि-पुलकि प्रीतम उर लागत, मन अनुराग अभंगे। गौर स्याम सुन्दर बर राजत, गान करत विवि संगे॥ नवल कुंवरि रस भीजे मोहन निर्त्तत सरस सुधंगे। तान मान गति वक्र विलोकन उपजत कोटि अनंगे।॥ भृकुटिन मटकत ग्रीव चपल अति, चारु बदन जुग चंगे। सस्मित मुख रुख मिले परस्पर, प्रेम सिंधुरस धँगे।॥ निरखत हरषत लाल लाड़िली, लालन लेत उछँगे। जै श्रीदामोदर हित विलसत यह सुख, आनँद केलि तरंगे ॥२४॥
गो० श्रीकमलनैनजी कृत-राग कान्हरौ-
मंडल नीकौ आजु बन्यौ । अद्भुत मनि नग जटित कनक धर रूप न जात गन्यौ ।। सरस कपूर सु आसपास रचि जमुना पुलिन सुहायौ। तहाँ-तहाँ निर्त्तत प्रीतम प्यारी राग होत मन भायौ।। ताल पखावज बाजत स्वर सों बीच-बीच कर ताल। संगीत उघटत नागरि-नागर चलत चंद गति चाल ॥रह्यौ रंग कह्यौ नहि आवै नैन के नाहि बैन। जै श्रीकमलनैन हित कौ सुख सागर रह्यौ मेरे हिय ऐंन ॥२५॥
राग कान्हरौ-
रास में रसिक बर निर्त्त करत राधे। लेत गति अद्भुत परस्पर नई-नई ता थेई ता थेई ताधे । संगीत भेद कछु कहत न बनि आवै ताल सुर तीन एक रस साधे। करन की मुरन अरु दुरन ग्रीवा सुभग गौर स्यामल सुतनु गुण अगाधे ।। नील पट पीत पट चपल अंग-अंग पर मनौं घन दामिनी ससि अराधे। जै श्री कमलनैन हित सखी चख चकोर रूप झिले देखत प्रेम मन मिले सुख समूह लाधे॥ २६॥
राग ईमन-
प्यारी निर्त्तत छबि पावै। सुन्दर कर कमल लियें, ललित गति फिरावैं॥ नैन चलन करन मुरन, नूपुर बजावैं। कंकन किंकिनी चुरी सरस धुन मिलावै ॥ लचकि लटकि भौह मटकि पिय के मन भावैं। एकटक चकोर जैसे नेकु न पल लावैं॥ कबहुँ-कबहुँ लपटि लालहिं हरखि उर लगाबैं। अधर अमृत प्याइ पियहि सरस स्वरन गावैं॥ रोम-रोम मोहन मन पग परसन धावैं। जै श्री कमलनैन प्रवीन नागरि कुंज महल आवैं ॥२७॥
राग ईमन-
निर्त्तत राधा कमल कर लीनै । थेई-थेई उचरत जबहीं निरखत पिय दूग दीनै।॥ लाही अँगिया अधिक बनी उर और बसन रंग भीने। चितै-चितै मुसकत प्रीतम तन गावत राग नवीने॥ नैन बैन कर पग चंचल पर बारौं खंजन कोकिला मीनै। जै श्री कमलनैन हित रीझि उर लावत निपट बिबस आधीने ॥२८॥
राग ईमन-
रास मंडल रच्यो श्याम संग राधिका। जटित मरकत धरनि मध्य मंडल सु हित नृत्य पग पटकि लटकत सुखद राधिका॥ मुखर नूपुर रुनत कुनत किंकिनी बलय, मधुर धुनि गान अनुमान करि राधिका। लाल संग बाल तिहि काल मणि माल में, कमलवत नैन हित मुकर वत राधिका ॥२९॥
गो० श्री हरिलालजी कृत-राग अडानौं-
नवल ब्रजबाल नव लाल गिरधरन संग, रच्यौ रस रास वर जमुन तीरे। मनहिं सरसाबै हरषाबै बरषाबै रस सुभग पुलिन स्थली सुख समीरे ॥ सुभग पंकज सहस दलन सौं जगमगत मणिन की कान्ति तिहि माहिं छाई। कुंज रस पुंज दल दलन पर झलमलत कोटि राकेश भानन निकाई॥ कबहुँ गावत कबहुँ पढ़त संगीत गति, तत्त थेइ थेई-थेई धुनि सुहाई।। कबहुँ भुज जोरै चित चोरै थोरै-थोरै मुरली रव सहचरी गन लुभाई॥ मिथुन आभरन दंपति छबीले इंदु प्रेम रस सिंधु बन प्रगट कीये। जै श्री हित हरिलाल आनन्द रूपहि निरखि हरखि छिन-छिन प्राण वारि दीये ॥३०॥
गो० श्री रूपलालजी कृत-राग भैरों-चर्चरी-
आज नाचत नवल लाल साजि साज छिन्ना। धिकधिलाम धिक धिलाम बाजत तकितकि धिलाम, नाचत नयनाभिराम धकिट-धकिट धिन्ना। लचकि-लचकि गतिन लेत ठुमकि-ठुमकि चरन देत, कर की करतार देत वदत ठोम ठिन्ना। ललिता वदत भूले श्याम धी धी तकि धी धिलाम, प्यारी हित रूपलाल नच्यौ छनन छिन्ना ।॥३१॥
राग केदारौ-
नृत्य संगीत गतिभेद अभिनय निपुन, यूथ अलि यूथ गुन गन दिखावैं। सप्त स्वर भेद आलाप स्वर ग्राम करि, तान बंधान बहुविध बतावें।। अंग अंगन लटकि भाव भृकुटिन मटकि पग पटकि कोटि मनमथ लजावें। ताल नूपुर बीन गजक मुखचंग मिलि मृदु मृदंगन स्वरन स्वर मिलावैं॥ रीझि लखि सुलप उठि जुगल भुज अंस धरि, अधर धर मुरलिका रव सुनावैं। जै श्री हित लाल रूप अबलोकि निज सहचरी मंडली मध्य विवि दृग सिरावैं ॥३२।
राग केदारौ-
सहचरी मंडली मध्य मणि युगल वर रास रस कुशल बिलसत विलासी। चन्द्रिका मुकट भृकुटिन मटक लटक गति नृत्य संगीत बहु विध प्रकासी ॥ तदनुगत अलि वृन्द गान स्वर भेद युत करत मन सौं मनन मिलि उपासी। किंकिनी वलय नूपुर मधुर मुरलिका ताल वीना मृदंग प्रेम रासी ॥ मूर्छना भेद प्रस्वेद मुखचन्द लखि पीत पट पौछि बलि विपिन वासी। पुहुप बरषावत सिरावत दृगन लाल रूप हित लखि परी प्रेम पासी ॥३३॥
राग केदारौ-
आज देखि कुंज भवन राजत दोऊ रवनी-रवन पूरन शशि सुद्ध रैन बैन बाजै। पुरित स्वर प्राण प्रिये प्रीतम कर कमल लिये सप्त स्वरन गान तान मान सुखन साजें।। ललितादिक वृन्द-वृन्द झुकि-झुकि स्वर देत आलि रंगरली रतिपति लखि कोटि काम लाजें। उघटत गति थेई-थेई-थेई-थेई धुंग-धुंग वीना मुखचंग मधुर मधु मृदंग गाजैं। कवहूँ गति भाव भेद लटकि मटकि भृकुटि जुगल अलग लाग लेत देत प्रेम नृप निवाजैं। भूषन पट कुसुम माल शिथिल बाल रचत लाल लाघव हित रूपलाल सखियन सुख काजें ॥३४॥
निर्त्तत रास मंडल मधि जोरी उघटत उरप तिरप गति तान बंधान मान अभिनय युत थेई-थेई वचन रचन प्रति पद पटकन लटकन कर पल्लव मटकन भृकुटि मदन मति जै श्री रूपलाल हित नूपुर कंकन किंकिनि मुरली धुनि रति ॥३५॥
निर्त्तत सरस सुधंग किशोरी। उघटत दै करतार त्रिभंग थेई-थेई मृदु मुसिकन चित चोरी ॥ कबहूँ प्रीतम प्रिया परस्पर कबहुँ मिलि रस बरषत जोरी। बीन मृदंग ताल स्वर नूपुर मुरली धुनि बाजत थोरी-थोरी ॥ हाव भाव अभिनय सुख संपति नाहिन बचत कछुक दृग कोरी। जै श्रीहित अलि रूप निरखि अंग-अंग छबि कवि बरनत उपमा भई बौरी ॥३६॥
उघटत ललना लाल नचावत। अभिनय लाग डाट गति लै-लै ललितादिक स्वर सरस मिलावत। रीझि-रीझि मणि भूषण वारत हारत कोटि प्राण सचु पावत। श्रमकन हेर फेर पीताम्बर पौछि-पौछि अलि नैन सिरावत ।। वरषत सुमन मुदित मन सहचरि जै-जै बानी कहि सरसावत। जै श्री रूपलाल हित रास रसिक वर रस बस है उर-उर हरषावत ॥३७॥
निर्त्तत रास रसिकनी स्यामा स्याम अंस पर भुजा धरें। नखसिख आनँद पुंज अंग-अंग उरप तिरप गति लै उचरें।। रस सरिता ललितादिक सहचरी एक रूप गुन सील भरीं। ताल मृदंग उपंग बजावत गावत विवि अनुराग ढरीं।। अलग लाग गति लेत छबीले रसिक रसीले सुख सींवा। लटकि-लटकि मंडल मधि दंपति हाव भाव लखि सखि जीवाँ ।। अमर बिमान सकल नभ छायौ गायौ जस शिव विधि रागी। जै श्री रूपलाल हित सहज सनेही जो निरखै सो बढ़ भागी॥३८॥
निर्त्तत रास विहारी बिहारिन सहचरि मंडल यूथ कियें। तान बंधान मान थेई-थेई उघटि सरस संगीत लियें ।। लटकि मटकि पग धरत कुँवरि वर भुज जोरैं आनन्द हिये। ताल मृदंग उपंग बजावत ललितादिक सखि संग लियें ।। शरद निशा सुख विलसत भामिनि दामिनि घन अनुराग दियें। जै श्री रूपलाल हित नेह-नीर बरषत चात्रिक रसिक जियें ॥३९॥
बंशीवट जमुना तट सुन्दर पुलिन रास रस छबि धारी। मंडल मधि निर्त्तत मन मोहन प्राण नाथ प्रीतम प्यारी ॥ मुकट चन्द्रिका मटकन लटकन ठिठुकन कोटि अनंग कियें। मुरली मधुर बजावत गावत सप्त स्वरन के भेद लियें ।। मृद मृदंग स्वर बीन लीन गति ताल सुलप अद्भुत सोहैं। भृकुटिन भंग रंग बरषावत हाव भाव सहचरि मोहै। अधर पान रस मत्त छबीले छके छबीली छबि हेरे। जै श्री रूपलाल हित पान खबावत पानदान लियें बिबि नेरे ॥४०॥
आज नंद नंद ब्रजचंद आनन्द निधि तरनिजा तीर मन मोद कारी। कुज रस पुंज अलि गंज धुनि सुनि मगन शरद उडुराज राका निहारी ॥ मुकट वनमाल पटपीत कुंडल किरन मंद मुसिकन अलक घूँघरारी। वाम भुज अंस परसंस अहला दिनी सकल सुखदान रसखान प्यारी ॥ सप्त स्वर भेद गति छाइ रही मुरलिका प्रेम मकरंद रस वस विहारी। जै श्री रूपहितलाल ललितादि गुन गावहीं भावहीं केलि दंपत्ति निहारी ॥४१॥
द्रमन तर स्याम अभिराम वृन्दाविपिन वचनिका बंशीकरी प्रान प्यारे। त्रिविध तहँ पवन को गवन नित ही रहत स्वच्छ नव कमल प्रफुलित निहारे। वर्हिआपीड नटवर वपु विराजही करन कुंडल दिये चित्त चोरे। कनक कपिस पीत पट बैजयंती बनी कमल दल नैंन भृकुटी मरोरे ॥ प्रेम ध्रुब महा भुज निरखि अंग-अंग दुति सकल उपमा रही थकि बिचारी। जै श्री हित रूपलाल बड़ भाग तिनकौ सखी नंन भरि लाल छबि हृदे धारी ॥४२॥
मंजु कल कुंज तल विमल मंडल रच्यौ नवल रस रासि सुख सिंधु जोरी। सहचरी वृंद ललितादि गुन गाबहीं परस्पर लेत अति गति न थोरी॥ प्राण समतूल अनुकूल पिय अंस भुज जोरि स्वर ग्राम अभिराम गावैं। सखी गुन धाम हिय नेह रस सौं भरी ताल बीणा मृदंग संग बजावैं॥ नृत्य गति भेद सौं तत्त थेई-थेई उघटि मुकुट लटकन सबन चित्त चोरी। खेद’ कृत स्बेदजल’ चंद मुख राजहीं भाव भरि भेद भृकुटी मरोरी॥ सिथिल भूषण बसन कुसुम अंग-अंग तें अधर रस पान करि सुखन साजें। जै श्री हित रूपलाल के बसौ हिय सदा यह दंपति बिहार आनंद गाजैं ।॥ ४३॥
गो० श्री गोबर्द्धन लाल जी कृत-
लाड़िले नबेले अलबेले सुकुमार दोऊ जमुना के तट रास खेले बंशीबट पै। शरद सुहाई निशि चन्द्र कौ प्रकाश पूर्ण शोभित कमल फूल रहे जल तट पै॥ अति ही मनोहर है पुलिन की कांति तहाँ मंडल बनाय सखी निर्त्तत हैं गति पै। अगनित बाजे चहुँ ओर तें बजत तामे नूपुर की धुनि सुनि मोह्यौ रति पति पै॥ ऐसेई सदा रास करत विपिन मध्य शरद-बसंत नित रहत टहल पै। करहु अनुग्रह मोहि अपनौई जन जानि जै श्रीगोवर्द्धन हित नैन देखें पल-पल पै।॥४४॥
श्री हरिराम व्यास जी कृत-राग सारंग-
बन्यों बन आजु कौ रस रास। श्यामा श्यामहिं नाँचत गावत, बाढ्यौ बिबिध विलास ॥ सरद विमल निसि ससि गो
मण्डित, दुहुँ दिसि कुसुम विकास। भूषन पट अटके नट नागर, उड़त पराग सुवास ॥ अंगन कुँवरि अनंग नचावत भृकुटि भंग मुख हास। नव नागरि इक निसान बजावत, सुनत सकल सुख व्यास ।।४५॥
राग सारंग-
रास रच्यों बन कुंज बिहारी। सरद मल्लिका देखि प्रफुलित, बन आई पिय प्यारी। वाम श्याम कैं श्यामा सोभित, जनु चाँदनी अँधियारी। भूषन गन तारका तरल मनौं बदन चन्द छबि उजियारी ॥ कोमल पुलिन कमल मंडल पहुँ मण्डित नवल दुलारी। बाजत ताल मृदंग संग नव अंग सुधंग सिंगारी॥ रति अनंग अभिमान भग है, पदरज घसत लिलारी। तान बान सुर जान विमोहत, मोहन गर्व प्रहारी।। सहज रूप गुन सागर नागर, बलि लीला अवतारी। व्यास बिनोद मोद रस पीवत, जीवत विवस विहारी ॥४६॥
राग केदारौ-
पिय कौं नाँचन सिखबत प्यारी। वृन्दावन में रास रच्यौ है, सरद चन्द उजियारी॥ ताल मृदंग उपंग बजावत प्रफुलित द्वै सखी सारी। बीन वेणु ध्वनि नूपुर ठुमकत, खग-मृग दसा बिसारी।। मान गुमान लकुट लियें ठाढ़ी डरपत कुंज बिहारी। व्यास स्वामिनी की छबि निरखत हँसि-हँसि देंकरतारी ॥४७॥
राग सारंग-
छबीलौ वृन्दावन कौ रास। जा पर राधा मोहन विहरत, उपजत सरस विलास। जीवन मूरि कपूर धूरि जहाँ उड़त चहूँ दिसि बास। जल थल कमल मंडली विगसत, अलि मकरन्द निवास।। कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि, खग मृग तजत न पास। तान बान सुर जान बिमोहित, चन्द सहित आकास ॥सुख सोभा रस रूप प्रीति गुन, अंगन रंग सुहास। दोऊ रीझि परस्पर भेटत छाँह निरखि बलि व्यास ॥४८॥
राग आसाबरी या सारंग-
बृषभान नन्दिनी सरद चन्दिनी नटत गोविन्द संगे। जगत वन्दिनी सूरनन्दिनी तट बंसीवट नागर मिलि प्रगट सरस सुधंगे। रास रच्यौ गुन रूप सज्यौ न. विनोद बच्यौ देसी अंग अंगे। ताल मान बन्धान गति रति पति निरखि मन मान भंगे। कंकन किंकिनि नूपुर धुनि मिलि सुनियत ताल मृदंगे। हस्तक मस्तक भेद दिखावत उमगत उरज उतंगे।। भृकुटि बिलास बंग अबलोकन, मन्द हास उपजत तरंगे।
व्यास स्वामिनी के रस गावत तरु-मृग भँवर विहंगे ॥४९॥
राग केदारौ-
सरद सुहाई जामिनि भामिनि रास रच्यौ। वंशीवट जमुना-तट सीतल मन्द सुगन्ध समीर सच्यौ। बजत मृदंग ताल राधा संग, मोहन सरस सुधंग नच्यौ। उरप तिरप गति सुलप लेत अति निरखत विथकित मदन लच्यौ । कोक कला संगीत गीत रस रूप मधुरता गुन न बच्यौ। भृकुटि बिलास हास अवलोकत, व्यास परम सुख नैन खच्यौ ॥५०।
राग केदारौ-
बृषभान कुँवरि गान करत बंशीवट मूले। नाँचत गोपाललाल अंग संग कूले ॥ कुंज भवन कोक कुशल सुरत डोल भूले। दसन अधर नैन निरखि व्यास बिकच फूले॥५१॥
राग बिलाबल-
प्यारे नाँचत प्रान अधार। रास रच्यौ बंसीवट नट नागर वर सहज सिंगार। पाइन की पटकार मनोहर, पैंजनि की झनकार। रुनु झुनु नूपुर किंकिनि बाजत संग पखाबज तार ॥ मोहन धुनि मुरली सुनि कर तब मोहे कोटिक मार। स्थाबर जंगम की गति भूली, भूले तन व्योहार ॥ अंग सुधंग अनंग दिखाइ रीझि सर्वसु दोऊ देत उदार। व्यास स्वामिनी पिय सौं मिलि रस राख्यौ कुंज बिहार ॥५२॥
राग सारंग व कान्हरौ-
आजु बनी अति रास मंडली, नदी जमुना के तीर सहेली। नाँचत गति बृषभान नन्दिनी, मकर चाँदनी रात नवेली॥ मानहुँ कोटिक गोपी धायत, फिरत राधिका तरल अकेली। संभ्रम तितने रूपन धरि हरि, आतुर रह्यौ कंठन भुज मेली॥ अद्भुत कौतुक प्रगट करत दोऊ, नाँचत माँचत ठेला-ठेली। अति आवेश वेस पट भूषन, सिथिल सिन्धु रस झेला-झेली॥ जै-जै ध्वनि सुनि खग मृग मोहे पुलकित धन्य कुंज तर केली। बिबिध बिहार व्यास की स्वामिनी, पिय मोहन सौं हिलि मिलि खेली ॥५३॥
राग कमोद-
नमो जुग जुग जमुना तट रास। सरद सरस निसि चन्द चन्द्रिका, मारुत मदन सुवास ॥ नटबर वेष सुरेख राधिका, अंग सुधंग निवास। देसी सरस सुदेस दिखावत, नैनन नैन विलास ॥ तिरप मान में तान लेत दोऊ, सुर बंधान उसास।औधर सुधर अतीत अनागत रीझि जनावत हास।। दंपति की गुन गति निरखत रति कोटि मदन मद नास। अति आवेस केस कुल विगलित, वरषत कुसुम विकास ।। बाहुन बीच नाहु गोरिहि गहि, लेत मधुर मधु ग्रास। विवश भये रस लम्पट जानत, रस में लाज विनास। व्यास स्वामिनी पियहिं हिये दै, लीनौं कुंज अवास॥५४॥
राग कान्हरौ-
सुधर राधिका प्रवीन बीना वर रास रच्यौ, श्याम संग वर सुधंग तरनि तनया तीरे। आनन्द कन्द वृन्दावन सरद चन्द मन्द पवन, कुसुम पुंज ताप दवन धुनित कल कुटीरे ।। रुनित किंकिनी सुचारु, नूपुर मनि वलय हारु, अंग रव मृदंग तार तरल तिरप चीरे। गावत अति रंग रह्यौ मोपै नहिंजात कह्यौ, व्यास रस प्रवाह बह्यौ निरखि नैन सीरे ॥५५॥
राग पूर्वी या सारंग-
जमुना तट दोऊ नाँचत नागर नट कुँवरि नटीं देखत कौतुक भूलि रह्यौ शशि, आनन्द निसि न घटी।। बाजत ताल मृदंग उपंग अंग सुधंग ठटी। लटकत लट पट झटकि पटकि पद, मटकत भृकुटि तटी ।। मानहुँ सनमुख सिन्धुहि मिलि रस सरिता भरि उपटी। हस्तक मस्तक भेद दिखावत, गावत एक गटी।। तान बन्धान बेधि सुर बनिता बिथकित लाज कटी। नारद सारद और गुनी को, परदा सबै फटी। लोक चतुर्दश माँझ व्यास की स्वामिनी गुनन गटी ॥५६॥
राग बिलाबल-
श्याम वाम अंग संग नाचत गति वर सुधंग, रास रंग भरी सुभग भामिनी। तरनि तनया तीर खचित मृदुल रचित कनक हीर त्रिगुन सुख समीर सरद चन्द जामिनी ॥ चरण रुनत नूपुर कर कंकन कटि किंकिनी धनि सुनि खग मृग मोहि गिरत काम कामिनी। पञ्चम सुर गान तान गगन मगन भये आन, भगन मगन जान गिरत मेघदामिनी ।। झपताल ताल उरप लेत तिरप मान सुखहि, चन्द सुघर औघर बर सुलप गामिनी। नयन लोल मधुर बोल भृकुटि भंग कुच उतग, हँसत पियहिं विवश करत व्यास स्वामिनी ॥५७॥ लास
राग कामोद-
नाचत नन्द नन्दन वृषभान नन्दिनी बनी, रास रंग अंग संगीत तरनितनया तीरे। राका निसि सरद ससि कर रञ्जित, वृन्दावन फूल जाहि जुही मलय धीर समीरे ॥ घुंघरी पद बाजत कटि किंकिनी कर कंकन रव, कंठ माल श्रवन फूल चल दुकूल धीरे। मन्द हास मधुर बैन ध्रुव विलास नैन सैन, देखत मुख भगत ताप होत हृदै सीर ॥ पञ्चम धुनि गावत पटु तान सुनि विमान विकल, वृन्दारक’ वृन्द वधू विगलित वर चीरे। कुसुमाबलि वरषि हरषि श्याम कहैं, हो-री-हो, वारि फेरि देत व्यासहिं भूषन पट पीरे॥५८॥
राग सारंग व गूजरी चंचरी-
नाचत बृषभान कुँवरि हंससुता पुलिन मध्य, हंस हंसिनी मयूर मंडली बनी। गावत गोपाल लाल मिलवत झपतार ताल, लाजत अति मत्त मदन कामिनी अनी’ ।। पदिक लाल कण्ठ माल तरल तिलक झलक भाल, श्रवन फूल वर दुकूल नासिका मनी। नील कंचुकी सुदेस चंपकली कलित केस, मुखरित मनि दाम वाम कटि सुकाछिनी ।। मरकतमनि वलयराब मुखर नूपुरन सुभाव, जावक युत चरनन नख चन्द्रिका वनी। मन्दहास भू-विलास रास लास सुख निवास अलग लाग लेत सुधर राधिका बनी।। काम अन्ध कितव बन्ध रीझ रहे चरण गहे, साधु-साधु कहत रहत राधिका धनी। भेंटत गहि बाहु मूल उरज परसि भई फूल, व्यास बचन सानुकूल रसिक जीवनी ॥५९॥
राग नट-
नागरी नट नारायन गायौ। तान मान बधान सप्त सुर, रागहिं राग मिलायौ ।। चरन घूँघरु जंत्र भुजन पै, नीकौ झमकि जमायौ। तत्त थेइ तत्त थेई लै गति में गति, पति ब्रजराज रिझायौ ।। सकल तियन में सहज चातुरी अंग सुधंग दिखायौ। व्यास स्वामिनी धनि-धनि राधा राग में रंग रचायौ ॥ ६०॥
राग बिहागरौ-
दोउ मिलि देखत सरद उज्यारी। बिछी चाँदनी मध्य पुलिन के, तास जरी फुलकारी ॥ सेत बादलौ सेत किनारी, ऐसी है यह सारी। हीरन के आभूषन राजत, जो बृषभानु दुलारी।। मोतिन की मालावलि उर में, पहिरैं कुंज बिहारी। रतन जटित शिरपेच कलंगी, मोर, चन्द्रिका न्यारी ॥ सखियों संग एकसी सुन्दर, मानी चन्द्र कला री। बाजे बहु बाजें अरु गावहिं, सखियाँ निर्त्तत बारी-बारी। यह सुख देखत नन्द लाडिली, अरु कीरति की प्यारी। इनकी प्रीति रीति भक्तन सौं, व्यास दासि बलिहारी ॥६१॥
राग सारंग-
नाँचत नागरि नटवर वेष धरि सुख सागरहि बढ़ावत। सरद सुखद निसि ससि गो रंजित, वृन्दावन छवि रुचि उपजावत ताल लये गोपाल लाल संग, ललिता ललित मृदंग बजावता हरिवंशी हरिदासी गावत, सुघर प्रवीन रबाब बजावत।।। मिथित धुनि सुनि खग-मृग मोहित जमुना जल न बहावत। हरषित रोम तन सोम थकित धर व्योम विमान गिरावत लेत तिरप विगलित मालावलि, कुसुमावलि बरषावत। जय जय साधु कहत हरि सहचरि व्यास चिराग दिखावत ॥६२॥
राग केदारौ तथा कल्याण-
रसिक सुन्दरी बनी रास रंगे। सरद ससि जामिनी पुलिन अभिरामिनी, पवन सुख भवन वहै वन विहँगे।। नील पट भूषनन नटवर सुवेष धरि, मदन मुद्रा वदन कुच उतंगे। चरन नूपुर रुनित कटिव किंकिनि क्वनित कर सुकंकन चुरी रव अभंगे। चरन धरनी धरत लेत गति सुलप अति, तत्त थेई-थेई नदत मनि मृदंगे। चर्चरी ताल में तिरप बाँधत बनी, तरकि टूटी तनी बर सुधंगे। सप्त सुर गान पटु तान बंधान में, मान औघर सुघर अंग अंगे। सरस मृदु हासिनी नैन सैनन लसत, निरखि त्रिभुवन बधू मान भंगे। विविध गुन माधुरी सिन्धु में मगन दोऊ, लसत गोरी बसत पिय उछंगे। थकित चन्दन पवन चन्द मन्दार कुल, सोम बरषत व्यासदास संगे॥६३॥
राग भैरब-
श्यामा सँग श्याम नचत रास रंग गुन न बचत, ससि अखण्ड मण्डल हँसि सरद जामिनी। तरनितनया तीर मृदुल अच्छ सित रज पुनीत, त्रिविध पवन ताप दवन काम कामिनी ।। चरन चलित बाहु बलित ललित गान कलित तान, मान सुर बन्धान तिरप लेत भामिनी। बर सुधंग रंग ताल मनि मृदंग चन्द चाल, लाल सुघर औघर गजराज गामिनी ।। रिझै पतिहि गति दिखाइ लेत कुँवर कण्ठ लाइ, श्याम घटा माँझ मनहुँ दुरत दामिनी। नैन सैन भ्रू विलास मन्द हास सुख निवास, सुनिधुनि मुनि बोलत जय व्यास स्वामिनी ॥६४॥
राग गौड मलार-
विराजमान कान्ह वृषभान कुँवरि गान करत रूप गुण निधान सुभग स्याम भामिनी। राग तान बान लगत व्योम यान मान डगत कोटि चन्द्र मन्द थकित काम कामिनी । अंग भरि सुधंग नचत देखि सुघर सभा लजत आनन्द रस झरी लसत मेघ दामिनी। भ्रू विलास मन्द हास नैन पर विनोद रास कुँवर कण्ठ पास दास व्यास स्वामिनी ॥६५॥
राग धनाश्री-
राजत दुलहिन दूलह संग। रास रच्यौ राधा मोहर मिलि गुन सागर झिलि रंग। कमल मंडली पुलिन खंड पै चन्द्र किरन अनुसंग। गावत कोकिल कल स्वर बाजत भूष ताल मृदंग। बीच-बीच मुरली मन चली बाजत मुख मुखचंग। सुघर सुकेकी देसी दिखावत, लालहि फवत सुधंग चंचल चरनन अंचल अति गति उपजाबत ध्रुव भंग। स्वेर बिंदु गोविंद कलानिधि पौछत उरज उतंग।। हस्तक मस्तक भेद दिखावत गावत गिरत अनंग। गौर छटा छबि में दवि निकसत स्यामल के सब अंग॥ विहसत दुरि दामिनि धुरि सुनि-सुनि मोहे वारि विहंग। सैनन निरखत व्यास दासि के फूले नैन कुरंग॥६६॥
राग कल्याण-
रूपवती रसबती गुनवती राधा प्यारी, प्रगट करत अति सरस सुधंग। उरप तिरप गति भेद लेत अति नटवत मिलवत तान तरंग।। रिझवत मोहनलालहिं छाती सों लगाइ लेत, देत अधर मधु प्रीति अभंग। कोकवती रति विपरीत वितरत, निरखत व्यासहि सुख अंग-अंग ।॥६७॥
राग गौरी-
गोरी गायौ सुनि स्याम रिझायौ। लटक्यौ मुकुट पीतपत झटक्यौ चटक्यौ री नासापुट सुंदर कर ते बैनु गिरायौ। नैनन असुबाँ गिरत श्रमित अति कपित जानि रवकि उर लायौ। व्यास की स्वामिनी कुंज महल में, अधर सुधा रस प्यायौ ॥६८॥
राग मलार-
प्यारी नाचत रंग रह्यौ । पिय के बैन बजाबत गावत, सुख नहिं परत कह्यौ । कोमल पुलिन नलिन मंडल महँ, त्रिविध समीर बह्यौ। विथकित चन्द मन्द भयौ पथ चलबे कहँ रथ न रह्यौ। कंकन किंकिनि नूपुर सुनि मुनि कन्यन कौ मन उमह्यौ। उलट बह्यौ जमुना जल सब के नैनन नीर बह्यौ । अंग सुधंगन की गति कौ पति नहि मरम लह्यौ। निरखत स्यामहि काम बढ्यौ रस भंग न परतु सह्यौ । व्यास स्वामिनी नैन सैन दै नागर विहँसि गह्यौ ॥६९॥
राग बिहागरौ-
देखि शरद कौ चन्दा नंदनंदा वन रास रच्यौ री। बिच गोपी बिच स्याम छबीलौ, राधा संग नच्यौ री।। मनहुँ नील मनि कंचन माला मंडल खण्ड खच्यौ री। अंग सुधंग दिखावत गावत सुनि धुनि मदन लच्यौ री ॥ भृकुटि विलास हास रस वरषत, जमुना पुलिन मच्यौ री। सीतल मंद सुगंध त्रिविध ता सौरभ सरस सच्यौ री।। नित्य विहार निहार मुकतिपति, तू बे काज पच्यौ री। मोद विनोद रास निज दास व्यास सुख पुंज सच्यौ री ॥७०॥
राग केदारौ-
नाँचे गोपाल बनै नटबर बपु काछें। गावत गति मिलवत अति राधा के पाछें। किंकिनि कंकन नूपुर धुनि ताल मृदंग सोहे। मंद हास भ्र-बिलास सैनन मन मोहे। तरुवर गिरिका मृग नाद-बान पोहे। वृन्दारक वृन्द वधू तारक विधु मोहे। समीर नीर पंग भयौ, बालक न पथ प्यावैं। व्यास सकल जीव जंतु नाद स्वाद ज्यावैं॥७१॥
राग सारंग-
बजावत स्यामहि विसरी मुरली। मोहन स्वर आलाप जु गायौ राधा चित-वित चुरली ।। अरुन बरन दिसि निसि ससि विकसित सकुचत कमल कली। तमचुर सुर सुनि मिलि बिछुरी चकबन की जोटि छली ॥ फूली धरनि सदा गति भूली तरनि सुता न चली। बिकल भँबर पिक पथिक अचल पथ रोकत कुंज गली। स्थाबर जंगम संगम बिछुरे सबकी गति बदली। कै यह मरम जानि है महलिन कै जु व्यास बृषली ॥७२॥
राग कमोद-
कुंज-कुंज प्रति रति वृन्दाबन, द्रुम-द्रुम प्रति रति रंग। बेलि-बेलि प्रति केलि फूल प्रति फल प्रति विमल विहँग॥ कंठ कंठ प्रति रास रागिनी सुर प्रति तान तरंग। गौर स्याम प्रति स्याम वाम प्रति अँग प्रति सरस सुधंग। मुख प्रति मन्द हास नैनन प्रति सैन भौंह प्रति भंग। रास बिलास पुलिन प्रति नागर प्रति नागरि कुल संग।। रूप-रूप प्रति गुन सागर सहचरि प्रति ताल मृदंग। अधरन प्रति मधु गंडन प्रति विधु उर प्रति उरज उतंग।। कहत न आवै सुख देखत मुख मोहे कोटि अनंग। व्यास स्वामिनी राधाहि सेवहिं, स्याम धरैं बहु अंग॥७३॥