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Padawali Utsav

मंगला के पद

  • November 30, 2025
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मंगला के पद
मंगला के पद

गो० श्रीहितहरिवंशचन्द्र महाप्रभुजी कृत-राग बिलाबल

तू रति रंग भरी देखियत है री राधे, रहसि रमी मोहन सों व रैन। गति अति शिथिल प्रगट पलटे पट, गौर अंग पर राजत अन॥ जलज कपोल ललित लटकत लट भृकुटि कुटिल ज्यौं धनुष धृत मैंन। सुन्दरि रहव कहव कंचुकि कत कनक कलश कुच बिच नख दैन । अधरविंव दलमलित आरस युत, अरु आनंद सूचत सखि नैन। जै श्रीहित हरिवंश दुरत नहिं नागरि, नागर मधुप मथत सुख सैन॥१॥

राग धनाश्री-

वृषभानु नन्दिनी राजत हैं। सुरत रंग रस भरीं भामिनी सकल नारि सिर गाजत हैं। इत उत चलत परत दोऊ पग, मन्द गयन्द गति लाजत हैं। अधर निरंग रंग गंडन पर कटक काम कौ साजत हैं। उर पर लटकि रही लट कारी, कटिव किंकनी बाजत हैं। जे श्रीहित हरिवंश पलटि प्रीतम पट जुवति जुगति सब छाजत हैं॥२॥

राग विभास-

आज तौ जुवती तेरौ वदन आनन्द भस्यौ पिय के संगम के सूचत सुख चैन। आलस वलित बोल सुरंग रँगे कपोल, विथकित अरुण उनीदे दोउ नैन॥ रुचिर तिलक लेश किरत कुसुम केश, सिर सीमन्त भूषित मानौं तैं न। करुणाकर उदार राखत कछ न सार, दसन बसन लागत जब दैन । काहे को दरत भीर पलटे प्रीतम चीर, बस किये श्याम सिखै शत मैन। गलित उरसि माल शिथिल किंकिणी जाल, जय श्रीहित हरिवंश लता गृह सैन ॥३॥

राग विभास-

आज प्रभात लता मन्दिर में सुख बरषत अति हरषि जुगल वर। गौर स्याम अभिराम रंग भरे लटकि-लटकि पग धरत अवनि हर ॥ कुच कुमकुम रञ्जित मालावलि सुरत नाथ श्रीस्याम धाम धर। प्रिया प्रेम के अंग अलंकृत चित्रित चतुर शिरोमणि निज कर ॥ दम्पति अति अनुराग मुदित कल गान कर मन हरत परस्पर। जय श्रीहित हरिवंश प्रसंस परायन गायन अलि सुर देत मधुर तर ॥४॥

राग टोड़ी-

अपनी बात मोसौं कहि री भामिनी, औंगी मौंगी रहत गरव की माती। हौं तोसौं कहत हारी सुनि री राधिका प्यारी, निसि कौ रंग क्यों न कहत लजाती ॥ गलित कुसुम बैनी सुनि री सारंग नैनी, छूटी लट अचरा वदत अलसाती। अधर निरंग रंग रच्यौरी कपोलन, जुवति चलत गज गति अरुझाती ॥ रहसि रमी छबीले रसन वसन ढीले, शिथिल कसन कंचुकी उर राती। सखी सों सुनि श्रवन वचन मुदित मन, चली हरिवंश भवन मुसिकाती ॥५॥
राग देवगंधार-

आज अति राजत दंपति भोर। सुरत रंग के रस में भीने, नागरि नवल किशोर ॥ अंसन पर भुज दिये विलोकत, इन्दु वदन विवि ओर। करत पान रस मत्त परस्पर, लोचन तृषित चकोर ॥ छूटी लटन लाल मन करप्यौ, ये याके चित चोर। परिरंभन चुंवन मिलि गावत, स्वर मन्दर कल घोर ॥ पग डगमगत चलत बन विहरत, रुचिर कुंज घन खोर। जै श्रीहित हरिवंश लाल ललना मिलि, हियौ सिरावत मोर ॥६॥

पद-

आज बन राजत युगल किशोर । नन्द नन्दन वृषभानु नन्दिनी, उठे उनीदे भोर ॥ डगमगात पग धरत शिथिल गति, बरसत नख शशि छोर । दसन वसन खंडित मषि मण्डित, गंड तिलक कछु थोर ॥ दुरत न कच करजन के रोके, अरुन नैन अलि चोर। जय श्रीहित हरिवंश सँभार न तन मन, सुरत समुद्र झकोर ॥७॥

पद-

लटकत फिरत युवति रस फूली। लता भवन में सरस सकल निसि, पिय संग सुरत हिंडोरे भूली॥ यद्यपि अति अनुराग रसासव पान विवस नाहिंन गति भूली। आलस बलित नैन विगलित लट, उर पर कछुक कंचुकी खूली ॥ मरगजी माल शिथिल कटि बंधन, चित्रित कज्जल पीक दुकूली। जय श्रीहित हरिवंश मदन सर जरजर, विथकित श्याम सजीवन मूली ॥८॥
राग कल्याण-

आज सँभारत नाहिंन गोरी। फली फिरत मत्त करनी ज्यौं, सुरत समुद्र झकोरी ॥ आलस बलित अरुण धूसर मणि, प्रगट करत दूग चोरी। पिय पर करुण अमी रस बरषत, अधर अरुणता थोरी ॥ बाँधत भंग उरज अबज पर, अलकन वंध किशोरी। संगम किरच-किरच कंचुकी वँध, शिथिल भई कटि डोरी॥ देत असीस निरखि जुवती जन, जिनकैं प्रीति न थोरी। जय श्रीहित हरिवंश विपिन भूतल पर संतत अविचल जोरी॥९॥

पद-

आजुऽव देखियत है हो प्यारी रंग भरी। मोपै न दुरत चोरी वृषभानु की किशोरी, शिथिल कटि की डोरी नंद के लालन सों सुरत लरी। मोतियन लर टूटी चिकुर चंद्रिका छूटी, रहसि रसिक लूटी गंडन पीक परी। नैनन आलस वस अधर विंवन रस, पुलक प्रेम परस जय श्रीहित हरिवंश री राजत खरी ॥१०॥

राग बिलाबल-

अति ही अरुण तेरे नैन नलिन री। आलस जुत इतरात रंगमगे भये निशि जागर मखिन मलिन री।। शिथिल पलक में उठत गोलक गति विंधयौ मोहन मृग सकत चलि न री। जै श्रीहित हरिवंश हंस कल गामिनि संभ्रम देत भ्रमरन अलिन री ॥११॥
राग कान्हरौ-

वल्लवी सु कनक वल्लरी तमाल स्याम संग लागि रही अंग-अंग मनोभिरामिनी ॥ वदन जोति मनों मयंक अलक तिलक छवि कलंक, छपत श्याम अंग मनों जलद दामिनी ॥ विगत वास हेम खम्भ मनों भवंग बैनी दंड पिय के कंठ प्रेम पुंज कुंज कामिनी। जै श्रीशोभित हरिवंश नाथ साथ सुरत आलस वंत, उरज कनक कलश राधिका सुनामिनी॥१२॥

पद-

श्रीराधावल्लभ प्रातहि जागे। रजनी बीत गई सब बिलसत अंग-अंग अनुरागे ॥ कुचन अग्र नख रेख बनी मनों मदन युद्ध सर लागे। फिरत अवनि पर रंगमगे दोऊ मरगजी माल सुरत रस पागे। बैनी बंध सिथिल कच छूटे सुरंग अधर मषि दागे। जै श्रीदामोदर हित निरखि सखी सुख मानत हैं अपने बड़ भागे ॥१३॥

पद-

श्रीराधिका वर प्रान वल्लभ सकल निसा जागे। घूँमत अति नैन बैन आलस जुत सुखहि चेन महा मत्त वचन कहत प्रियता अनुरागे ।। स्याम अंक कनक बेलि भामिनि सुख सिंधु झेलि, करत केलि जुगल लाल उर सों उर लागे। कोकिल कल नदत कीर केकी नव भ्रमर भीत, निरखत सुख सदा सखी मानत बड़ भागे। गंडन पर पीक लीक मंडित मषि ललित नीक, नव निकुंज सुखन पुंज विलसत रस पागे। जै श्रीदामोदर हित किशोर बने भोर चितहि चोर, मंद-मंद सप्त सुरन राग रूपे रागे ॥१४॥
पद-

नागरी नव लाल संग रंग भरी राजें। श्याम अंस बाहु दियें कुंवरि पुलकि-पुलकि हिये, मन्द मन्द हँसत प्रिये कोटि मदन लाजें ॥ तरु तमाल श्याम लाल लपटी अंग कनक बेलि निरखि सखी छवि सकेलि नूपुर कल बाजें। जै श्रीदामोदर हित सुदेश सोभित रस सुख सुवेस नव निकुंज भँवर गंज कोकिल कल गाजें ॥१५॥

पद-

विलसि बिहारिन रैन रसमसी प्रिय अनुराग भरी उर लागी। अंग-अंग डुति दीपति झलकत सकुचि लजात सकल निसि जागी ॥ आलस जम्हात सुरत रस रंजित लाडिली लाल लाड़ युत पागी। जै श्रीलाल रूप हित अलि अवलोकत भावक भाव करें जु सभागी ॥१६॥

पट अन्तर मरजाद विसारी। मिलि रस रसिक-रसिकनी तन मन सुख संपति उर धारी ॥ कर अंगुरिनु चटकाय जाइ बलि हरषत लाल बिहारी। जै श्रीहित अलि रूप-रूप छकि दंपति सहचरि लखि दृग बारी ॥१७॥

पद-

पिय मन मधुप चारु अति चंचल नवल प्रिया तन अद्भुत बारी। रूप बेलि सीची आनंद जल अंग-अंग फूली फुलवारी॥ नव पल्लव कटाक्ष नैनन की लहलहान चितवन अनियारी। मुकलित वैस मंजरी मौरी ताकौं सेवत लाल सदा री। अम्बुज वदन पराग अधर मधु पान करत रस मत्त बिहारी। जै श्रीकिशोरीलाल हित प्रेम परावधि सब गुण रासि प्रवीन महा री ॥१८॥

फुटकर पद

पद-

आजु पिय के सँग जागी भामिनि । चोरी प्रगट करत तेरे अँग, रति रँग राचे जामिनि ॥ भूषण लट अंचन न सम्हारत, हँसत लसत जनु दामिनि । पुलकित तन श्रम जलकन शोभित, वेपथ जुत गज गामिनि ॥ फूले अधर पयोधर लोचन, उर नख भुज अभिरामिनि । गंडन पीक मषी न दुरावत ‘व्यास’ लाज नहीं कामिनि ॥१९॥

राग असावरी-

प्रात समैं उठे दोऊ प्रजंक पर सौरभ सरस स्वाद लपटात। लोचन ललित अरुन निसि जागे सुरत अंत पुनि-पुनि ललचात ।। अति रस मत्त सुरत रस सागर वचन रचन कहि मृदु मुसिकात। नागरीदास दंपति संपति विलसि-विलसि सुख ये न अधात ॥२०॥

राग भैरौं-

प्यारी जोर करज तन मोरत। बंक विशाल छबीले लोचन, भू-विलास चित चोरत ॥ कनक लता-सी आगे ठाढ़ी मन अरु दृष्टि अगोरत। उघरी वर कुच तटी पटी ते छवि मरजादहिं फोरत ।। अति रस विवस पियहिं उर लावत केलि कलोल झकोरत। नागरीदास ललितादि निरखि सुख लै बलाय तृन तोरत ॥२१॥
कवित्त-

चली उठि पलका तें अली काह भाँति भली लटकि-लटकि पिय पर अलसानकी। लाइ-लाइ वदन मदन उपजाइ लेत ज्याइलेत जियहि मुरन मुरवान की ॥ जोरि-जोरि भुज मोरि-मोरि तन अँगरान उकसत से कूच कलसान दरसान की। वल्लभरसिक कौं विकान ही की बान परी जानि परी बान तोहि मृदु मुसिक्यान की ॥२२॥

राग ललित-

रमी री तू प्राण नाथ के संग। मोसों कहा दुरावत प्यारी, प्रगट जनावत अंग॥ अधर दसन लागे निज पिय के पीक कपोल सुरंग। शिथिलित वसन मरगजी अँगिया नख छत उरज उतंग।। कृष्णदास प्रभु गिरिधर पिय कौ रूप पियो दृग भृंग। डगमगात पग धरत धरनी पर करत मदन मान भंग ॥२३॥

पद-

आजु किशोरी लेत हिलोर। नेंक समात न हिये रसिकनी मिली जु नवल किशोर ॥ शिर सीमन्त कुसुम लट अटपटी बिकिरत चारों ओर। अरुन नैन आलस वस विथकित पीक कपोल अथोर ॥ सुरत रंग में रंगी रंगीली लूटे निज चित चोर। डगमगात पग धरत गहि लई रामराय पट छोर ॥२४॥

पद-

आज हरि रैन उनीदे आये। अंजन अधर ललाट महावर नयन तमोर खवाये ॥ शिथिलित वसन मरगजी माला कंकन पीठ सुहाये। लटपटी पाग अटपटे भूषण बिन गुनहार बनाये। शिथिल गात अरु चाल डगमगी भ्रुकुटी चन्दन लाये। सूरदास प्रभु यही अचम्भो तीन तिलक कहाँ पाये ॥२५॥

पद-

मासों कहा दुरावत प्यारी। नन्दलाल संग रैन बसी री, कोक कला गुण भारी ॥ लोचन पलक पीक अधरन की, कैसे दुरत दुराए। मनौं इन्दु पर अरुण रहे बसि, प्रेम परस्पर भाए॥ अधर दसन छद की अति शोभा, उपमा कही न जाई। मनौं कीर फल विंव चोंच दै, भख्यौ न गयौ उड़ाई। कुच नख रेख धनुष की आकृति, मनौं शिव शिर शशि राजै। सुनत सूर पिय वचन सखी मुख नागरि हँसि मन लाजै ॥२६॥

पद-

सघन कुंज ते उठे भोरही स्यामा स्याम खरे। जलद नवीन मिली मनौं दामिनि, बरषि निसा उसरे ।। सिथिल वसन तनु नील पीत द्युति, आलस युत पहिरे। श्रम जल बूंद कहूँ-कहूँ उड़गण बदरन बरन करे ॥ भूषण विविध भाँति मिड़वारी, रति रस उमँग भरे। काजर अधर तमोर नैन रंग, अंग-अंग झलकि परे ॥ प्रेम प्रवाह चली मनौं सरिता टूटी माल गरे। शोभा अमित विलोकि सूर प्रभु, क्यौं सुख जात तरे ॥२७॥
उरझयौ नीलांवर पीतांवर महियाँ। वेसर सौं पीत पट कुंडल सौ लर लट हार हू में वनमाल बहियाँ में बहियाँ।। हंस गति अति छवि अंग-अंग रही फवि उपमा विलोकिवे कौं पटतर नहियाँ। काग के कलोल छटे सेज हू के सुख लूटे सूर प्रभु विलसत कदम की छहियाँ॥२८॥

राग बिलाबल-

प्रिया-पीय के उठिवे की छवि बरनी न जाय सब तें न्यारे। मानौं द्यौस-रैन इक ठौरे सोये न भये न्यारे ॥ बार लटपटे मानौं भँवर यूथ लरत परस्पर, कमल दलन पर खंजरीट सोभा न्यारे। श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंज बिहारी पर कोटि-कोटि अनंग कोटि ब्रह्माण्ड बार कीये न्यारे ॥२९॥

पद-

स्यामा-स्याम आवत कुंज महल ते रंगमगे-रंगमगे। मरगजी वनमाल सिथिल कटि किंकिनि, अरुन नैन मानों चारौ जाम जगे। सब सखी सुघराई गावत बीन बजावत, सब सुख मिलि संगीत पगे। श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंज बिहारी की कटाक्ष सों कोटि काम दगे॥३०॥

पद-

भोरही कर सों कर जोरें अँग-अँग मोरें आलस लेत जँभाई। पिय के अंक निसंक सबै निसि हुलसि-हुलसि बिलसि आनंद में उनीदियै उठि आई व अंगराग अनुराग रही फवि छवि वरनी नही जाई। अति सुख भरि-भरि उमँगि बिहारिनदास सों कहत जैसें हौं लाल लड़ाई ॥३१॥

राग देवगंधार-

प्रिया-पिय सुरत सेज उठि जागे। घूमत नैन अरुन अलसाने, मनौं समर सर नाँगे।॥ सिथिल अंग छूटी सब अलकें, वदन स्वेद कन लागे। मानौं विधु कुसुमन करि पूज्यौ अंग-अंग अनुरागे॥ चितै परस्पर ब्रीड़त दोऊ, काम केलि रस पागे। श्रीनरहरिदास अंग-अंग निरखत, गंड पीक सों दागे ॥३२॥

राग बिभास-

श्यामा-श्याम संग जागे समर सैन दलकैं। कर विनोद मोद रंग उमँगि-उमँगि छलकैं ।। कजरारे नैन अरुण सिथिल भईं पलकें। कल कपोल दसन छाप विथुरी वर अलकें ।। सुरत श्रमित अंग-अंग श्रमकन मुख झलकें। देखि-देखि दुहूँ ओर बाढ़ी मदन ललकें ।॥ भगवत कर अंचल सों पोंछत हैं हलके । चपल नैंन खंजन सों मिले चारु चलकें ॥३३॥

कुंज सदन सुख सब तें अगरा। सनै-सनै दुरि देखि सखी री राधा-मोहन रति रस झगरा ।। विगलित वसन रसन कटि छूटी मदन बान लजि तजि गयौ डगरा। हित मोहन रस विवस दोऊ जन बीति गई निसि है आयौ पगरा ॥३४॥

चाचा श्रीवृन्दावनदासजी कृत-राग भैरव-चर्चरी

भोर उठि लाल यौ संग ललना लसी। गौर तन ज्योति पिय अंग प्रतिविंव कछु मनहुँ गिरि स्याम के मध्य दामिनि धसी ॥ झपत आलस भरे नैन बांके विसद रंग रजनी सने और उपमा खसी। वदन की प्रभा सब सदन पूरित मनौं लेत संपुट कमल देखि पूरन ससी ॥ एक अंवर लपटि रहे दोऊ प्रेम सों गौर अरु स्याम भुज अंस अंसन कसी। मनहुँ रसराज तरु तीर हाटक लता ललित सुख बलित अति गाढ़ गति सों गसी ॥ किधौं बहु सुकृत करि मेघ यह वर लह्यौ चपल जाकौ कहत अचल सो उर बसी । वृन्दावन हित रूप स्वामिनी पिय सहित देखि सौभाग कौं सारदा मति नसी ॥३५॥

राग बिलाबल-

हँसि निकसी नव कुज ते नागरि अरसाती। मानौ जलद बिदारि कै दामिनी रस माती। वसन रसन ढीले सबै खसी कंचुकी गाती। कच बगरे रद छद भये शोभा बहु भाँती ।। पिय पाछें आगें प्रिया लटकत मुसिकाती। धाइ मिली सब सहचरी पाई दूग थाती।। टहत वचन रस रंग के सुनि कछु सकुचाती। वृन्दावन हित रूप बलि नख अंकित छाती॥३६॥

राग रामकली-ताल मूल

सुरत सदन ते भोर ही आवैं। मनसिज मान हरत गरबीले अंस भुजा गज गतिहि लजावैं॥ रद छद पीक कपोलन मंडित मदन छके दूग कोर ढुरावैं। भूमत झुकत थाहि पद राखत अति अलसौहे वचन जनावैं॥ मरगजे वसन उठत तन सौरभ ताके लोभ पुंज अलि धावैं। झिझकत प्रिया निवारत सजनी लाल पीत पट सों अहुरावैं॥ चंचल नैन बैन अति चंचल तब प्रीतम हँसि कंठ लगावैं। थाती बाट रंग मनु पाई रसिक कंत मन मोद मनावैं ।॥ तरुवन लसत ललाई अवनी रीझी मनु अनुराग विछावैं। नख दूति प्रतिविंवत है चरनन लगत चंद तिनकौं ठकरावैं॥ विछ्वा नूपुर बलय किंकनी मधु रव उपजत चितहि चरावें। मुरली अधर धरी मन मोहन ताही सरसों सुर जु मिलावैं॥ बदक पयंक जगमगत अतिसै रविससि हूँ कौ तेज छिपावैं। जीत्यौ सब मदन गढ़ मनु यह धुजा चंद्रिका छवि दरसावैं॥ नख सिख बरषत सोभा इत उत इक रसना क्यौं बरनि सुनावै । वृन्दावन हित रूप सिंधू की तृन सों नापि थाह को पावै ॥३७॥

राग रामकली-ताल मूल

भोर ही कुंज भवन तें निकसे। रस भोगी दोऊ तन मन विकसे ॥ कनक नील गिरि सिखर सु जानौ। जलदि बिदारि उदित ससि मानौं। किधौं घन दामिनि भाँवर कीयें। आवत भरे उमाहे हीयें। किधौं रति पति सदेह करि लाई। फूलत अलभ लाभ निज पाई। वारौं उपमा बनत न कोऊ। निरुपम गौर स्याम ये दोऊ॥ देखि सखी भयौ भोर निपट है। कैसौ सोहत रविजा तट है। कुंजन फिरत दिये गरबहियाँ। उरझत बसन सघन बन महियाँ । पिय सुरझावन विहँसत आये। वृन्दावन हित रूप बिकाये ॥३८॥

राग भैरौं-चौतालौ

बैठे प्रात उठि नव नागरी-नागर मुदित परस्पर धरैं अंस भुज दंड। सिथिल सिंगार सबल अति सोभा उझलत अंग-अंग दुति ताटंकन उदित मनौं मारतंड ॥ नैन अन्यारे बान से राजत भृकुटी अजित मनौं कोदंड। वृन्दावन हित रूप वदन वारिज मनु अलि कुल कलह मचाई रुरत अलक ऐसैं गंड॥३९॥
पद-

बिरियाँ जब प्रात लखी सावधान करत सखी मृदुल करन चरण चांपि जुगल कौं जगायौ। करबावत पट सम्हार उरझि रहे हार बार मधुर मधुर वचन रचन कहि-कहि सचु पायौ । सकुचत सुरतांत चिन्ह देखि-देखि समुझि-समुझि रुखहिं लियें मनहिं दिये हितू हित बढायौ । लसत मरगजे सुचीर भवन भई शोभा भीर दहन को सुहाग भाग छकि छकि दलरायौ।। लाल रंग दहल जात विरमि-विरमि कहत बात मुसिकत हैं चतुर भाल जावक लखि पायौ। बलि-बलि वृन्दावन हित रूप अहा कहा उमँगि निसा जनित रंग झलकि आनन पर आयौ ॥४०॥

पद-

हँसि-हँसि चरन धरत रस उन्मद झूमत झुकत गहें सखी बहियाँ। रति रन चिन्ह ललित तन मंडित सकुचत-सी वाला मन महियाँ।। छवि के होत बिछाना मानौ रूप छकन कहि आवत नहियाँ। वृन्दावन हित रूप सहेली लेत वारनें उभै मुख चहियाँ ॥४१॥

राग बिभास-चौतालौ

उठन प्यारी भोर तलप तें अति सकुचीली कंचुकी बँद लखि टूटे। लोचन लोल बोल आलस भरे सचत बसन तन भूषन लर कछु टूटे ॥ कर लाघव सौं केश सँवारत रजनी लाज कपाट जु खूटे। वृन्दावन हित रूप आजु प्रीतम सौं हिलमिल सेज महल सुख लूटे ॥४२॥
राग बिभास-

जागे जु जागे जुगल अनुरागे लै पट भूषण अंग धरत हैं। निशि बदले आभरन दुहुँन के तिनकों समझि सम्हार करत हैं।॥ देहु प्रिया मेरी नक बेसर मृदु-मृदु वचन लाल उचरत हैं। ये माँगत अपनी मणि चौकी अनख कहन में प्रान हरत हैं। बिनु मित लाड़ प्रात ही उझल्यौ नेह भरी झगरन-झगरन हैं। अरसोंहे नैंनन की तिरछी चलत कटाक्षनु रंग ढरत हैं। भोरी-भोरी बतियाँ प्रेम रस सानी कहत मनौं सुख बीज झरत हैं। वृन्दावन हित रूप सहेली सुनि-सुनि उर आनन्द भरत हैं॥४३॥

पद-

लट में लट पट में पट उरझे तन मन उरझन प्रेम मई है। निज अलि निकट जाय सम्हरावत लै दर्पण विवि करन दई है। अति अरसान जभाँत मोरि तन निसि विलसन सुख मनन छई है। वृन्दावन हित रूप जाऊँ बलि पुनि जगि बेली सुरत बई है॥४४॥

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