श्री करुणा बेली
श्री चाचा बृन्दाबनदासजी कृत
||१||
श्री व्यास सुवन करुणा अब करौ,
मो सिर चारू चरण रज धरौ |
श्री हितरूप कृपा की आशा |
याचत उर धरि बडौ हुलासा ||
||२||
करुणा निधि तुम नाम कहावै,
मोसौ दीन चरन रति पावै |
प्रथम करौ करुणा गुरु राज,
जिनकौ शरण गहे की लाज ||
||३||
पुनि ये रसिक सुद्रष्टि निहारौ,
मोपै करुणा सदा विचारौ |
करुणा दया साधू गुरु करि हैं,
मो उर ताप तिमिर सब हरि है ||
||४||
श्रीगुरु साधु जाहि अपनावै,
तेई जन हरि के मन भावै |
जिनको विरद विदित जग माँही,
अभय करै पकरै जा बाँही ||
||५||
हें करुणा निधि करुणा कीजै,
अब निज शरण रावरी दीजै |
ऐसी सदा विचारौ चितही,
हौ तव कृपा मनावत नितही ||
||६||
विनती सुनो साधु मन रंजन,
तुम पद कमल सकल दुख गंजन |
अहो नाथ ! तुम दीन दयाला,
अपने कौ कीजै प्रतिपाला ||
||७||
मो करनी नहि चित में धरिये,
अपनी कृपा ओर हि ढरिये |
जो मम औगुन ग्रहन करौगे,
अपनौ विरद आप बिसरौगे ||
||८||
करुणामय यह विरद बढ़ावौ,
जो हमसे दीनन अपनावौ |
अहो कृष्ण पद रति अब पाऊँ,
जुगल केलि कल कीरति गाऊँ ||
||९||
देहु कृष्ण यह भक्ति सुधन है,
तुम दासन के हिय दृढपन है |
भक्तन की अभिलाषा दायक,
हो राधापति तुम सब लायक ||
||१०||
देहु देहु करुणा करि पद रति,
तुम समान को त्रिभुवन में पति |
हे व्रज ईश सीस दीजै पद,
तुम हौ परम दया करुणा हद ||
||११||
करौ अनुग्रह अपने जन कौ,
जैसे गौ चाहत बच्छन कौ |
यौ हरि देहु भक्ति वरदानै,
जा कीरति कौ जगत बखानै ||
||१२||
हे गोकुल विधु ! वदन दिखावौ,
नैन चकोरन सुधा पिवावौ |
निरखि सफल ह्वे है दृग मेरे,
पावन गुण गाऊँ मै तेरे ||
||१३||
अहो अहो त्रिभुवन के स्वामी,
तुम हौ सब के अंतरयामी |
याते अपनी ओर निहारौ,
मेरो दोष न चित में धारौ ||
||१४||
मिलन आस की बेलि निपाई,
ऐसी करौ जू अफल न जाई |
तुम पद दरसन पूरण फल है,
दै सतसंगत सींचत जल है ||
||१५||
यह अभिलाषा रहत मन नित है,
प्राणनाथ मम आरत चित है |
तुम समरथ हौ दीन महाई,
शरण गहे की तुम्है बड़ाई ||
हे व्रज दूलह ! नन्द दुलारे ! कब ऐहो दृग आगे प्यारे |
नहि जानै किहि छिन दरसौगे, तपत हिये कब सुख बरसौगे ||१६||
कानन सघन वीथियन माँही, निरखौ प्रिया अंश गरवाही |
पूरित नेह वचन सुनि हौ जब, श्रवण लाभ फल हरि गनिहौ तब ||१७||
हे वृन्दावनचन्द विनोदी, देहु दान हौ ओटत गोदी |
बात तुम्हारी जीवन मेरी, सब विधि पूजौ आश सबेरी ||१८||
परम दया के मन्दिर तुम हीं, यातैं शरण गहत है हमही |
राखो नाथ कृपा करि नेरैं, अहो कृपा निधि हम नित टेरै ||१९||
तुम गुण गहर कमल दल लोचन, अपने जन के सब दुख मोचन |
हे सुन्दरवर तुम हौ नगधर, दिजै अभयदान सिर कर-वर ||२०||
सुनौं कान दै विनती हो हरि, तुमहिं सुनाऊँ बहुत भाँति करि |
अपने को सुधि आपु न लीजै, ऐसी कहा निठुरता कीजै ||२१||
और बात नहि चितहि विचारौ, कृपा द्रष्टि मम ओर निहारौ |
इहि विधि नाथ तुम्हारो जस है, जो बिसरौ तौ का मम बस है ||२२||
अहो कृष्ण ! जो दास कहावै, सो क्यों जगत माँहि दुख पावै |
यह तौ बड़ी त्रास आवत है, कृपा अवधि क्यों तोहि भावत है ||२३||
कबहुँ न करौ दयाल ऐसौ अब, चाहत शरण तुम्हारी हम सब |
अपने जन की लज्जा गहिवै, बहुत न आवत है प्रभु कहिवै ||२४||
जाकौ अनुग सो न सुधि लेहि, वह न कहावै नाथ सनेही |
अगनित द्द्न्द देह के पथ है, तुम बिन टारन को समरथ है ||२५||
बार-बार हम हरि यह जाचै, तुम पद छाँडि अनत नहि राचै |
ऐसी सुमति देहु करुणानिधि, कहौ प्राणपति मिलिहौ किहि विधि ||२६||
कब उपजेगी यह मन माँही, राखौगे मोहि चरणन छाँहि |
मै तो निश्चय यहि करि है, तुम धौ जियमे कहा धरी है ||२७||
खोटो खरौ परौ जो शरणी, कहा देखिवे ताकी करणी |
विरद तुम्हारो विदित रसाला, अब तौ करे वनै प्रतिपाला ||२८||
कब ऐहो इन नैननि आगे, कब ये रूप तिहारे पागे |
हें राधापति तुम पद दरसौ, सुजस रावरो गावत सरसौ ||२९||
हें अभिराम श्याम वनवासी, कब परसौ वे पद सुखराशी |
अब उर आशा अधिक भई है, तुम धौ मनमे कहा ठई है ||३०||
देहु न नाथ अनाकनी मोसौ, अपनी व्यथा सुनाई तोसौ |
भली लगै सो करिहौ ब्रजपति, मेरे तौ तुम ही हौ हरि गति ||३१||
अहो जुगल विधु मो दृग भूषण, कब सींचौगे प्रेम पियुषण |
कौतुक मिथुन सकल सुख ऐना, बन घन रमत निहारौ नैना ||३२||
निभृत निकुंज ते निकसो जबही, मेरी द्रष्टि परौगे तब ही |
कब ह्वे है वह मंगल बिथियाँ, आवत युगल अंश भुज धरियाँ ||३३||
अब कछु कहत परस्पर बानी, सो तौ परम नेह-रस सानी |
ताहि सुनत बदलै गति तन की, पूजै अभिलाषा सब मन की ||३४||
हे सुखरासि दास्य अब पाउँ, हे प्रभु तुम पद कृपा मनाऊँ |
कानन कमनी केलि विलोको, निरखत पलक धरनि गति रोको ||३५||
ऐसौ बानक बनि है कबहूँ, करुणामय विनती सुन अबहूँ |
अति अभिराम श्याम सुखदाता, तुम पतितन पावन विख्याता ||३६||
अहो अकिंचन जन-मन भावन, भक्तन उर आनन्द बढ़ावन |
दासन भीर सदा लागत हौ, अब कछु नाथ दूर भागत हौ ||३७||
जो तुम कहो करम तुम खोटे, तौ तुम हरि का विधि हौ मोटे |
करमन के बस तुम जन होई, तौ तुव भजन करै क्यों कोई ||३८||
जो तुम बड़े करम ठहरावौ, तौ तुम क्यों जग-ईश कहावौ |
जाके दंड जगत ये नाँचै, सोई धनी कहावै साँचै ||३९||
जो हरिदास करम बस कहिये, तो प्रभु तुमहि न ऐसी चहिये |
नीति अनीति आपही देखो, हमकौ याकौ बड़ो परेखौ ||४०||
उत्तम करमन करि जो तरिये, तौ तुमको काहे अनुसरिये |
ये हठ छाँडि देउ अब हरि किन, करमन लार बहावौ प्रभु जिन ||४१||
साधू सभा के तुम ही मंडन, करो कटाक्ष कर्म होय खंडन |
हो ब्रजनाथ साथ देउ मेरो, ऐचौ पकरि बाँहि हौ तेरौ ||४२||
हौ भूल्यो संसार-विषय-वन, भ्रमत फिरौ पाऊँ पीड़ा तन |
तुम सौ दयाल देखि छिटकावै, कहौ कृष्ण को पार लगावै ||४३||
यह गति देखि जो न कसकै मन, तो हरि कहा कहाये तौ जन |
अपने कौ स्वामी जो तजिहै, लेहु विचार कौन हरि लजिहै ||४४||
जो अगतिन की गति न करि है, कहो कृष्ण कौ फैट पकरि है |
अब चितवौ रंचक सुद्रष्टि कर, अखिल भुवन तौ जाय नाथ तर ||४५||
जाकौ जतन कहा करीवै है, रंचक दया ह्रदय धरिवै है |
तूम तौ दीनदयाल-प्रभु अति, हौ हित रूप चरण पाऊँ रति ||४६||
तुम हरि उर आनन्द भरन हौ, भक्तन की आरति जु हरण हौ |
अब न गहर कीजै इत देखो, जैसे टरै करम की रेखो ||४७||
हो दुख दमन रसिक राधापति, भक्तिदान दीजै उदार-मति |
दाता देत कछू नहि राखै, श्रीगुरु-सन्त भागवत भाखै ||४८||
देहु देहु पद सेव सदाई, तुम दानी हौ कृपण महाई |
सब जुग माहि विदित यह गाथा, जो अनाथ सो किये सनाथा ||४९||
ताते विरद पुरातन गहिये, तुमसौ बार बार हरि कहिये |
वृन्दावन हित रूप रावरे, कब परी हौ मम द्रष्टि सांवरे ||५०||
राधा रसिक कहावौ नागर, भक्तन की गति करुणा सागर |
वरद सुनाई बेली करुणा, अब तौ नाथ कृपा दिस ढरुणा ||५१||
हौ नहि लोक भ्रमन ते डरोई, एक बात कौ संशय करोई |
बिसरौ जिन उर ते भगवंत, इच्छा बस तन धरो अनन्त ||५२||
जो कोउ जाकी शरणे-आवै, यधपि ओगुनी दण्ड न पावै |
अहो शरणागत-पालक गिरधर, अब मो लाज राख सुन्दरवर ||५३||
सती चढी सर अगनि न जारै, कहौ नाथ वह कहाँ पुकारै |
प्यासे कौ जल नदी न देई, तौ हरि कहौ कौन सुधि लेई ||५४||
प्रफुलित कमल रोष रवि ठानै, इहि दुख वारिज कहाँ बखानै |
चन्द्र चकोरनि ते दूरि रहि है, हो हरि व्यथा कहाँ वह कहि है ||५५||
दीपक मन्दिर हरै न तमको, तौ प्रभु तुम बिसरावौ हमको |
जो जल काठ न तरै गुसाँई, तरुवर बैठन देत न छाई ||५६||
सुनौ प्राणपति तौ कहा बस है, जोपै उन मन धरयो विरस है |
ये व्रत तजै तो अचरज नाहीं, पै न संभवै प्रभु तुम मांही ||५७||
अहो कृष्ण अब करो न ऐसी, जैसी तुम जु विचारौ तैसी |
नैक सुद्रष्टि करौ मम ओरी, कारज होय बात यह थोरी ||५८||
हे बलबीर धीर मति पनके, रक्षक सदा आपने जनके |
त्राहिमाम शरणागति आयौ, त्याग न उचित जु भृत्य कहायौ ||५९||
सुनौ कान दै कानन वासी, अब जिन जगत करावौ हाँसी |
तुम जु ज्ञान घन त्रिभुवन ईसौ, अभय कर कमल धरौ मम सीसौ ||६०||
मै विनती प्रभु करी घनेरी, कही रूचि दैनी प्रेम पहेरी |
सुनके नाथ धरो मन माँही, जैसे परयौ रहौ पद छाँही ||६१||
तुम लायक दायक सबही सुख, दर्शाऔ काहे न सुन्दर मुख |
पाउँ यह प्रसाद शोभा-घर, ब्रजपति नन्दन जो राधावर ||६२||
श्रीहरिवंश प्रताप तै, वरणी करुणा-बेलि |
ब्रजभूषण राधा धनी, दरसावो रस-केलि ||
सम्वत सै दस आठ गत, चार वरष उपरन्त |
कृष्ण दास अभिलाष हित, कथी सुनौ हरि सन्त ||
जेठ वदी पाँचे सु दिन, बलि हित रूप विचार |
हरि गुरु साधु कृपा करि, वरन्यौ यह सुखसार ||
दिनबन्धु करुणा अवधि, भक्तवत्सल यह नाम |
वृन्दावन हित लेउ सुधि, विरद बढै ज्यौ श्याम ||
||इति श्रीकरुणाबेली चाचा व्रुन्दावनदासजी कृत सम्पूणॅम ||