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Padawali Utsav

श्री रासपञ्चाध्यायी

  • November 30, 2025
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श्री रासपञ्चाध्यायी
श्री रासपञ्चाध्यायी

श्रीहित दामोदर स्वामीजी कृत-छन्द-(प्रथम अध्याय)

जय-जय-जय गुरु चरण वारि पावन मन भावन। कृपा दृष्टि सुख वरषि सदा मम हृदय सिरावन॥१॥ रास रसिक श्री कृष्ण कृष्ण कल केलि रसिक मुनि । पञ्चाध्यायी कही भये जन रसिक श्रवन सुनि ॥२॥ सो यह भाषा करत यथामति अपने सुख कौं। पढ़त विचारत मनसि हरत सब संसृति दुख कों ॥३॥ सुन्दर वर श्री कृष्ण विलोकि शरद की रैनि। मंजुल फूलन फूलि मल्लिका रही सुख दैनी ॥४॥ रसिक सुदेश नरेश रमण कौं कियौ तबही मन। भोग योग माया सुदेश सुन्दर साँवल तन ॥५॥ उदै भयौ उड़राज स्याम सुख काज विराज्यौ। अरु नभ मूक सुदेस अमल प्राची दिस भ्राज्यौ ॥६॥ जैसे पुरुष विदेस गयौ पुनि मन्दिर आयौ। मंडन करत प्रिया मुख कुमकुम राग सुहायौ ॥७॥ कुमुदबन्धु रसबन्धु ताप जन गन कौ हारी। रमा बदन की प्रभा देखि हररुयौ जु बिहारी ॥८॥ कोमल निर्मल किरन सकल मधुमय सुखरासी । दल फल फूल समूल सकल बन माहिं प्रकासी ॥९॥ हस्त कमल गहि अधरधरी तब मोहन मुरली। जिहि सुनि जुवतिन विसरि धम की बाते उरली ॥१०॥ परम मनोहर इष्ट कृष्ण कल गीत सुन्यौ जब। ब्रज बनितन हित मध्य सुनत ही अनंग बढ्यौ तब ॥११॥ चलिबौ आपस मध्य नहिन कोउ जुवति जनावै। कूपन पस्यौ धन पाइ तबहि ज्यौं तहीं छिपावै ॥१२॥ धाईं धामन छाँड़ि हियौ मोहन हरि लीनौ। मारग बंशी शब्द तितहि मन श्रवण सु दीनौ ॥१३॥ चंचल कुंडल बेगि प्रीति अति हरि सों बाढ़ी। तोरि चली अति सुदृढ यदपि कुल आगर गाढ़ी ॥१४॥ छाँड़ि दुहाबत चली कोऊ तजि गृह के काजन। कोऊ दोहन छाँड़ि चली तजि सबकी लाजन ॥१५॥ उफनत काहू क्षीर न भूमि उतारि धस्यौ है। प्रेम उदधि जित चल्यौ उलटि मन तितहि पस्यौ है।॥१६॥ हस्त चरण मन संग भये गृह काज करै को। प्रीतम मोहन गीत श्रवण सुनि धीर धरै को॥१७॥ कोऊ जिमावत भर्त्तन मुरली सुनि अनुरागीं। चमकि छटासी चलीं दृगम पिय चौंध-सी लागी ॥१८॥ कोऊ प्यावत दूध सुतन कौं त्यागि चलीं त्रिय। गृह तजि सन्मुख भईं कृष्ण सब भाग फली हिय ॥१९॥ कोऊ तजि पति सेव चलीं तजि भोजन कोऊ। अनत नेह हरि मिलन बनत ये कैसें दोऊ ॥२०॥ कोऊ लीपत तरुनि त्याग गृह बन कौं भागी। बंधन छुटे समस्त नवल रति हरि सों लागी ॥२१॥ उबटन मंजन अंजन काहू भलें न कीयौ। कहा-कहा नहि छुटै चित्त जब हरि हर लीयौ ॥२२॥ कोऊ अरबर मध्य चली धरि उलटे भूषन। कृष्ण निकट तें भईं भये ते सब निर्दूषन ॥२३॥ कृष्ण तुष्टि हित करै जो विहित न करई। फल न घट सुख बढ़े अमर भव सागर तरई ॥२४॥ भयौ कृष्ण आकृष्ट चित्त तिन कछु न सुहाई। बिघ्न कबहुँ नहि ५५ करें कोऊ सुख अझै सदाई ॥२५॥ तातन भ्रातन भर्त्तन यद्यपि रोकी बाला। प्रेरक जिनकी कृष्ण-प्रेम क्यौं रुकहिं सुभाला॥२६॥ उमगत भादौं धनी सुनी कहें रोकी चलतें। पवन कलश में मेलि रोकि किन राख्यौ बल ते ॥२७॥ ऐसें गोपी चलीं भलीं वृन्दावन सोहीं। कमल नैन सुख धाम श्याम अभिराम विमोहीं ॥२८॥ कोऊ तिप गृह मध्य गई नहि निकसन पाई। तहीं बैठि श्री कृष्ण मधुर मूरति मन ध्याई ॥२९॥ कृष्ण विरह अति तीब्र ताप हिय नख सिख बाढ़ी। बिन ऐसें रति लगें मिलन हरि की अति गाढ़ी ॥३०॥ अशुभ सकल इहि भाँति गये मन क्रम तिहिं काला। धस्यौ ध्यान आनन्द मग्न शुभ भुक्त्यौ बाला॥३१॥ पाप पुण्य भये छीन छिनक में मिलीं नवल हरि। उपजै जो यौं ललक पलक में जाँय असुभ जरि ॥३२॥ बोल्यौ तब महाराज परीक्षित वचन मनोहर कृष्ण कृपा भाजन सुदेश आवेश रसिक वर॥३३॥ श्री भागोत दिनेश श्रवण द्वारा हिय आयौ। कीनौ अपनौ अति प्रकाश भ्रम तिमिर नसायौ ॥३४॥ भो मुनि, सो मम प्रश्न वचन तब सरस सुहाये। जिनकी गुण मय वृद्धि त्यागि तन क्यों हरि पाये ॥३५॥ कमल नैन श्रीकृष्ण परम अति सुन्दर माने। गुणतीत योगेश प्रकृति परब्रह्म न जाने ॥३६॥ शुक बोले सुनि महाराज सन्देह न कीजे। कह्यौ तुम्हारे अग्र भाग अब पुनि सुनि लीजै॥३७॥कृष्ण दोष धरि रह्यौ सदा भरि रह्यौ महा मद। ऐसो खल शिशुपाल ताहि क्यौ दियौ अभै पद ॥३८॥ ये ब्रजरानी जगतें न्यारी संतत कृष्ण प्यारी। तिनहिं मिलन कहा कठिन प्राण जिनके जु विहारी॥३९॥ काम क्रोध भय हेत भजन सो कृष्ण मिलावै। निशि दिन जिनकें प्रेम तिनन की कौन चलावै ॥४०॥ ते त्रिय श्याम सरीर धीर ढिंग आइ बिराजीं। सुन्दर नव घन तीर मनौ जुरि विजुरी राजीं ॥४१॥ सुन्दर मोहन बैनन बोले नंद दुलारे। ब्रज जन लोचन तारे प्यारे जगत उजारे ॥४२॥ महाभाग ब्रज कुशल सबै तुम नीकैं आई। आगम कारन कहौ करौं तुम्हरे मन भाई ॥४३॥ यह रजनी अति घोर घोर गन जीव बसैं वन। बेगि गृहन फिरि जाहु रहौ जिन विपिन जुवति जन ॥४४॥ मात पिता पति बन्धु बड़ौ डर है है तिनकौ। देखत फिरि हैं सबै सदन तजि आईं जिनकौं ।॥४५॥ रची विधाता मैंड़ वेद विधि सनौऽब भामिनि । पति तजि अनत न जाय जुवति पुनि बन में जामिनि ॥४६॥ कुसुमित पुनि राकेस किरण राजत वृन्दावन। जमुना परसि समीर लागि शोभित पल्लव गन॥४७॥ देखौ हृदै विचार धारि छवि हिय गवनौ घर। सेवौ पति रति मानि जानि आनौ आरज डर।॥४८॥ टेरत बच्छ बाल जाइ प्रतिपाल करौ अब। आगम तुम्हरौ युक्त होऽब तुम प्रेम पगीं सब ॥४९॥ भजौ पुरुष तजि कपट बसौ दिन मंदिर बाला। पोषौ तिनके बन्धु सुतन वर नैन विशाला ॥५०॥ दुष्ट शील दुर्भाग वृद्ध जड़ दारिद रोगी। ऐसौ पुरुष न तजै नारि जो अघ न सँजोगी ॥५१॥ उपपति सुख अति तुच्छ निन्द संतत भय दाइक । दोष करन यश हरन नहिंन कुल बनिता लाइक॥५२॥ प्रीतम सों अति हेत दूरि रहि बाढ़त जेसौ। निपट निकट चिरुकाल बाल अति रहत न तैसौ ॥५३॥ ताते सदनहिं जाहु रहौ तहाँ शोभा पावौ। तात-मात-पति-भ्रात-सुजन गृह सबकौं भावौ॥५४॥ ऐसे वचन किशोर वदन ते सुनि ब्रजनारी। चकित थकित यौं भई ज्यौऽव गथ हारै ज्वारी॥५५॥ मन कौ गयौ बिचार भार सिर पर पस्यौ दुःख कौ। चिंता बढ़ी अपार निकट तट नाहीं सुख कौ ॥५६॥ नाइ सिरोधर रहीं बाल मुख अध दरसावैं। केश विधुतुद भार विधुन मन उकस न पावै ॥५७॥ विरह अग्नि हिय बढ़ी चढ़ी स्वासन सँग ज्वाला। छिन-छिन में मुरझात अधर वर विंव रसाला ॥५८॥ ढरत दूगन तें सलिल धार उरजन पर आवै। मनु बारिज मकरंद वरषि उर ताप सिरावै ॥५९॥ पद गूंठन करि लिखत धरनि गन भामिनि ठाढ़ी। करिया कृष्ण कठोर महा दुख सरिता बाढ़ीं ॥६०॥ कहै बैन अनचैन नैन नीरज नंदनंदन। जिन हित त्यागे ऐन भय न कीयौ कुल फंदन ॥६१॥ जिनहिं कामना त्यागि सकल सब विधि अनुरागी। रुदत विलोकन माँजि आँजि धीरज बड़भागी।।॥६२॥ कामिनि गदगद कंठ कमल दूग पिय सों बोलीं। सह्यौ वचन दुख हृदै भवन कौं बुद्धि न डोलीं।॥६३॥ महा धीर जे संत परे दुख चित न डुलावैं। धरै धर्म नहिं टौं तनक ते हरि मन भावैं॥६४॥ गोपी सब सिरमौर प्रेम धृत परम धरम धर। कहत वचन रस भरे सुनौ श्री श्याम रसिक वर॥६५॥ नाभि कमल हृदि कमल-कमल पद कर तब गाये। नैन कमल मुख कमल वचन ये कहँ ते आये ॥६६॥ कंज द्रवत मकरन्द आइ अलि तहँ सचु पावै। तुम्हरौ वदन सरोज हमहिं विष सौ वरषावै ॥६७॥ जैसौ नख सिख रूप मधुर मूरति मन भावन। तैसेई बोलौ वैन हमारे हिये सिरावन ॥६८॥ कुंजर जो वन दवा तपत गंगाजल आवै। यह हम नहिं कहुँ सुनी सुरसरी तहीं पठावै ॥६९॥ जो दिनकर की किरन खेद सहि शशि ढिंग पावै। तौ चकोर की बड़ अभाग तहँ चन्द जरावै ॥७०॥ जिन भाषौ फिरि जाहु निठुरता तजि पिय प्यारे । सकल विषै हम त्यागि आय पद गहे तिहारे ॥७१॥ काल व्याल भय भागि धाइअ तब शरणहिं आये। ते जन निभैं किये कमल कर छाँह बसाये ॥७२॥ तैसेई हमकौं भजौ तजौ जलचर-जल रीती। उत्तम सुख कौ मूल मित्र पय-पानी प्रीति॥७३॥ ऐसें हमसौं करौ प्राण पति तुम्हरी दासी। अपने सुख सौं पागि हमारे मन सुख रासी ॥७४॥पति सुत सुहय जु सेवक हौ पिय नंद दुलारे। जुवति धर्म बतावन श्रुति के वचन उचारे॥७५॥ यह तुम्हरौ उपदेश जिनहिं ते युवति अभागी। हमतौ सब विधि लाल सकल तुम सौं अनुरागी ॥७६॥ अरु तुम तिनसों कहौ स्याम जिनकै जिज्ञासा। मन-बच-क्रम दिन रैन हमारैं तुम्हरी आसा॥७७॥ तुम सबहू के बन्धू श्रेष्ठ तुम आतम स्वामी। अखिल जीव के प्राण सुहृद सब अन्तरजामी ॥ ७८ ॥ जे तुमसों रति करें धरैं हिय सुंदर मूरत। देत सदा सुख तिनहिं सकल मन इच्छा पूरत॥७९॥ सदन कदन कौ मूल पुत्र पति जन गन भ्राता। सरै न तिन तें काज कछू वे सब दुख दाता ।॥८०॥ अब तुम होहु प्रसन्न कमल लोचन पिय प्यारे। कंज चरण दुख हरण सकल तजि गहे तुम्हारे ॥८१॥ धरी आस तुम विषै चिर न छेदहु मन मोहन। दरसन परसन भोग कियौ इन पर अवरोहन ॥८२॥ जो सुख करि तुम चित्त हरे हरि यौं अब कीजै। दया द्रवन रस भवन रवन हमैं सोई सुख दीजै ॥८३॥ तुम ढिंग तें ये चरण चलत नहिं इक पद न्यारे। कैसैं गवनहि धाम छाँड़ि पिय प्रान पियारे ॥८४॥ हमरी रति नव लता बढ़ी वंशी रव पानी। तब तन रूप तमाल लाल अँग-अँग लपटानी ॥८५॥ नहिंन छुटै नहिं टुटै रीझ दृढ़ भई विहारी। स्मृति-निगम-पुरान नहिंन पिय जात उखारी ॥८६॥ अधरामृत रस बरसि दरस पिय बोरहु सारी। उपज्यौ मनसिज अग्नि अंग मृदु हास तुम्हारी ॥८७॥ या पावक कौं आहि अमृत जब सीचौ नाहीं। तब ये परि हैं युवति यूथ विराहनल माहीं ॥८८॥ तुम्हरो ध्यान सुजान प्राण पति हिय में धरि कै। ऐसी विधि जरि मरि कैं मिलि हैं पाइनु परिकैं ।॥८९॥ रहि हैं संतन संग अंग रंग भरे सुहाये निरखें प्रीति अभंग करें सुख मन के भाये ॥९०॥ जिहिं रस कारण रमा चरन सेवत अनुरागी। बसत निरन्तर अचल दोष चंचलता त्यागि॥११॥ ब्रह्मादिक तप करत जाहि चितवन के लोभा। नहिं निरख्यौ तिन ओर लुव्ध भई तब पद शोभा ॥९२॥ तैसैंई ताकी नाईं पद सरनाई आईं। निरखौ करुना दृष्टि तजौ पिय हिय निठुराई ॥९३॥ नर भूषण अहो नलिन नैन ये दासी करियै। सीकर अम्बुज हस्त तप्त उरजन पर धरियै ॥९४॥ कुंडल मुख सुख निरखि केश आवृत छवि पावै। मनु रवि कंज प्रकाश निकसि लहि मधु दरसावै ॥९५॥ ललित कपोल विलोकि रोकि हमरौ मन राख्यौ। हासि निरखि सुख राशि अधर रस चाहत चाख्यौ।॥९६॥ भुजा रसाल विशाल उभै निभैं की दायक। धरौ सुखै विस्तरौ हमारे कंठन लायक ॥९७॥ उर साँवल अभिराम गौर उर दाम करौ पिय। हरौ काम की घाम अहो सुख धाम सरस हिय ॥९८॥ इहि आसा करि दासि तुम्हारी होत रसिक वर। तुम पूरण आनन्द कन्द गोविन्द सुखाकर ॥९९॥ तुम्हरौ बेनु सुदेश गीत पर ललित अमृत वर। आरज मग नहिं तजै कौन युवति धीरज धर ॥१००॥ भुवन चतुर्दश मध्य एक सुन्दर ना नागर। को नहिं मोहित होइ देखि अस रूप उजागर ॥१०१॥ अपनौ-अपनौ धर्म रूप दिखि रहत सकल थकि। धेनु बच्छ मृगमाल हरषि तृन वदन रहत तकि॥१०२॥ द्रवत द्रुगन जल धार रहत थकिकैं चलतौ जल। अवला जिनकौ नाम क्यों न तब थकहिं कहा वल ॥ १०३॥ बैधे तिहारे हेत विहंगम डोलत गोहन। कामिनि केतकि धीर रूप तब काम विमोहन ॥१०४॥ इहि विधि विहृल नवल लाल सों ललना बोलीं। प्रीति पिटारी गुप्त प्रगट हरि आगें खोलीं ॥ १०५ ॥ यद्यपि और जु रंग निपट नहिं चढ़त श्याम रंग। जुवतिन के सुनि दीन वचन हरि रँगे प्रेम रँग॥१०६॥ दया नेह रस भरे नवल मोहन नँद नन्दन। विहँसि आतमाराम यदपि क्रीड़त जगवन्दन ॥१०७॥ गोपिन सहित उदार कृष्ण लीला सुखकारी। फूले मुख जलजात प्रात रवि देखि विहारी ॥ १०८ ॥ मृदुल उदार सुहास फूल से झरत सुहाये। युवती लोचन भृंग सुरस पीवत मन भये॥१०९॥ प्रीतम रजनीराज जुवति जन जैसे उड़गन । विहरत मंडन करत फिरत कल श्री वृन्दावन ॥११०॥ त्रिय यूथप नन्दलाल बाल मिलि गाइ गवावत। वन विहरत छवि पावत कुंजन-कुंजन आवत ॥ १११ ॥ जमुना तीर समीर त्रिविध जहँ सुख मन भाये। हरि हरिनाक्षी सुलभ तहाँ सुख विलसत आये ॥ ११२ ॥ तरल तरंगन रची विमल बालुका विराजै । विलसत तहाँ सुख बैठि रूप दिखि मनमथ लाजै११३॥ प्रेम सहित भुज धारि ऐचि उर सों उर लावन। उरज करज सों परसि दरसि रतिराज वड़ावन ॥११४॥ हँसत लसत अनुराग बलित मुख अलकन परसत। अरु नीवी परसि वरसि रस त्रिय हिय सरसत॥११५॥ ऐसें अँग-अँग परसे बरसे नव जलधर से। धरनी ज्यों भईं शीतल तरुणी तन मन सरसे ॥११६॥ विहरत कृष्ण किशोर कमल दृग भरे सकल रस। आयौ सौभग गर्व जुवति हर जानि भये वस ॥११७॥ सकल उपाय प्रवीन योग अणिमादिक स्वामी। कृपा धाम रस धाम सकल घट अतंरजामी ॥११८॥ लुके प्रेम विस्तरन गव निर्वारन कारन। प्रिया कंठ भुज धारन वन एकान्त विहारन ॥११९॥ ऐसैं पहिलौऽध्याइ कह्यौ श्री शुक भूपतिसों। दामोदर हित भस्यौ कृपा हरिवंशी रति सों ॥१२०॥१॥

॥ इति श्री रासपञ्चाध्यायी प्रथमोध्याय की जै-जै श्रीहित हरिवंश ॥१॥

तिहि जामिनि के जाम नृपति भई भामिनि ऐसें। जल बिछुरे तें मीन दीन अति होत हैं जैसें ॥१॥ अरु ज्यों दिनकर बिना होत पंकज कुल की गति। कमनी कृष्ण बिना यों रमणी भईं विमन अति ॥२॥ प्रकट विलोकत ही ज्यों शशि आवत है धन में। चकित चकोरी होत सबै यौं तरफत मन में॥३॥ ब्रजवाला अति दुखित भईं नँद नन्दन बिन यों। करनी वृन्द विलाप करत यूथप बिन वन ज्यों।॥४॥ गति अनुराग सुहास विलास मनोहर हेरन। सुभग कमल कर फेरन चारु सुहावन टेरन॥५॥ ते-ते लीला करत-करत तन्मय भईं भामिनी । जलद बिना ज्यों विहृल डीलत कोटिन दामिनि ॥६॥ ज्यों उनमत्तहिं नहिं सँभार कन्दै हम गावत। हरि मूरति आरुढ़ मगन वन तें वन आवत॥७॥ निरखत मिलि इक संग जुवति गन विटवन बूझत। पिय प्यारे बिन और कछू नहिं तिनकौ सूझत॥८॥ अहो पीयर वट बड़े महा तुम पर उपकारी। नंद नँदन मनहरनहार कहूँ लहे बिहारी ॥९॥ अहो पाटीर सुगन्ध सुलभ शीतल सुखदाई। कृष्ण बताइ सिराइ हमहिं तब अधिक बड़ाई ॥१०॥ अहो कुरवक करवीर वीर बलवीर बतावौ। हरन हमारी पीर कोऊ जिन जान दुरावौ ॥११॥ अहो चंपक चहुँ ओर चितै चितचोर पिया कौं। राखै को जु दुराइ पाइ जग सदन दिया कौं ॥१२॥ तुलसी तुम रस भरी सदा हरि चरणन प्यारी। बिनती हरिसौं करहु हरहु यह पीर हमारी ॥१३॥ मल्ली यूथका जाति फूल इक पाँति रहीं लसि। अँग-अँग याते फूल श्याम कर परसीं हँसि-हँसि॥१४॥ अहो सुंदर नव नूत पूत ब्रजपति कौ देख्यौ । गीत दूत आहुत त्रिया जन जात न पेख्यौ ॥१५॥ कोविदार अहो पनस सुखहि घन सौ बरसातौ। जुवती जन आधार तुमहूँ कहूँ देख्यो जातौ ॥१६॥ अहो अर्क सुनि भ्रात नाम रवि कौ जु तुम्हारी। लहे तुमहुँ कहूँ कृष्ण सदा तुम्हरै उजियारौ ॥१७॥ अहो कदंब जो चीर चोरि चढ़ि बैठ्यौ तोपर। सो अब चित कौं चोरि गयौ कहूँ देखि दया भरि ॥१८॥ कालिंदी कल कूल विटप तुम तीरथ सेवौ। जनम पराये हेत सीत तप सिर पर खेवौ ॥१९॥ कमल नैन रस ऐन दैन सुख नन्द दुलारे। हमकाँ देहु बताय कृष्ण तुमतें नहिं न्यारे ॥ २०॥ हे धरनी सब धौ मुरलीधर हमहिं बतावौ । दीखत अँग-अँग पुलक मोद हरि कौ न छिपावौ ॥२१॥ हे हिरनी रस भरे नैन बड़ड़े जु तुम्हारे। ऐसे मुदित न होत बिना दरसे हरि प्यारे ॥२२॥ हे तरु तुम्हरौ राग भाग कहि आवै कैसें। दिखि हरि कौं भये नमित मगन पुनि रह गये तैसें ॥२३॥ हे सखि ये कहा कहैं जिनहिं अरनी सुध भूली। चलिये आगैं निपट निकट दिखि बेली फूली ॥२४॥ इनकों पूछौ बाल इनहुँ नीके हरि दरसे। नख सिख आनंद मूल नहिन बिन पिय कर परसे ॥ २५॥ इहिं विधि पूछत डोलें बोलें कोऊ न मन में। थकित चकित भईं कहत यों सोचत मन में॥२६॥ बड़ौ हमहिं सन्देह वह न शशि जात दुरायौ। वदन चन्द वनचन्द कहाँ जग वंद छिपायौ ॥२७॥ अति उन्मत्त की भाँति फिरीं पूछत ब्रज रमनी। रस अनुरागी लगीं करन हरि लीला कमनी ॥२८॥ भईं सकल हरि मई तनक सुध नाही अपनी। पारस ज्यों लगि पीतल होते बिलँव न तपनी॥२९॥ नंद पूत इक भई-भई एक बकी विमल मति। पीवन लगी उरोज प्रेम की अद्भुत गति ॥३०॥ एक बाल तिहिं काल तोक होइ सकट प्रहारे। सुनि राजा हरि भाव सबै इहि भाँति विसारे ॥३१॥ एक तृणाव्रत भई लई भरि अंक जु हरि भई। इक किंकिनि कै घोष चलत घुटरन शोभा नई॥३२॥ इक भई गोप समूह राम कृष्ण इक सोहीं। नैन बैन मन हियें कृष्ण क्यों न तन्मय होहीं ॥३३॥ बक वत्सासुर भईं एक इक हरि है मारत। जात सुरभि ज्यों दूरि एक है कृष्ण पुकारत ॥३४॥ इक धरि वंशी अधर सरस स्वर हरि है गावत। इक बोलत मिलि भलैं-भलैं भली गति उपजावत ॥३५॥ एक कहत हों कृष्ण ललित गति मेरी हेरौ। एक रहत अवलोक होत नहिं पल भटभेरौ ० ॥३६॥ एक कहत जिन डरौ महा वरषा मारुत तें। सबकौ है है भलौ अबहिं मो जसुदा सुत तें ॥३७॥ ऐसें कहिं कर चीर कियौं ऊँचे हरषित मन। मैं गोवर्द्धन धस्यौ रहौ या तर ब्रज के जन॥३८॥ और एक धरि रही चरण जुवती के सिर पर। अति आवेश स्वरूप कृष्ण भयौ कहत त्रियावर ॥३९॥ हौं प्रगट्यौ हरि हरन दुष्ट हे सुनि काली खल। जाहि विलँव जिन करै रहै जिन आजु सु जा जल ॥४०॥ एक कहै गोपाल देख यह लग्यौ दवानल। इक कहै मूँदहु नैन कृष्ण हौं करि हाँ मंगल॥४१॥ इक गहि बाँधत श्याम दही भाजन कौ फोल्यौ। प्रेम मगन इक बाल आनि ढिंग हँसि-हँसि छोस्यौ। ॥४२॥ ऐसे करि हरि ललित लाल की लीला भामिनि। तहाँ तें ते पुनि चलीं विलोकत मन अभिरामिनि ॥४३॥ हेरत-हेरत मृगी दगी हरि सों रति पागी। देखे चरण सरोज खोज सब मिलि अनुरागी ॥४४॥ कमल कलश जब धुजा मीन अरि दा अंकुश छवि। निरखि मुदित हिय भईं चिन्ह तिन माँहि रहे फवि ॥४५॥ हे सखि धनि यह रेनु कृष्ण चरणन सों परसी। अरु धनि हमरे नैन जिनहुँ पद अंकित दरसी ॥४६॥ अति पुनीत लोकेश ब्रह्म शंकर श्री देवी। धारत सिर सुख हेत प्रेम युत संतत सेवी ॥४७॥ चलीं निहारत बाल लाल पद पदवी के मगासबै रहीं चकि चाहि कहौ इहि ढिंग काके पग॥३८॥ नन्द ललन के कंठ धरै भुज अभय कलोलै। जैसें वन घन मध्य करी संग करनी डोलै ॥४९॥ इन ईश्वर भगवान सजन आराधे नीके। करत अधर रस पान रहसि राजत संग षी के॥५०॥ जो श्री कृष्ण किशोर तजीं हम सब ब्रज नारी। प्रीति पगे मन नैन दैन सुख लै गये न्यारी ॥५१॥ अब देखौ सखि चरण नहिंन दीखत संग ताके। लई उठाइ उछंग मृदुल पद जानि प्रिया के॥५२॥ कठिन धरनि तृन गढ़त हेत नागर सुखकारी। क्यों न करहिं पिय हेत सखी यह प्राण पियारी ॥५३॥ जोई-जोई चाहत बाल-लाल सो करै मन भायौ। मन भावन सुख भवन रवन सखि इकलौ पायौ ।॥५४॥ अरु ये तोरत कुसुम चरन आक्रमन जु कीनौ। ताते देखौ सजनि नहिंन पद पूरन दीनौ ॥५५॥ तिन कर कवरी सीस प्रिया हित गूँथी सोहन। निश्चै इहिठाँ बैठि सकल सुख कीन्हे मोहन ॥५६॥ सुनि नृप ऐसे कहत घोष की नारि फिरत वन। सौभगता की राशि कृष्ण तासौं मान्यौ मन॥५७॥ यदपि आत्माराम नहिंन इन्द्रिन के बस हरि। जिहि-जिहि विधि जे भजत रमत भये तिनके हित करि ॥५८॥ रमत रमावत प्रेम विवस सुख मण्डित पंडित। पूरन परमानन्द परम रस रसिक अखंडित ॥५९॥ सबकौं मग दरसावत गुरु भये कृष्ण कृपा कर। सुमिरत गावत केलि सुगम पावत हरि कौं नर॥६०॥ सब जुबतिन कौं त्यागि साथ पिय लाये जाकौं। कृष्ण संग सुख प्रेम भार सुध परी न ताकौ॥६१॥ निकर सुभग ब्रजनारि छाँड़ि मोसीं रति मानी। भये विवस पिय जानि अधिकता अपनै आनी ॥ ६२॥ तनक तहाँ ते चले जबहिं पिय सों बोली तब। चल्यौ न मोपै परत जहाँ तुम चल्यौ चहत अब॥६३॥ सुन्यौं प्रिया मुख वचन सबै विधि जानत मोहन। भये नमित तब श्याम कंध मम करि आरोहन ॥६४॥ हित में जहँ-जहँ गर्व तहाँ-तहँ दूरि करें हरि। शुद्ध प्रेम करि धाम श्याम तहाँ रहैं निहचै करि ॥ ६५ ॥ यातें ताही तीर धीर बलवीर दके तब। विरह पीर अति भीर कहत पिय क्वासि-क्वासि अब ॥ ६६ ॥ हे वृन्दावन नाथ-नाथ मम प्राण पियारे। तजि इकली कत गये महा भुज नन्द दुलारे ॥६७॥ जो जाके आधीन नहिंन करियै तासों वल। सो क्यों सह बियोग बीच नहिं सहै परे पल ॥ ६८ ॥ दीजै दरसन देखि दसा हिय दासि तिहारी। माछी पानी बिना सुनी कहूँ जीर्व न्यारी॥६९॥ बहु विध करत बिलाप नीर नैनन उर भीजै। पवन महा दुख देखि आइ बिजना सो बीजै ॥७०॥ कोकिल मोर चकोर अपनपौ सब बिसरावैं। जुवती रुवती देखि-देखि दुख तें दुख पावैं॥७१॥ हेरत-हेरत पियहि त्रिया आईं तिहिं काला। देखि दसा बेहाल सबै विस्मै भई बाला॥७२॥ लै अंचल मुख पोंछत पुनि-पुनि लै उर लावत। कहि-कहि कोमल बैन सबै मिलि हियौ सिरावत ॥७३॥ यह संतन की रीति प्रीति लागी जिनकी हरि। अपनौ दुख नहिं गनै होत अति दुख पर दुख करि ॥ ७४॥ ते मिलि तहाँ तें चलीं निविड़ कुंजन की छाहीं। वदन चन्द से दियहिं कछू तम कौ भय नाहीं॥७५॥ अति गावर वन गली फली फूली देखीं सब। तरुनि तहाँ ते मुरकि चलीं पिय नहिं पाये जब॥७६॥ सुन्दर श्याम किशोर निरंतर मन में भावैं। वानी गुन गोविंद मगन मन मिलि सब गावे ॥७७॥ कृष्ण विचेष्टा करत सबै तन्मय है जाहीं। कहाँ सदन कहाँ देह कौन हम कछु सुध नाहीं।॥७८॥ कृष्ण प्रेम कौ यह सुभाव उपजै जहाँ यह गति। पुरुषहिं विसरै युवति-युवति हूँ जाइ विसरि पति ॥७९॥ तुलसी धर द्रुम लता मृगी पूछी ठाँ ठाँईं। दामोदर हित श्री हरिवंशी कृपा लखाहीं॥८०॥ ॥ इति श्री रासपञ्चाध्यायी द्वितीयअध्याय की जै जै श्रीहित हरिवंश॥२॥

पुनि आईं तिहि पुलिन प्रथम जहँ केलि करी पिय। प्रगट मिलन कौं करत भावना अति अरवर हिय॥१॥ कहत सबै ब्रजनारि अहो ब्रजराज दुलारे। रसिक राज अहो नाथ सुनौ ये वचन हमारे॥२॥ जब तें तुम्हरौ जनम घोष घर-घर सुख भारी। क्रीड़त ब्रज में अचल यदपि श्री चंचल नारी ॥३॥ निपट तिहारे हेत धरैं ये प्राण जुवति जन। दरसन देहु दयालु बहुत डोलीं देखत बन॥४॥ सरद सरोवर जात सुभग अंबुज शोभा हर। ऐसे लोचन ललित लाल तुम्हरे सुख कौ भर ॥५॥ तिन कर करत प्रहार कहा यह वध न कहावै। जुवती जन कौ हनन नहिंन कहुँ वेद बतावै ॥६॥ पुनि बिनु गथ की दासि निरंतर तुमहीं सों रति। करहु दया अहो सुरत नाथ तुमहीं हमरी गति ॥ ७॥ राखीं हम सब काल-व्याल-वक-काली खल तें। वृष व्योमासुर महा अग्नि अरु वरषा जल तें ॥८॥ तुम हौ पूरण ब्रह्म जनौं जसुदा सुत नाहीं। जग हित ब्रह्मा विनती करी प्रगटे ब्रज माही॥९॥ जो तुम अपने भक्तन कों नहिं सुख विस्तारौ । तौ तुम करहु सु कौन काज पिय तुमहिं विचारौ ॥१०॥ जे संसृति भय देखि धीर तब चरणन आये। हस्त कमल धरि शीश तुमहुँ सब सुख बरषाये ॥११॥ सो कर अंकुज लाल धरौ हमरे सिर ऊपर। अरु उरजन पद धरौ फिरौ जिन वन की भूपर ॥१२॥ जुवती जन कौ गर्व हरन तब हास कमल मुख। हम किंकरि तुम नाथ भजहु दै दरसन कौ सुख ॥१३॥ प्रणत पाप कौ हरत देह धारिन के तब पद । तृण चर पाछे चलैं भलैं सेवत नासैं मद ॥१४॥ श्री निकेत करी नित फूली के बहुत फलन पर। ते हमरे उर धरौ हरौ मन आधि रसिक वर ॥१५॥ कथा अमत तब ईश बहुत गुण धर्म विराजै। विविध तान कौ हौ सुधा अमरन कौ लाजैं ॥१६॥ कवि ईडित आनंद वृन्द कल्मष कौं नाशै। मंगल श्रवण सुदेश बुद्धि विज्ञान प्रकाशे॥१७॥ ऐसौ कृपा प्रताप कहत जे ते सुकृती वर। जौ तुम देखें लाल महा ते बड़े भाग नर ॥१८॥ ताते दरसन देहु मेह-सी सुख बरषावौ। चातक-सी हम रटत श्याम घन-से चलि आवौ ॥१९॥ पद पंकज सुख रूप प्रणत पूरत मन के हित। धरनी मंडल सुखद प्रेम युत तद् अज’ अर्चित ॥२०॥ हे-हे रमन किशोर आधि-हन ते पद नागर। अवलन उर पर धरौ करौ करुणा सुख सागर ॥२१॥ अधर अमृत तब वीर सुरत वर्धन मन भावन। वेण नाद रस पग्यौ धरनि दिव सुखहि भुलावन ॥२२॥ हँसत वदन सुख सदन प्रेम ईक्षण तब प्यारे। विहरन मंगल ध्यान क्षोभ ना करत हमारे ॥२३॥ देखौ हमरौ प्रेम चलत जब ब्रज तैं लै पसु। वन में शिल तृन कठिन समझि कपित हमरे असुः॥२४॥ कमलहु तें सतगुने चरण कोमल जु तुम्हारे। ज्यौं-ज्यों धरनी धरत दुखी मन होत हमारे॥२५॥ जब गोधन के संग-संग डोलत बन माहीं बिन देखे तुम लाल एक त्रुटि जुग सम जाहीं ॥२६॥ बासर इहि विधि जात नन्द के तात पियारे। आवत ब्रज जब साँझ नेंक दृग होत सुखारे ॥२७॥ मुख अम्वुज अभिराम कुटिल कुंतल अलि शोभा। सुरभी रैनु पराग आईं त्रिय देखन लोभा॥२८॥ तनकहिं सुख कै दुःख दयौ विधि मंद बड़ौ अति। पलक रची बिच आनि नहिंन जानै हित की गति ॥२९॥ तैसैंई तुम हूँ करी बोलि निशि छाँड़ी बन में। बातें तुम कछु अधिक समझि देखौ पिय मन में ॥३०॥ सुनि यत सदा दयाल तजौ अब अति निठुराई। पूरहु हमरी आस अहो पिय कुँवर कन्हाई॥३१॥ गूढ़ हृदय में रोग हमारे उपज्यौ प्यारे। तुमहूँ जानत लाल तुमहु पुनि सूदन’ हारे ॥ ३२॥ धरहु उरज पद कमल डरहु जिन कठिन मानि कैं। सनैं-सनैं हम धरहिं चरण तब मृदुल जानि कैं॥३३॥ गड़त कठिन तृण कूर्प अटत कतअटवी न्यारे। भ्रमत हमारी बुद्धि तुमहिं दृग-प्राण हमारे ॥३४॥नेह भरी रस भरी लाल सो ललना बोलें। दरसन की अति तड़प प्रेम के सिंधु कलोलैं॥३५॥ दामोदर हित कहे त्रियन बहु वचन सुहाये। श्री हरिवंशी सुनत श्याम मन माहिं लजाये ॥३६॥
॥इति श्री रासपञ्चाध्यायी तृतीय अध्याय की जै जै श्रीहित हरिवंश॥३॥

ऐसैं गोकुल बाला गावत विलषत भारी। अप-अपने स्वर उच्च रुदत हित दरस बिहारी ।।१।। जिनके मन-वच-कायक यौं ब्रज नायक सों रति। जैसें नीची धरनि सुभाविक ढरन सलिल गति ॥२॥ यद्यपि अगह अनन्त अनावृत निगम कहत है। गोपी प्रेमा फन्द पस्यौ क्यौं दुस्यौ रहत है॥३॥ तबही तिनही मध्य प्रगट भये मोहन नागर। सब सुख सागर स्याम परम रस रूप उजागर ॥४॥ हँसत तामरस’ वदन मार मन मथत सुभग तन। पीताम्वर छवि भवन श्रवण कुंडल माला वन॥५॥ उठीं सकल इक काल वाल दिखि नन्द लाल कौं। गत आवत ज्यौं प्राण होत सुख इन्द्रि जाल’ कौं।॥६॥ पायौ चित कौ चोर दौरि काहू पकरे कर। तुमहीं कौं श्रुति कहत भलें जू भलैं दया भर॥७॥ चन्दन चर्चित बाहु कृष्ण की सब सुखदाई। रहीं धारि कोऊ अंस विरह की ताप नसाई ॥८॥ कोऊ चरण सरोज सुभग पिय के उर धारत। शीतल उरजन लाइ बिथा तनमन की टारत ॥९॥कोऊ करि बाँकी भृकुटि प्रेम संभ्रम जु विकल अति। मारत तारत दृगन दरस धरि अधरन चंपति ॥१०॥ कोऊ वदन सरोज देखि नहिं सकत पलक चलि। दरसन मुख मकरन्द मग्न है रहे नैन अलि ॥११॥ पीवत त्रिपित न होत बढ़त छिन नई-नई रति। सेवत ज्यों पद कमल संत संतत निर्मल मति ॥१२॥ कोऊ नैनन पंथ हिये में हरि कौं आनत। आलिंगन करि मोद यथा योगी सुख मानत ॥१३॥ सबन विलोके श्याम काम पूरण नँद नंदन। ताप निकंदन चन्द वृन्द सब जग के वंदन ॥१४॥ तज्यौ सवन मन विरह मुदित भईं वाला ऐसें। हरि के भक्तन पाइ सुखी हौंइ दुखी जन जैसें ॥१५॥ कृष्ण तरल तरंग रची मणि मारु मण्डित। चमकत लागि मयूख गगन शशि अमल अखंडित ॥१६॥ कृष्ण दरस आनन्द भयौ मिटि गयौ सकल दुख। भयौ मनोरथ सिद्ध यथा श्रुतिगण पायौ सुख ॥१७॥ कर्मकांड कौं पाइ श्रुती रवि-इन्द्रहि मानें। ज्ञान कांड महिं आइ परम सुख हरिहि प्रमानै॥१८॥ ऐसें गोकुल नारि काम रस प्रथम उदित हिय। पाछें शुद्ध अखण्ड प्रेम जिहि विवस भये पिय॥१९॥ परम इष्ट श्रीकृष्ण हस्यौ सब के हिय कौ रुज। पुरत मनोरथ एक सघन कौ यथा कल्प कुज ।॥२०॥ चितवन मुसकन हरषि महा बरष्यौ आनँद घन। रोम-रोम तन चित्त सकल भीजीं जुवती जन ॥२१॥अप-अपने पट बाल वलित कुच कुमकुम सोहन। आसन रचे बनाइ तहाँ बैठे मन मोहन ॥२२॥ जिन हित घट रितु साधि-साधि कै योग योगेश्वर। रजगुन तनगुन साधि विमल करि राखे हिय घर॥२३॥ ध्यान रूप हरि सनै-सनै तिनके मन आवत। गोपिनु के जे अंग बसन तिन पर सुख पावत।॥२४॥ यदपि विश्व के ईश- ईश शिव वासव विधि के। यदपि रमा के नाथ कान्ह ईश्वर निधि-निधि के ॥२५॥ जिनकी छवि कौं देखि कोटि मनमथ से लाजैं। सो हरि गोपिन सभा पाइ विराजें ॥२६॥ प्राणनाथ श्रीकृष्ण काम उद्दीपन मुख शशि। ऐसैं पिय सौं नेक कुपित बोलीं भामिनि हँसि ॥२७॥ पूँछत हम इक प्रस्न कृष्ण कहिये सुन्दर वर। तुम जानत सब रीति प्रीति की मोहन नागर॥२८॥ भजत भजै इक लाल और इक भजत भजे बिन। एक तजत है उभै कहौ पिय ते याही छिन ॥२९॥ बोले तब नंदलाल सुनौ ब्रजवाल विमल मति। भजत परस्पर जहाँ तहाँ कछु नहिं सुख की गति॥३०॥ नहिंन प्रीति रस तहाँ नहिंन कछु है परमारथ। गो-महिषी व्यौहार यथा केवल यह स्वारथ॥३१॥ एक भजन बिन भजै सुनौं ते उत्तम नागर। यही सुहद सुख धर्म कपट बिन सदा उजागर॥३२॥ भजत अभजत जु तजहिं सुनौ तिनकौ जु विचारा। जगत माँहि ते प्रगट कहे है चार प्रकारा॥३३॥आत्माराम एक-एक हैं आप्तकामा। एक मूढ़ गुरु द्रोही इक ये चारौ नामा ॥३४॥ पिछलौ चास्यौ मध्य जानि हरि पर मुसिकानी। सबकी समझि कटाक्ष चतुर मणि हरि हू जानी ॥३५॥ बोले तब श्रीकृष्ण कमल दल नैंन विशाला। इनमें हौं कोउ नहिंन सुनौ हो ब्रज की वाला॥३६॥ परम सुहद हौं सदा करुण संतत सुखदाई। संतत शुभ कौं चहौं करौं भजनी मन भाई॥३७॥ अरु जो जिय मोहि भजै प्रेम बाढ़े नव-नव दिन। भजौं नहीं ततकाल तजौ पै नहिंन एक छिन ॥३८॥ निधनी ज्यौं धन बनै बहुरि ज्यौं पाछे खोवै। अति चिंता धन हेत नींद भरि कबहुँ न सोवै ॥३९॥ तैसेहिं हमहिं जु भजै तिनहिं कछु और न सूझै बैठत चलत मिलाप जहाँ तहाँ हमरौई बूझै ॥४०॥ सो तुम ब्रज की रमनि सदा कमनी मन हरनी। कोटि अंड महि कौन करै तुम्हरी सी करनी ॥४१॥ तुम्हरौ शील सुभाव प्रेम तुमही वनि आवै। तुम्हरी महिमा महा नहिंन कोउ पारहि पावै ॥४२॥ लोक वेद सब त्यागि मातु-पितु-बन्धु सुजन जन । पति-सुत तन के भोग त्यागि हमसौं बाँध्यौ मन ॥४३॥ महा श्रृंखला सदन तिनुक-सी तोरि जु आई। रजनी विपिन न गन्यौ कहाँ लौं करौं बड़ाई॥४४॥ याकौ प्रति उपकार युगहूँ करि पार न गहि हौं। ऐसौ तुम्हरौ प्रेम सदा हौं रिणियाँ रहि हौं ।॥४५॥ ये तुम जेतिक जुवति सकल मम प्राण पियारी। अपने-अपने मन तें त्यागहु चूक हमारी ॥४६॥ दामोदर हित वचन विमल रति के जु सुनाये। श्रीहरिवंशी सहित परस्पर मिलि सुख पाये ॥४७॥

॥इति श्री रासपञ्चाध्यायी तृतीय अध्याय की जै-जै श्रीहित हरिवंश॥४॥

सुनहूँ नृपति गति ताप बाल मिलि एक भई मन। वरषि अमृतवर बँन मैन मोहन सुन्दरघन ॥१॥ हरषित जुवती वृन्द चारु हँसि मंद-मंद वर। रंग भरे नंदनन्द चंद गोविंद सुखाकर ॥२॥ कियौ रास आरम्भ अमल दस दिशा रहीं लसि। कृष्ण वधू मुख मुदित उदित भये मनहुँ कोटि शशि॥३॥ त्रिय तन सुन्दर वसन बने मणि भूषण सोहन। श्याम बने छबि धाम अँग-अँग मैन विमोहन ॥४॥ वाद्य निर्त्त गुण गान सवन के चितहिं चुरावै। गोपी हरि मिलि केलि रास रस सोई कहावै॥५॥ जोरि परस्पर बाहु-बाहु ललना छवि पावै। उत्सव रास विलास परम मनही मन भावै ॥६॥ द्वै-द्वै गोपिन मध्य बने हरि परम रसिक वर। पूरत मन के अर्थ-अर्थ सब हैं जिनके कर॥७॥ संकुल गगन विमान देखि भयौ कौतुक भारी। मगन सगन सुर वृन्द सहित अप-अपनी नारी ॥८॥ दुन्दुभि बजैं अकास अमर पुहुपन बरसावैं। वर गन्धर्व अनूप जगत मंगल यश गावैं। ९॥ मंडल रास सुदेस करन कंकन झनकारन। किंकिन नूपुर घोष सुभग पद अवनि प्रहारन॥१०॥ चुरी चारु करतार हार बहु भूषन चमकन। कंठसिरी कल कंठ पदिक मंजुल उर दमकन ॥११॥ मुख प्रकाश मृदु हास दसन दीपति अति सोहन। अधर बिम्व मधु बैन नैन चञ्चल मन मोहन ॥१२॥ नासा वेसर ललित बंक भृकुटी छवि पावैं। तिलक झलक कल अलक श्रवण कुण्डल चमकावैं ॥१३॥ चीर चारु सौभाग्य सीम सीमन्त विराजैं। नख सिख वेश सुदेश वैस कैशोरी राजें ॥१४॥ जूथ-जूथ ब्रजवाल मध्य पिय नैन कमल दल। मनु कंचन मणि बीच-बीच मर्कत मणि निर्मल ॥१५॥ चरन चलन भुज चलन मध्य मुरि मधुरे गावन। चलत उरज पट सुभग वदन श्रम कन चमकावन॥१६॥ बहु मूरत श्री कृष्ण तड़ित गन ब्रज की वाला। मेघ चक्र सम बन्यौ रूप अति परम रसाला ॥१७॥ कबहूँ ऊँचे गान कंठ कोकिला लजावैं। कृष्ण परसि अति मुदित गीत सुनि सब सुख पावैं। १८॥ कोऊ संग मुकुन्द अमिश्रित स्वर गति गाई साधु-साधु कहि रीझि पूजि पिय कुँवर कन्हाई ॥१९॥ ताहू तें कोऊ अधिक लाल ध्रुव सुर तैं गायौ। ताहि दयौ बहु मान कान्ह अतिशै सुख पायौ ॥ २०॥ रास श्रमित कोउ भईं ललित मोहन ढिंग ठाढ़ीं। सिथिल मल्लिका वलय प्रीति हिय बाढ़ी गाढ़ी॥२१॥ करी निर्त्त रस भरी-भरी भुज पिय यौं राजी। मनौं जलद में तड़ित चपलता त्याग विराजी ॥२२॥ कोऊ पिय की बाहु रही धरि अपनी ग्रीवाँ। चुम्वन करि आश्रान
लिप्त चन्दन सुख सींवा ॥२३॥ कोऊ निर्त्त सुदेश करत मृदु थेई-थेई वोलत। झलकत चारु कपोलन मंजुल कुंडल लोलत ॥२४॥ रसिक मुकुटमणि श्याम रीझि मुख सों मुख लायौ। चर्वित पान सुजान दिये अधरामृत प्यायौ।॥२५॥ नाचत कोऊ वाल सुभग छवि पावत गावत। कूजत नूपुर रसन श्रमित भयें पिय ढिंग आवत ॥ २६॥ प्रीतम हस्त सरोज उरोजन हित सौं धारत। कोटि-कोटि सुख होत सकल श्रम सब कौं टारत ॥२७॥ प्रेम निरीक्षण हँसन मधुर बोलन मनहारी। रस माधुर्य्य विलास चतुरता सुख संचारी ॥२८॥ आलिंगन कर परसि होत बस सब रस पालक। ज्यौं अषने प्रतिविंव संग मिलि खेलत बालक ॥२९॥ कृष्ण संग अति रंग मुदित तन-मन अवला गन। केश सुभग सिर छुटे शिथिल अंवर कुच बंधन ॥३०॥ नहिं बाँधन की फेर शक्ति सब शिथिल जुवति जन। पूरन परमानन्द कृष्ण पति पाय मगन मन ॥३१॥ वनिता गन तन गौर वदन यौं छवि सौं छाजैं। मानौं दामिनि वृन्द चढे शशि सुभग विराजैं॥३२॥ चंचल उरजन होत मनोहर हार उतंगा। उछरत मानौं चारु मेरु श्रृंगन पर गंगा॥३३॥ किरत कचन तें फूल-फूल सो सुंदर वरषत। मनु चरणन गति निरखि रीझि कच पूजत हरषत ॥३४॥ मिलै ताल सुर शुद्ध गान कल अतिशै सोहै। गायक ऐसे भृंग गुनी गन्धर्व जु को है।॥ ३५॥ नँद नन्दन घन सरस छटा छवि जुवती पावैं। श्री वृन्दावन ललित वलित आनँद बरषावैं॥३६॥ रास मण्डल के मध्य बने श्री मोहन राधा। दोऊ गुन गन रास विलासी रूप अगाधा ॥३७॥ निर्त्तत प्यारी पीय भेद नव-नव दिखरावैं। सुभग करन की वलन लटकि कल रीझि रिछावैं॥३८॥ पदन पटकि भ्रू मटकि चटकि कुंडल चंचल छवि। झाईं गंडन वलित देखि दुति भूलि रहत कवि॥३९॥ मुकट कबरि की लटक चारु फरहरन निचोलन। उघटत गति संगीत जुगल मुख थेई-थेई बोलन ॥४०॥ हँसन लसन मन हरन लाल ललना रँग राचे। चतुर शिरोमणि उभै कहै को जिहिं विधि नाचे॥४१॥ भूषण धुनि कल गान मधुर स्वर वंशी। व्यापी धुनि तिहुँ लोक मगन सुनि निगम प्रसंसी ॥४२॥ सुनि थाके उड़ वृन्द चन्द दिखि मगन भयौ दिव। सुर सुरपति सुरनारि जानि थकि ध्यान छुट्यौ शिव ॥४३॥ जौलौ इन्छा भई रसिक वर खेले मोहन। नन्द नँदन आनन्दकंद जग मैन-विमोहन ॥४४॥ रास विलास अपार रूप कछु कहत बनें ना। लोचन कै नहिं जीभ जीभ कै नाहीं नैना ॥४५॥ जेतिक बाल समूह अंग अंगन रंग भीनी। मोहन साँवरे लाल सुमूरति तैतिक कीनी ॥४६॥ सब रस पूरन सदा परम आनँद रंग भीने। किये मनोरथ सिद्ध श्याम सबकौं सुख दीने ॥४७॥ जग मंगल रति युद्ध रुद्ध सौरत मोहन हरि। अपने सुख गोविंद रहे आनंद सदा भरि ॥४८॥ अति विहार श्रम जानि पानि अपने सुख दायक। पौछत तिनके वदन सदन मंगल ब्रज नायक ॥४९॥ विविध निर्त्त कल केलि फेलि रस सुंदर थल में। चले मुदित नंद नंदन क्रीड़न जमुना जल में॥५०॥ रमनी कमनी अंग संग मर्दित वनमाला। राजत उदित उदार भाँति वर उरसि विशाल ॥५१॥ कुच कुमकुम रँग रली भली सौरभ बरषावत। पाछें आवत चली अली पंकति छवि पावत॥५२॥ रंग भरे लटकत आवत भावत नन्द दुलारे। घूमत सोहत मोहत जोहत लागत प्यारे ॥५३॥ ज्यौं गजराजा गजी यूथ युत निर्भे राजै। ढाहत कठिन कगार महा मद मत्त विराजै ॥५४॥ ऐसें कृष्ण सुछन्द सदा आनंद भरे रंग। लोक वेद मर्याद त्यागि क्रीड़त जुवतिन संग ॥५५॥ लै जुवती गन संग प्रवेश कियौ जल माहीं। सीचैं अंकन भीचें अवगा हैं गरवाहीं॥५६॥ कोऊ जल ते डरी खरीं रही तीर हियै रति। ल्यावत भुज गहि धाय जाय फिरि श्याम रसिक पति॥५७॥ शोभा ऐसी होत चाहि मन ही मन भावत। मनु पाछें छुटि रही छटा घन फिर गहि लावत ॥५८॥ छवि सौं बनिता वृन्द सुभग तन सलिल कलोलें। पिय प्यारे के संग रंग भरि खेलत ढोलें ॥५९॥ कबहुँ बूड़क लेत निकसि शोभित मुख वन तैं। चन्द वृन्द छिपि जात मनौं पुनि उदित जु घन तैं।॥ ६०॥ कबह पिय लै चलत पानि गहि गहरे पानी। दुरि-दुरि हरि कों गहत विजुरि मनु घन लपटानी ॥ ६१ ॥ इहि विधि जमुना वारि नारि नागर अवगा हैं। खेलत-खेलत लाल सहज लै आये थाहैं ।॥ ६२॥ तब सब छिरकन लगीं श्याम मोहन पिय हरि कौं। मनौ करिनी चहुँ ओर मध्य दै सीचत करि कौं।॥६३॥ चलत करन जल धार वदन हरि के पार आवें। मनौ अम्बुज मकरंद चन्द पै मिलि बरषावैं॥६४॥ निसरत वचनन साथ वदन तें सौरभ मारुत। कंज पुंज तजि भृंग लोभ आवत गुंजारत॥६५॥ वरषीं पिय पर वारि नारि छवि सों यों पुनि-पुनि। मनु मनमथ अभिषेक होत द्विज करत निगम धुनि॥६६॥ छिरकत चंचल होत भुजा ऐसैं छवि पावैं। मानौं दामिनि चमकि अग्र फिर पाछें आवैं ॥६७॥ जल अगाध महिमा अगाध जमुना रस ऐनी। ऐसें करि हरि सलिल केलि रसिकन सुख दैनी ॥६८॥ निकसे वसन चुचाते सुंदर सुख बरषाते। छवि सों प्रेम घुमाते आनंद रस मुसिकाते ॥६९॥ भीजे वसन विलोकि कृपा करि नव नागर वर। अमृत चितवन चितै बने नव भूषन अंवर ॥७०॥ युवति बलित गति ललित लाल आये उपवन में। मनौं मत्त गजराज विराजत करनी गन में।॥७१॥ शरद रात इहिं भाँति चन्द पूरन उजियारी। क्रीड़त जुवतिन संग रंग भरि नवल बिहारी॥७२॥ बौल्यौ नृपति सुजान सुनौ श्री शुक मुनि स्वामी। उपजी संसे मनसि मोर अहो अंतर जामी ॥ ७३ ॥ तुम पूरण विज्ञान ज्ञान घन सबै जु जानत। रिषि-मुनि सुर-नर सिद्ध तुम्हारे वचन प्रमानत ॥७४॥ सब सुखमय श्री कृष्ण वृष्णि कुल उदित मुदित मन। परम धाम अभिराम सदा विज्ञान ज्ञानघन ॥ ७५ ॥ निगम धर्म रखवार अवनि खल भार उतारक। एक परम भजनीय शरण संसार उधारक॥७६॥ सन्तत पूरणकाम परम रस सदा प्रमोदी। सो क्यों तजि श्रुति रीति भये परदार विनोदी ॥७७॥ छेदहु मम सन्देह कौन कारन दुख खंडन। गुन जिनके आधीन कृष्ण सर्वोपरि मंडन ॥७८॥ तब बोले शुकदेव सुनहु नृप वचन हमारे। जगत हेत सब किये कर्म कुलदेव तुम्हारे ॥७९॥ मुक्त मुमुक्षु व हीन गाइ सुख पावहि सब जन। कृष्ण केलि कौ यह सुभाव रस विवस करै मन ॥८०॥ हरि ईश्वर भगवान केलि सुख भक्ति बेलि है। पशुघाती ते घाटि श्रवण रसना जु पेलि हैं।॥८१॥ गान ध्यान श्रुति सुनत दोष औरन कौ भागे। निरहंकारी तेजवंत कछु तिनहिं न लागै ॥८२॥ जैसे पावक भखै सकल कछु पाय न परसै। कालकूटि भखि रुद्र कंठ अद्भुत कवि दरसैं ।॥८३॥ कृष्न सवन के ईश इष्ट जगदीस सकल गति। छाँड़ि नृपति सन्देह कृष्ण सों करि लीजै रति ॥८४॥ जिनके पद पंकज पराग सुख तृपित भये सुनि। बन्धन छूटे समस्त भ्रमत इच्छाधारी पुनि॥८५॥ शक्ति
अखंडित सदा जिनहिं गावहिं पंडित गन। इच्छा धस्यौ शरीर तिनहिं कैसे होय बन्धन ॥८६॥ सबके हिय में वसहिं सवन के साक्षी स्वामी। हितकारी विज्ञानवन्त सर्वान्तरयामी॥८७॥ जीव अनुग्रह करन हेतु मानुष तन धारी। ज्यौं भजि भव तरि मिलहिं कृष्ण लीला विस्तारी ॥८८॥ नव किशोर श्रीकृष्ण भोर भये आये मंदिर। इहि विधि करि रस केलि झेलि सुख रसिक-पुरन्दरः ।॥८९॥ भामिनि अपने भवन सकल आईं सुखसानी। पुरुषन अपनी जुवति सवन अपने ढिंग मानी॥९०॥ श्री वृन्दावन सदन सहज संतत छवि छाई। ब्रज वधुअन संग करी कृष्ण क्रीड़ा सुखदाई॥११॥ जो यह मन दै सुनै गुनै पुनि कहै निरंतर । कृष्ण भक्ति रति बढ़े दोष नासै अभ्यन्तर ॥९२॥ रसिक राज ब्रजराज कृष्ण की केलि कमल वर। जिनहिं किये मन भ्रमर धन्य ते दिव्य धरनि पर॥९३॥ वेद-वृक्ष फल परम भागवत सब सुखदाई। पद-पद प्रति अति स्वाद मिष्ट रस पंचाध्यायी ॥९४॥ पीवहु रसिक सुजान जीव तुम रस कौं परखौ। पढ़ौ सुनहु दै चित्त रसिक मिलि निशि दिन हरखौ ॥९५॥ यह लीला रस रासि व्यास शुक नारद गानत। शंकर भलै प्रमानत गानत रसमय जानत॥९६॥ जगत तरनि की त्रिविध ताप ताकौं यह शशि है। पाप वेलि कौं उग्र महा यह तीक्षण असि है॥९७॥ निर्मल जिनके चित्त तहाँ यह सन्तत बसि है। काल व्याल बलवन्त कबहें नहिं ताकौं डसि है ॥ ९८ ॥ भव सागर कौं सरस नाव मन में धरि तरई। काम अग्नि कौं मेघ श्रवण रसना है झरई ॥९९॥ अगद राज सम कोटि गनी सर्वोपरि राजै । सकल निगम की सार भूत सिद्धांत विराजै ॥१००॥ उज्ज्वल मंगल मूल परम माधुर्य ढुरन मन। करन सदा कल्यान जगत पावन आनंद घन ॥१०१॥ अति रस रूप सदेश सुखाकर पंचाध्याई। श्री हरिवंश प्रताप सु दामोदर हित गाई ॥१०२॥१०६॥ ॥ इति श्रीराधावल्लभीय परम रसिक श्री दामोदर स्वामीजी कृत रासपञ्चाध्यायी पंचम अध्याय की जै जै श्रीहित हरिवंश॥५॥

श्री सहचरी सुख जी कृत-पद

रास रच्यौ री अद्भुत श्रीवृन्दावन रस बरषत पिय प्यारी मुकुट काछिनी सजि पीरौ पट है त्रिभंग गति अधर बैनु धरि राधा बनी है बिहारी ॥ तिय हिय स्याम पीय हिय गोरे छवि उलझन की छवि भई भारी। अतरौटा अँगिया सजि भूषन दृग अंजन दें अलक सँवारत पहिरत प्रीतम सारी॥ जुगल-जुगल निर्त्तत मंडल पर उत हरि इत वृषभानु दुलारी। हित समाज उज्ज्वल रस मूरति झलमलात ललितादिक लोचन लखि सहचरि सुख वारी ॥१०७॥

पद-

निर्त्तत मोहन मोहनी संग शरद रैन बढ्‌यौ रंग, अंग-अंग छवि तरंग मंडल में दरसें। तान मान दोऊ सुजान उघटत संगीत रीति वदत थेई तत्त थेई रसना रीझि सरसें ॥ मुख उमंग खिले अनंग मिलि मृदंग बैन बीन रुनक झुनक नूपुर ८५ धुनि अनूठे स्वरन वरसें। सहचरि सुख ललित समैं ललितादिक रच्यौ कुंज प्यारी-पिय पुलकित पट नीलपति परसें ॥ १०८॥

पद-

मंडल निर्त्तत लाल बिहारी। रस भीनी मुख मुसकि विहारिन पियहि नचावत दै करतारी ॥ तीन ग्राम अरु सप्त स्वरन मिलि रंग बरस्यौ रागन में भारी। उरप तिरप संगीत रीति सों सुलप सुधंग सधे सब न्यारी ॥ ताता थेई ता-थेई ता-थेई रसना रटत मान मनुहारी। रीझि बनरानी उदार अति लखि ललितादिक अँखिया वारी। सहचरि सुख वन रूप भूपता पाई रसिक कुँवरि रिझवारी ॥१०९॥

श्रीकृष्णदासजी कृत-पद

नाचत राधे सुधर रचत रास मंडली। मध्य मंडल मनी फूल फूली घनी, झरत सौरभ कनी कनक कंजन कली॥ गान सखि संग छवि रंग रंजित धरनि, परन प्रति अरुन विवि वरन चरनन तली। लघु करज चिवुक नक बेसर अधर धृत, थेई-थेई-थेई कहत स्याम सनमुख चली। जोरि कर सों व कर मोरि भूमर झमकि, रमकि किंकिनी झनक रुनक नूपुर रली। निपुन दुहुँ ओर मृदु भुजा ग्रीवन ढोरि, चंचला चल छोर मुरि किरन झलमली। मुकत मुनि व्यास अनियास अरुझी, अलक झलक छवि छलक पिय पलक विथकित अली। कृष्णदास हित खेल कियौ नैनन मेलि, विवस भरि अंग परजंक सुख में झिली ॥११०॥

श्रीप्रेमदासजी कृत-पद

नित्तति कोटिक चंद उजागर लाल बाल अलि नागर। मुक्त माल मंडल सु किरन के झमकि रहे छवि आगार।। रंग-रंग की सारी घन बंटी किरन वादले की वन। जगमगात भूषण जराव के झलकत जित कित उड़गन। झिलमिलात नख चारु चाँदनी फैलि रही शोभा थल। फूले नैन चकोर चहुँ दिसि पिवत अमी आनंद कल। बढ्यौ रूप सागर सजनी लहरें उठत हँसन अति । प्रेमदास हित गह सुख निरखत मुरझि परे मनमथ रति ॥१११॥

गो० श्रीविठ्ठलनाथजी कृत-पद

रास रच्यौ वंसीवट के तट। निर्त्तत प्रेम भरे पिय प्यारी चंद वदन पर छूटि रही लट ॥ सुंदर श्याम सुभग कर मुरली अधर धरें उघटत थेई-थेई रट। मोर मुकट कुंडल की डोलन मुरझि पस्यौ लखि मैन महा भट ॥ ब्रज वनिता छवि देखि विमोहीं वर देत आभूषण अरु पट। लीला ललित महा मुनि मोहे श्री विठ्ठल गिरिधर नागर नट ॥११२॥

गो० श्रीगोकुलनाथजी कृत-राग सारंग

रास में गोपाल लाल नाचे रंग भीने। रंजित राकेस किरन तरनि तनया विमल धरनि मण्डल मध्य श्री राधा अंस भुजा दीने।॥ तत्ता थेई-थेई उचार बाजत मृदु मृदंग तार संगीत गति लेत मान वैनु गान कीने। गोकुल प्रभु गिरिवर धर नटवर वपु गोपी वर निरखत भए कोटिक सत मन्मथ मद हीने ॥११३॥

श्रीवल्लभ गिरधरनलालजी कृत-राग सारंग

बैठे हरि राधा संग कुंज भवन अपने रंग कर मुरली अधर धरे सारंग मुख गाई। मोहन अति ही सुजान परम चतुर गुण निधान जान बुझि एक तान चूक कें बजाई ।। प्यारी जब गह्यौ बीन सकल कला गुण प्रवीन अति नवीन रूप सहित वही तान सुनाई। वल्लभ गिरधरन लाल रीझि दई अंगमाल कहत भलें-भलें लाल सुन्दर सुखदाई॥११४॥

श्रीवल्लभ रसिकजी कृत-राग हमीर

मंजु कल कुंज तल विमल मण्डल धवल नवल रस रास विरचित किशोरी। ललित ललितादि सखि रचित वर परस्पर मण्डिलित चलत अति गति न थोरी।। प्रान समतूल अनुकूल प्रिय अंस भुजमूल धृत मध्य मण्डल सुगोरी। त्रिविध सुर ग्राम अभिराम गुण धाम वल स्याम आलाप यति सुमति भोरी।। सखी सु रसाल सुरसाल वादत मृदंग बीन रस भीन वर ग्रीव डोरी। गीत संगीत क्रम रीति गति जीत ग्रह लेत सुख देत तानन झकोरी ॥ नृत्य गति रंग अँग-अँग मटकाइ कल अलक लटकाइ कृत चित्त चोरी। खेद कृत स्वेद कण भेद प्रीतम करत भाव भरि भेद भृकुटी मरोरी। थेई ता थेई-थेई उघट मुख सुखम सुख गन्ध मद अंध अलि बंध कोरी। तान वंधान संधान सुर ज्ञान युवराज गजराज आलान डोरी।। नीवि रसना हँसन कंचुकी कर वसन अधर सरसान आनंद बोरी। निरखि वल्लभ रसिक सहचरी हिय हरखि मानि निज भाग मद मत्त जोरी ॥११५॥

श्रीगदाधरभट्टजी कृत-राग हमीर व केदारौ

आज मोहन रची रास रस मंडली। उदित पूरन निसानाथ निर्मल दिसा, देखि दिनकर सुता सुभग पुलिन स्थली ॥ बीच हरि बीच हरिनाक्षि माला रची, तरुण नापिच्छ मनु कनक कदली रली। पवन वस चपल दल डुलन-सी देखियत, चारु हस्तक भेद भाँति भारी भली ॥ चरन विन्यास कर्पूर कुमकुम धूरि, पूरि रही दिस-विदिस कुंज वन की गली। कुंद मंदार अरविंद मकरंद मद, कुंज पुंजन मिले मंजु गुंजत अली।। गान रस तान के वान बैध्यौ विश्व, जानि अभिमान मुनि ध्यान रति दलमली। अधर गिरिधरन के लागि अनुराग वस जगत विजई भई मुरलिका काकली ॥ रस भरे मध्य मण्डल विराजत खरे, नंद नंदन कुँवर बृषभान की लली। देखि अनिमेष लोचन गदाधर युगल लेखि जिय आपनी भाग महिम फली॥११६॥

राग कल्याण-

करत हरि निर्त्त नव रंग राधा संग लेत नव भेद गति चरचरी के ताल के। परस्पर दरस रस मत्त भये तत्त थेई-थेई वचन रचन संगीत सु रसाल के ॥१॥ फरहरत बरहियर ढरहरत हारउर भरहरत भ्रमर वर विमल वनमाल के। खिसत सित कुसुम सिर हलत कुंतल मनौं, लसत कल झलमलत स्वेद कन भाल के ॥२॥ अंग अंगन लटकि मटकि भंगुर भौह पटकि पद ताल कोमल चरन चाल के। चमक चल कुंडलन दमक दसनावली विविध व्यंजित भाव लोचन विशाल के ॥३॥ बजत अनुसार दूम-दूम मृदंगन नाद झमकि भं-झनंकार किंकिनी जाल के। नील नव जलद में तडित तरफत मनौं यौं विराजत प्रिया पास गोपाल के॥४॥ बज जुवति जूथ अगनित वदन चन्द्रमा चन्द भयौ मद उद्योत तिहि काल के। मुदित अनुराग सब राग रागिन तान मान गति गर्व रंभादि सुर बाल के॥५॥ गगन चर’ सगन’ रस मगन वरषत फूल वारि डारत रतन जतन भरि थाल के। एक रसना गदाधर न बरनत बनै, चरित अद्भुत कुँवर गिरिधरन लाल के ॥६॥११७॥

राग बिलावल-

निर्त्तत राधा नन्द किशोर। ताल मृदंग सहचरी बजावत बिच-बिच मुरली कौ कल घोर। उरप तिरप पग धरत धरनि पै मण्डल फिरत भुजन भुज जोर। शोभा अमित विलोकि गदाधर रीझि-रीझि डारत तृन तोर ॥११८॥

श्रीगदाधर मिश्र कृत-राग केदारौ

आज कमनीय नव कुंज वृन्दाविपिन मदन मोहन सुखद रास मण्डल रच्यौ। उदित उडुराज लखि मुदित ब्रजराज सुत प्रान प्यारी सहित विविध गति मति नच्यौ। मुकुट की लटक कुंडलन की चटक भ्रकुटीन की मटक पग पटक न वरनी परत। हरि उर रुरत कंकन ललित किंकिनी मुखर मंजीर ध्वनि सकल जन मन हरत ॥ एक में एक ब्रज सुंदरी अधिक गुन रूप रस मत्त गिरिधरन संग स्वर भरत। सबहिं जोवन भरी उरप पनि तिरप संगीत गति अलग मति तत्त थेई-थेई करत । श्रवन सुनि सुर वधू मधुर कर मलिका निकट अति जपत मन में न धीरज धरत। रसिक मणि मुकुट नंदलाल की केलि यह गदाधर मिश्र के बैंक न मन तें टरत ।।११९॥

श्रीचतुरभुजदासजी कृत-राग भैरव

प्यारी ग्रीवा भुज मेलि निर्त्तत पिय सुजान। मुदित परस्पर लेत गति में गति गुन रासि राधे गिरिधरन गुन निधान॥ सरस मुरली धुनि मिले मधुर सुर रास रंग भीने गावे औघर तान वंधान। चतुरभुज प्रभु स्यामा स्याम की नटन देखि, मोहे खग मृग वन थकित व्योम यान ॥१२०

श्रीकृष्णदासजी कृत-राग हमीर

रास में रस भरी राधिका आवै। बाहु पिय अंस धरि हंस गति लटकती, कुच कनक घट से रसिक मनहिं भावै॥ तिरप तांडव लास्य उरप सुलपन भेद निर्त्तत पिय संग मधुत कल गावै। लोल कटि देस रुरत रतन मेखला नूपुर क्वनित हस्तक दिखावै॥ चपल भैंहें नैन रूप रुचिर मुसिकावनी रूप गुन रासि प्रानपतिहि रिझावै। बृषभानु नन्दिनी गिरिधरन नन्द सुत, चरन रैनु नित तहाँ कृष्णदास पावै ॥१२१॥

श्रीपरमानन्ददासजी कृत-राग केदारौ

रास रच्यौ वन कुँवर किशोरी। मंडल विमल सुभग वृन्दावन जमुना पुलिन स्यामघन गोरी ॥ बाजत बैनु रवावकिन्नरी कंकन नूपुर किंकिनि सोरी। तत्त थेई तत्त थेई शब्द उघटत पीय. भले बिहारि बिहारिन जोरी। वरहा मुकुट भटि तट आवत धरै भुजन में भामिनि भोरी। आलिंगन चुबन परिरंभन परमानन्द डारत मृन तोरी ॥१२२॥

श्रीसूरदासजी कृत-राग मारु

रच्यौ रास रंग स्याम सबहिनु सुख दीनौ। मुरली धुनि करि प्रकास खग मृग सुनि रस उदास, जुवती तजि ग्रेह बास बनहिं गवन कीनौ । मोहे सुर असुर नाग मुनि जन गन भये जाग, शिव-सारद-नारदादि चकित भये जानी। अमरन गन अमर नारि आयै लोकन बिसारि, ओक-ओक त्यागि कहत धन्य-धन्य बानी ॥ थकित भयौ गति समीर चंद्रमा भयौ अधीर, तारा गण लज्जित भये मारग नहिं पावैं। उलटि यमुन बही धार विपरित वसही विचार, सुर प्रभु संग नारि कौतिक उपजावैं ॥१२३॥

राग रामकली-

निर्त्तत श्याम श्यामा हेत। मुकुट लटकन भृकुटि मटकन नारि मन सुख देत ।। कबहुँ चलत सुधंग गति लै, कबहुँ उघटत बैन । लोल कुंडल गंड मण्डित, चपल नैनन सैन ॥ स्याम की छवि निरखि नागरि रही इकटक जोइ। सूर प्रभु उर लाइ लीनी प्रेम गुन करि पोइ ॥१२४॥

राग सारंग-

सुन, हरि मुरली अधर बजाई। मोहे सुर नर नाग निरंतर ब्रज वनिता मिलि धाई ॥ जमुना तीर प्रवाह थकित भयौ पवन रह्यौ मुरझाई। खग-मृग-मीन अधीन भए सब अपनी गति विसराई ॥ द्रम-वेली अनुराग पुलक तन ससि थक्यौ निसि न घटाई। सूरदास वृन्दावन बिहरत चलहु सखी सुध पाई॥१२५॥

श्रीसूरदास मदन मोहन जी कृत-राग सारंग

अरुझी कुंडल लट वेसरसों पीतपट वनमाल बीच आइ अरुझे हैं दोऊ जन। नैनन सौं नैना प्रानन सौ प्रान अरुझि रहे चटकीली छवि देखि लटपटात स्याम घन।। होड़ा होड़ी नृत्य करें रीझि-रीझि अंक भरें तत्ता थेई तत्ता थेई कहत मगन मन। सूरदास मदन मोहन रास मंडल में प्यारी कौ अंचल लै लै पोंछत हैं श्रम कन॥१२६॥

श्रीकुम्भनदासजी कृत-राग केदारौ

गावत गिरिधरन संग प्रेम मुदित रास रंग, उरप तिरप लेत तान नागर नागरी। स रे ग म प ध नि उघटत गति सप्त सुरन लेत लाग दाट कल अति उजागरी ॥ चर्वन ताम्बूल देत ध्रुव तालें गतिहि लेत गिडि-गिडि तत्त थोंग-थोंग अलग लाग री। सुरत केलि रस विलास बलि-बलि-बलि कुँभनदास श्री राधा-नंद नंदन वर सुहाग री ॥१२७॥

श्रीगोविंद स्वामीजी कृत-राग बिहागरौ

मदन मोहन संग मोहनी कुंज सदन में विलसत नव रंगे। प्रान प्यारी प्रान प्यारौ लटपटाय पग रहे, आधे-आधे वचन कहत माते अनंगे।॥ परसत गहि चिबुकविंदु चाह रहत वदन इंदु, हँसि-हँसि जात कबहुँ लेत उछंगे। गोविंद बलि विचित्र जोरी नव किशोर नव किशोरी, गावत केदारौ राग सुघर तान तरंगे ॥१२८॥

राग भैरव-

नाचत गिरिधरन संग राधिका बनी। कंचन तन नील वसन स्याम कंचकी तनी, कर कंगन कटि सुदेस रुनित किंकिनी ॥ थेई-तत्त-थेई वदत मान उरप तिरप करत गान सरस तान राग रागिनी। ताल झाँझ गति मृदंग मिलवत बीना उपंग, बाजत पग नूपुर गति मंज कल धूनी ॥ राका निशि सरद चन्द प्रगटित अंग-अंग अनंग, रह्यौ रंग सरस तट कलिंद नंदिनी। रीझे गिरिधर सुजान रसिक राइ गुन निधान, साधु-साधु कहत अंक भरत सुखदनी ॥ दंपति रति रूप रास करत केलि रति विलास, निरखि सखी प्रेम विवस सकल भावनी। लीला रस सुख निहारि तन-मन-धन प्रान बारि, गोविंद प्रभु अखिल केलि जगत पावनी ॥१२९॥

राग बिहागरौ-

आज गोपाल रच्यौरास देख होत जिय हुलास, नाचत बृषभान सुता संग रंग भीने। गिड-गिड़ तक धुंग-धुंग ततत-ततत थेई-थेई, गावत केदारौ राग सरस तान लीने ॥ फूले बहु भाँति फूल सुभग पुलिन जमुना कूल, मलय पवन बहत गगन उडुपति गति छीने। गोविंद प्रभु करत केलि भामिनी रस सिंधु झेलि, जय-जय सुर शब्द कहत आनंद रस कीने ॥१३०॥

श्रीभगवानदासजी कृत-राग केदारौ

बन्यौ मोर मुकट नटवर वपु स्याम सुंदर कमल नैन, बाँकी भौंह ललित भाल घुघर वारी अलकें। पीत वसन मोती माल हियें पदिक कंठ लाल, हँसन बोलन गावन गंडन श्रवण कुंडल झलकें । कर पद भूषन अनूप कोटि मदन मोहन रूप, अद्भुत वदन चंद देखि गोपी भूली पलकें। कहें भगवान हित रामराय प्रभु ठाडे रास मण्डल मधि, राधे सों बाँह जोटी कियें हियें प्रेम ललकें ॥१३१॥

श्रीमोहनदासजी कृत-राग भैरव

निर्त्तत गोपाल संग गोपिका मिली। अद्भुत नट भेष देखि कोटि काम अति विशेष, मुरलि अधर मधुर सप्त स्वरन सों रली॥ गावत पिक कंठ सरस परम रीझि भीज तान भामिनी सुजान श्रीबृषभान की लली। वलय नूपुर किंकिनी की झनक ततत थेई-थेई उघटत मुख शब्दावलि ग्रीव भुज पिली ॥ बाजत मधुरे मृदंग ता धिलांग गति सुधंग, संग लेत देत ताल रास मंडली। कोलाहल करत हंस मोर सोर चहुँ ओर भोर भयें फूली मानों कंज की कली॥ श्रीवृन्दावन नव निकुंज प्रेम पुंज भरे हरख निरखि तरणितनया तीर चाँदनी भली। श्रीवल्लभ चरणारविंद पंकज मकरंद सरस करत दान मान दास मोहन अली ॥१३२॥

श्रीनन्ददासजी कृत-राग केदारौ

देखौ री नागर नट निर्त्तत कालिंदी तट गोपिन के मध्य राजै मुकट लटक। काछिनी किंकिनी कटि पीतांवर की चटक कुंडल किरन रवि रथ की अटक॥ तत्ता थेई तत्ता थेई शब्द सकल घट उरप तिरप गति पग की पटक। रास में राधे-राधे मुरली में येही रट नन्ददास गावैं तहाँ निपट निकट ॥१३३॥

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