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Padawali Utsav

श्री हित चौरासी जी

  • November 30, 2025
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श्री हित चौरासी जी

श्री हित चौरासी जी

-श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी द्वारा कृत 

पद 1

जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे, भावे मोहि जोई सोई सोई करे प्यारे |

मोको तो भावती ठौर प्यारे के नैनन में, प्यारो भयो चाहे मेरे नैनन के तारे |

मेरे तन मन प्राण हु ते प्रीतम प्रिय, अपने कोटिक प्राण प्रीतम मोसो हारे |

जय श्रीहित हरिवंश हंस हंसिनी सांवल गौर, कहो कौन करे जल तरंगिनी न्यारे ॥1॥

पद 2

प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनी भेंटि नवीन मेघ सौं दामिनी।

मोहन रसिक राइ री माई तासौं जु मान करै, ऐसी कौन कामिनी।

(जै श्री) हित हरिवंश श्रवन सुनत प्यारी राधिका, रमन सौं मिली गज गामिनी ॥2॥

पद 3

प्रात समै दोऊ रस लंपट, सुरत जुद्ध जय जुत अति फूल।

श्रम-वारिज घन बिंदु वदन पर, भूषण अंगहिं अंग विकूल।

कछु रह्यौ तिलक सिथिल अलकावालि, वदन कमल मानौं अलि भूल।

(जै श्री) हित हरिवंश मदन रँग रँगि रहे, नैंन बैंन कटि सिथिल दुकुल ॥3॥

पद 4

आजु तौ जुवती तेरौ वदन आनंद भरयौ, पिय के संगम के सूचत सुख चैन।

आलस बलित बोल, सुरंग रँगे कपोल, विथकित अरुन उनींदे दोउ नैंन ॥

रुचिर तिलक लेस, किरत कुसुम केस; सिर सीमंत भूषित मानौं तैं न।56

करुना करि उदार राखत कछु न सार; दसन वसन लागत जब दैन ॥78

काहे कौं दुरत भीरु पलटे प्रीतम चीरु, बस किये स्याम सिखै सत मैंन।910

गलित उरसि माल, सिथिल किंक11नी जाल, (जै श्री) हित हरिवंश लता गृह सैंन ॥4॥12

पद 5

आजु प्रभात लता मंदिर में, सुख वरषत अति हरषि जुगल वर।

गौर स्याम अभिराम रंग भरे, लटकि लटकि पग धरत अवनि पर।

कुच कुमकुम रंजित मालावलि, सुरत नाथ श्रीस्याम धाम धर।

प्रिया प्रेम के अंक अलंकृत, विचित्र चतुर सिरोमनि निजु कर।

दंपति अति मुदित कल, गान करत मन हरत परस्पर।

(जै श्री) हित हरिवंश प्रंससि परायन, गायन अलि सुर देत मधुर तर ॥5॥

पद 6

कौन चतुर जुवती प्रिया, जाहि मिलन लाल चोर है रैंन।

दुरवत क्योंअब दूरै सुनि प्यारे, रंग में गहले चैन में नैन ॥

उर नख चंद विराने पट, अटपटो से बैन।

(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधापति प्रमथीत मैंन ॥6॥

पद 7

आजु निकुंज मंजु में खेलत, नवल किसोर नवीन किसोरी।

अति अनुपम अनुराग परसपर, सुनि अभूत भूतल पर जोरी ॥

विद्रुम फटिक विविध निर्मित धर, नव कर्पूर पराग न थोरी।

कौंमल किसलय सैंन सुपेसल, तापर स्याम निवेसित गोरी ॥

मिथुन हास परिहास परायन, पीक कपोल कमल पर झोरी।

गौर स्याम भुज कलह28 मनोहर, नीवी बंधन मोचत डोरी ॥

हरि उर मुकुर बिलोकि अपनपी, विभ्रम विकल मान जुत भोरी।

चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रवोधत, पिय प्रतिबिंब जनाइ निहोरी ॥

‘नेति नेति’ बचनामृत सुनि सुनि, ललितादिक देखतिं दुरि चोरी।

(जै श्री) हित हरिवंश करत कर धूनन, प्रनय कोप मालावलि तोरी ॥7॥

पद 8

अति ही अरुन तेरे नयन नलिन री।

आलस जुत इतरात रंगमगे, भये निशि जागर मषिन मलिन री ॥

सिथिल पलक में उठति गोलक गति, बिंध्यौ मोहन मृग सकत चलि न री।

(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि, संभ्रम देत भ्रमरनि अलिन री ॥8॥

पद 9

बनी श्रीराधा मोहन की जोरी।

इंद्र नील मनि स्याम मनोहर, सात कुंभ तनु गोरी ॥

भाल बिसाल तिलक हरि, कामिनी चिकुर चन्द्र बिच रोरी।

गज नाइक प्रभु चाल, गयंदनी गति बृषभानु किसोरी ॥

नील निचोल जुवती, मोहन पट – पीत अरुन सिर खोरी।

(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति, सूरत रंग में बोरी ॥9॥

पद 10

आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर, कहा कहौं अंग अंग परम माधुरी।

करत केलि कंठ मेलि बाहु दंड गंड – गंड, परस, सरस रास लास मंडली जुरी ॥

स्याम – सुंदरी विहार, बाँसुरी मृदंग तार, मधुर घोष नूपुरादि किंकिनी चुरी।

(जै श्री) देखत हरिवंश आलि, निर्तनी सुघंग चलि, वारी फेरी देत प्राँन देह सौं दुरी ॥10॥

पद 11

मंजुल कल कुंज देस, राधा हरि विसद वेस, राका नभ कुमुद बंधु, सरद जामिनी।

साँवल दुति कनक अंग, विहरत मिलि एक संग; नीरद मनी नील मध्य, लसत दामिनी ॥

अरुन पीत नव दुकुल, अनुपम अनुराग मूल; सौरभ जुत सीत अनिल, मंद गामिनी।

किसलय दल रचित सैन, बोलत पिय चाटु बैंन; मान सहित प्रति पद, प्रतिकूल कामिनी ॥

मोहन मन मथत मार, परसत कुच नीवी हार; येपथ जुत नेति नेति, बदति भामिनी।37

“नरवाहन” प्रभु सुकेलि, वहु विधि भर, भरत झेलि, सौरत रस रूप नदी जगत पावनी ॥11॥

पद 12

चलहि राधिके सुजान, तेरे हित सुख निधान; रास रच्यौ स्याम तट कलिंद नंदिनी।383940

निर्तत जुवती समूह, राग रंग अति कुतूह; बाजत रस मूल मुरलिका अनन्दिन ॥414243

बंसीवट निकट जहाँ, परम रमनि भूमि तहाँ; सकल सुखद मलय बहै वायु मंदिनी।444546

जाती ईषद बिकास, कानन अतिसै सुवास; राका निसि सरद मास, विमल चंदिनि ॥474849

नरवाहन प्रभु निहारी, लोचन भरि घोष नारि50, नख सिख सौंदर्य काम दुख निकंदिनी।5152

विलसहि भुज ग्रीव मेलि भामिनि सुख सिंधु झेलि; नव निक53ुंज स्याम केलि जगत बं54दिनी ॥12॥

पद 13

नंद के लाल हरयौं मन मोर।55

हौं अपने मोतिनु लर पोवति, काँकरी डारि गयो सखि भोर ॥56

बंक बिलोकनि चाल छबीली, रसिक सिरोमनि नंद किसोर।57

कहि कैसें मन रहत श्रवन सुनि, सरस मधुर मुरली की घोर ॥58

इंदु गोबिंद वदन के कारन, चितवन कौं भये नैंन चकोर।59

(जै श्री) हित हरिवंश रसिक रस जुवती तू लै मिलि सखि प्राण अँकोर ॥13॥

पद 14

अधर अरुन तेरे कैसे कैं दुराऊँ ?

रवि ससि संक भजन किये अपबस, अदभुत रंगनि कुसुम बनाऊँ ॥

सुभ कौसेय कसिव कौस्तुभ मनि, पंकज सुतनि ले अंगनि लुपाऊँ।

हरषित इंदु तजत जैसे जलधर, सो भ्रम ढूंढि कहाँ हों पाऊँ ॥

अंबु न दंभ कछू नहीं व्यापत, हिमकर तपे ताहि कैसे कैं बुझाऊँ।

(जै श्री) हित हरिवंश रसिक नवरंग पिय भृकुटि भौंह तेरे खंजन लराऊँ ॥14॥

पद 15

अपनी बात मोसौं कहि री भामिनी, औंगी मौंगी रहति गरब की मात।

हों तोसों कहत हारी सुनी री राधिका प्यारी निसि कौ रंग क्यों न कहति लजाती ॥

गलित कुसुम बैंनी सुनी री सारंग नैंनी, छूटी लट, अचरा वदति, अरसाती।

अधर निरंग रंग रच्यौ री कपोलनि, जुवति चलति गज गति अरुझाती ॥

रहसि रमी छबीले रसन वसन ढीले, सिथिल कसनि कंचुकी उर राती ॥

सखी सौं सुनी श्रावन बचन मुदित मन, चलि हरिवंश भवन मुसिकाती ॥15॥

पद 16

आज मेरे कहैं चलौ मृगर्नैनी।

गावत सरस जुबति मंडल में, पिय सौं मिलें पिक बैंन ॥

परम प्रवीन कोक विद्या में, अभिनय निपुन लाग गति लेंनी।

रूप रासि सुनी नवल किसोरी, पलु पलु घटति चाँदनी रैंनी ॥

(जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर, राधा रमण सुरत सुख देंनी।

रहसि रभसि आलिंगन चुंबन, मदन कोटि कुल भई कुचेंनी ॥16॥

पद 17

आजु देखि व्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि।

अंस अंस बाहु दै किसोर जोर रूप रासि, मनौं तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि ॥

नव निकुंज भ्रमर गुंज, मंजु घोष प्रेम पुंज, गान करत मोर पिकनि अपने सुर सौं मेलि।

मदन मुदित अंग अंग, बीच बीच सुरत रंग, पलु पलु हरिवंश पिवत नैंन चषक झेलि ॥17॥

पद 18

सुनि मेरो वचन छबीली राधा। तैं पायौ रस सिंधु अगाधा ॥

वृषवानु गोप की बेटी। मोहनलाल रसिक हँसि भेंटी ॥

जाहि विरंचि उमापति नाये। तापै तैं वन फूल बिनाये ॥

जौ रस नेति नेति श्रुति भाख्यौ। ताकौ तैं अधर सुधा रस चाख्यौ ॥

तेरो रूप कहत नहिं आवै। (जै श्री) हित हरिवंश कछुक जस गावै ॥18॥

पद 19

खेलत रास रसिक ब्रजमंडन। जुवतिन अंस दियें भुज दंडन ॥

सरद विमल नभ चंद विराजै। मधुर मधुर मुरली कल बाजै ॥

अति राजत घन स्याम तमाला। कंचन वेलि बनीं ब्रज बाला ॥

बाजत ताल मृदंग उपंगा। गान मथत मन कोटि अनंगा ॥

भूषन बहुत विविध रंग सारी। अंग सुघंग दिखावतिं नारी ॥

बरषत कुसुम मुदित सुर जोषा। सुनियत दिवि दुंदुभि कल घोषा ॥

(जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा। राधा रमन सकल सुख धामा ॥19॥

पद 20

मोहनलाल के रस माती। बधू गुपति गोवति कत मोसौं, प्रथम नेह सकुचाती ॥

देखी सँभार पीत पट ऊपर कहाँ चूनरी राती।

टूटी लर लटकति मोतिनु की नख विधु अंकित छाती ॥

अधर बिंब खंडित, मषि मंडित गंड, चलति अरुझाती।

अरुन नैंन घुमत आलस जुत कुसुम गलित लट पाती ॥

आजु रहसि मोहन सब लूटी विविध, आपनी थाती।

(जै श्री) हित हरिवंश वचन सुनी भामिनि भवन चली मुसकाती ॥20॥

पद 21

तेरे नैंन करत दोउ चारी।

अति कुलकात समात नहीं कहुँ मिले हैं कुंज विहारी ॥

विथुरी माँग कुसुम गिरि गिरि परें, लटकि रही लट न्यारी।

उर नख रेख प्रकट देखियत हैं, कहा दुरावति प्यारी ॥

परी है पीक सुभग गंडनि पर, अधर निरँग सुकुमारी।

(जै श्री) हित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग अँग भारी ॥21॥

पद 22

नैननिं पर वारौं कोटिक खंजन।

चंचल चपल अरुन अनियारे, अग्र भाग बन्यौ अंजन ॥

रुचिर मनोहर बंक बिलोकनि, सुरत समर दल गंजन।

(जै श्री) हित हरिवंश कहत न बनै छबि, सुख समुद्र मन रंजन ॥22॥

पद 23

राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल।

तौं निजु भजन कनक तन जोवन, लियौ मनोहर मोल ॥

अधर निरंग अलक लट छूटी, रंजित पीक कपोल।

रस मगन भई नहिं जानत, ऊपर पीत निचोल ॥

कुच जुग पर नख रेख प्रकट मानौं, संकर सिर ससि टोल।

(जै श्री) हित हरिवंश कहत कछू भामिनि, अति आलस सौं बोल ॥23॥

पद 24

आजु गोपाल रास रस खेलत, पुलिन कलपतरु तीर री सजनी।

सरद विमल नभ चंद विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी ॥

चंपक बकुल मालती मुकुलित, मत्त मुदित पिक कीर री सजनी।

देसी सुघंग राग रँग नीकौ, ब्रज जुवतिनु की भीर री सजनी ॥

मघवा मुदित निसान बजायौ, व्रत छाँड्यौ मुनि धीर री सजन।

(जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा, हरति मदन घन पीर री सजनी ॥24॥

पद 25

आजू निकी बनी श्री राधिका नागरी।

ब्रज जुवति जूथ में रूप अरु चतुरई, सील सिंगार गुन सबनितें आगरी ॥

कमल दक्षिण भुजा बाम भुज अंस सखि, गाँवती सरस मिलि मधुर सुर राग री।

सकल विद्या विदित रहसि ‘हरिवंश हित’, मिलत नव कुंज वर स्याम बड़ भाग री ॥25॥

पद 26

मोहनी मदन गोपाल की बाँसुर।

माधुरी श्रवन पुट सुनत सुनि राधिके, करत रतिराज के ताप को नासुरी।

सरद राका रजनी विपिन बृंदा सजनी, अनिल अति मंद सीतल सहित बासुरी री।

परम पावन पुलिन भृंग सेवत नलिन, कलपतरु तीर बलवीर कृत रासु री।

सकल मंडल भलीं तुम जु हौं मिलीं, बनी वर वनिता उपमा कहों कासु री।

तुम जु कंचन तनी लाल मरकट मनि, उभय कल हंस ‘हरिवंश’ बलि दासुरी ॥26॥

पद 27

मधुरितु वृन्दावन आनन्द न थोर। राजत नागरी नव कुसल किसोर॥

जूथिका जुगल रूप मञ्जरी रसाल। विधकित अलि मधु माधवी गुलाला॥

चंपक बकुल कुल विविध मृदंग। केतकि मेदिनि मद मुदित मनोज॥

रोचक रुचिर बहै त्रिविध समीर। मुकुलित नूत नदित पिक कीर॥

पावन पुलिन घन मंजुल निकुंज। किसलय सैन रचित सुख पुंज॥

मंजीर मुरज डफ मुरली मृदंगा। बाजत उपंग बीना वर मुख चंगा॥

मृगमद मलयज कुकुम अबीर। बन्दन अगरुसत सुगंधित चीर॥

गावत सुंदरी हरी सरस धमारि। पुलकित खग मृग बहुत न वारि॥

(जै श्री) हित हरिवंश हंस हंसिनी समाज। ऐसी करो मिलै जुग जुग राज॥ 27॥

पद 28

राधे देखि वन की बात।

रितु बसंत अनंत मुकुलित कुसुम अरु फल पात ॥

बैंनू धुनि नंदलाल बोली, सुनि क्यों अरु सात।

करत विलंब भामिनि वृथा औसर जात।

लाल मरकट मनि छबीली तुम जु कंचन गात।

बनी (श्री) हित हरिवंश जोरी उभै गुन मात ॥28॥

पद 29

व्रज नव तरुनी कदंब मुकुट मनि स्यामा आजु बनी।

नख सिख लौं अंग अंग माधुरी मोहे स्याम धनी॥

यौं राजत कबरी गुथित कच कनक कुंज वदनी।

चिकुर चंद्रिकानि बिच अरथ बिधु मानौ ग्रसित फनी॥

सौभग रस सिर स्त्रवत पनारी पिय सीमंत ठनी।

भृकुटि काम कोंदंड नैंन सर कज्जल रेख अनी॥

तरल तिलक तांटक गंड पर नासा जलज मनि।

दसन कुंद सरसाधर पल्लव प्रीतम मन समनी॥

चिबुक मध्य अति चारु सहज सखि साँवल बिंदु कनी।

प्रीतम प्रांन संपुट कुच कंचुकी कसिब तनी॥

भुज मृनाल वल हरत वलय जुत परस सरस श्रवनी।

स्याम सीस तरु मनौं मंदिबारी रची रचनी॥

नाभि गम्भीर मींन मोहन मन खेलत कौ हंदनी।

कस कटि पृथु नितंब किंकनि वृत कदलि खंभ जघनी॥

पद अंबुज जावक जुत भूषन प्रीतम उर अवनी।

नव नव भाइ विलोभि भाम दृग विहरत वर कारिनी॥

(जै श्री) हित हरिवंश प्रसंसीता स्यामा कीरति विसद घनी।

गावत श्रवननि सुनि सुखाकर विस्व दुरित दवनी ॥29॥

पद 30

देखत नव निकुंज सुजु सजनी लागत है अति चारु।

माधिवका केतकी लता लै रच्यौ मदन अंगारु॥

सरद मास राका निसि सीतल मंद सुगंध समीर।

परिमल लुब्ध मधुपव्रत विधकित नदित कोकिला कीर॥

बहु विध मृदुल किसलय दल निर्मित पिय सखि सेज।

भाजन कनक विविध मधु पूरित धरे धरनि पर हेज॥

तापर कुसल किसोरी किसोरी करत हास परिहास।

प्रीतम पानि उरज परसत पिया दुरावति वास्॥

कामिनी कुटिल भृकुटि अवलोकत दिन प्रतिपद प्रतिकूल।

आतुर अति अनुराग विवस हरि धाड़ भुज भूल॥

नगर नीवी बंधन मोचत पंच नील निचोल।

बधू कपट हठ कोपि कहत कल नेति नेति मधु बोल॥

परिरंभन विपरीत रति वितरत सरस सुरत निजु केलि।

इंद्रनील मनियत तरु मानौं लसत कनक की बेलि॥

रति रन मिथुन ललाट पर श्रम जल सीकर संग।

ललितादिक अंचल झकोरति मन अनुराग अभंग॥

(जै श्री) हित हरिवंश यथा मति वरनत कृष्णरसामृत सार।

श्रवन सुनत प्रापक रति राधा पद अंबुज सुकुमार ॥30॥

पद 31

आजु अति राजत दम्पति भोर।

सुरत रंग में भिनें नागरी नवल किशोर॥

अंसनि पर भुज दियें बिलोकत इंदु वदन विधि ओर।

करत पान रस मत्त परस्पर लोचन तृषित चकोर॥

छूटीं लटनि लाल मन करष्यौ ये याके चित चोर।

परिरंभन चुंबन मिलि गावत सुर सुंदर कल घोर॥

पग डगमगत चलत बन विहरन रुचिर कुंज घन खोर।

(जै श्री) हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियो सिरावत भोर ॥31॥

पद 32

आजु बन क्रीडत स्यामा स्याम।

सुभग बनी सरद चाँदनी, रुचिर कुंज अभिराम॥

खंडत अधर करत परिरंभन, पैंचत जघन दुकूल।

उर नख पात तिरीछी चितवन, दंपति रस सम तूल॥

वे भुज पीन पयोधर परसत, वाम दसा पिय हार।

वसननि पीक अलक आकरषत, समर श्रमित सत मार॥

पलु पलु प्रवल चैंप रस लंपट, अति सुंदर सुकुमार।

(जै श्री) हित हरिवंश आजु तुन टूटत है बलि विसद विहार ॥32॥

पद 33

आजु बन राजत जुगल किसोर।

नंद नंदन वृषभानु नंदिनी उनींदे भोर॥

डगमगात पग परत् सिथिल गति परसत नख ससि छौर।

दसन वसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु खौर॥

दुरत न कछु करजनि के रोकें नैन अलि चोर।

(जै श्री) हित हरिवंश संभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर ॥33॥

पद 34

बन की कुंजनि कुंजनि डोलनि।

निक्सत निपट साँकरी बीथिनु, परसत नाँहि निचोलनि॥

प्रात काल रजनी सब जागे, सूचत सुख द्रग लोलनि।

आलसवत अरुन अति ब्याकुल, कछु उपजत गति गोलनि॥

निरतनि भृकुटि वदन अंबुज मृदु, सरस मधु बोलनि।

अति आसक्त लाल अलि लंपट, बस कीने बिनु मोलनि॥

विलुलित सिथिल स्याम छूटी लट, राजत रुचिर कपोलनि।

रति विपरीत चुंबन परिरंभन, चिबुक चारु टक टोलनि॥

कब हूँ अमित किसलय सिज्या पर, मुख अंचल झकझोलनि।

दिन हरिवंश दासि हिय सींचत, वारिधि केलि कलोलनि ॥34॥

पद 35

झूलत दोऊ नवल किसोर।

रजनी जनित रंग सुखत अंग अंग उठि भोर॥

अति अनुराग भरे मिलि गावत सुर मंदर कल घोर।

बीच बीच प्रीतम चित चोरति प्रिया नैन की कोर॥

अबला अति सुकुमारि डरत मन वर हिंडोर झँकोर।

पुलकि पुलकि प्रीतम उर लागति दे नव उरज अँकोर॥

अरुझी विमल केंकन कौं कुंडल कौं सों कछु क जोर।

येपथ जुत बनौ विवेक आतंदयौ न थोरा॥

निरखि निरखि फूलतीं ललितादिक विधि मुख चंद चकोर।

दे असीस हरिवंश प्रशंसत करि अंचल की छोर ॥35॥

पद 36

आजु बन नीकौ रास बनायौ।

पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट मोहन बैंनूं बजायौ॥

कल कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि खग मृग सचु पायौ।

जुवतिनु मंडल मध्य स्याम साँरँग राग जमायौ॥

ताल मृदंग उपंग मुरज डफ रससिंधु बढ़ायौ।

विविध विसाद वृषभानु नंदिनी अंग सुघंग दिखायौ॥

अभिनय निपुन लटकि लटकि लोचन भृकुटि अनंग नचायौ।

ताता थै थै धरत नींतन गति पतिव्रज रिझायौ॥

सकल उदार नृपति चूड़ामणि सुख वारिद वरषायौ।

परिरंभन चुंबन आलिंगन जुवति जुवति जन पायौ॥

बरसत कुसुम मुदित नभ नाइक इंद्र निसान बजायौ।

(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति जस वितान जग छायौ ॥36॥

पद 37

चलहि किन मानिनि कुंज कुटीर।

तौ बिनु कुँवरि कोटि वनिता जुत, मथत मदन की पीर॥

गदगद सुर विरहकुल पुलकित, स्रवत विलोचन नीर।

क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी, विलपत विपिन अधीर॥

बंसी विसिख, ब्याल मालवलि, पंचांनन पिक कीर।

मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखा मृग रिपु चीर॥

(जै श्री) हित हरिवंश परम कोमल चित, चपल चली पिय तीर।

सुनि भयभीत व्रज को पुंजर्, सुरत सूर रन वीर ॥37॥

पद 38

चलहि उठि गह्रू करति कत, निकुंज बुलावति लाल।

हा राधा राधिका पुकारत, निरखि मदन गज डाल॥

करत सहाइ सरद ससि मारुत, फुटी मिलि उर माल।

द्रुमि तकत समर अति कातर, करहि न पिय प्रतिपाल॥

(जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर, श्रवन सुनत तेहि काल।

लै राखे गिर कुच बिच सुंदर, सुरत सुर व्रज बाल ॥38॥

पद 39

खेल्यौ लाल चाहत रवन।

रचि रचि अपने हाथ सँवार्यौ निकुंज भवन॥

रजनी सरद मंद सौरभ सौं सीतल पवन।

तौ बिनु कुँवरि काम की बेदन मेटब कवन॥

चलहि न चपल बाल मृगनैनी तजि भवन।

(जै श्री) हित हरिवंश मिलब प्यारे की आरती दवन ॥39॥

पद 40

बैठे लाल निकुंज भवन।

रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित त्रिविध पवन॥

तू सखी काम केलि मन मोहन दवन।

वृथा गह्रू कत करति कुसौंदरी कारन कवन॥

चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन।

(जै श्री) हित हरिवंश मिलै रस लंपट राधिका रवन ॥40॥

पद 41

प्रीति की रीति रंगीलौ जान।

जद्यपि सकल लोक चूड़ामणि दींन अपनो मानै॥

जमुना पुलिन निकुंज भवन में मान मानिनी ठानै।

निकट नवीन कोटि कामिनि कुल धीरज नहिं आनै॥

नस्वर नेह मधुकर् ज्यों आँन सौं बानै।

(जै श्री) हित हरिवंश चतुर सोई लालहि छांड़ि मैंड पहिचानै ॥41॥

पद 42

प्रीति न काहु की कानि विचारै।

मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत् निवारै॥

ज्यों सरिता साँवल जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै।

ज्यों नादहि मनि दियँ कुरंगनि प्रगट पारधी मारै॥

(जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं ससभ सरीरहि जारै।

नाइक निपुन नवल मोहन बिनु कौन अपनो हारै ॥42॥

पद 43

अति नागरी वृषभानु किसोरी।

सुनि दूतिका चपल मृगनैनी, आकरषत चितवन चित गोरी॥

श्रीफल उरज कंचन सी देही, कटि केहरि गुन सिंधु झकोरी।

बैनी भुजंग चंद्र बदनी, कदलि जंघ जलचर गति चोरी॥

सुनि ‘हरिवंश’ आजु रजनी मुख, बन मिलाई मेरी निज जोरी।

जद्यपि मान समे भामिनी, सुनि कत रहत भलि जिय भोरी ॥43॥

पद 44

चलि सुंदरी बोली वृंदावन।

कामिनी कठ लागि किन राजहि, तू दामिनि मोहन नौतन घन॥

कंचुकी सुरँग विविध रंग सारी, नख जुग उर बन तने तरन।

ये सब उचित नवल मोहन को, श्रीफल कुच जोवन आगम धन॥

अतिसै प्रीति हुती अंतसगत, (जै श्री) हित हरिवंश चली मुकुलित मन।

निविड़ निकुंज मिलै रस सागर, जीति सत रति राज सुरत रन ॥44॥

पद 45

आवति श्रीवृषभानु दुलारी।

रूप रासि अति चतुर सिरोमणि अंग सुकुमारी॥

प्रथम उबटि मज्जन करि सजजित नील बरन तन सारी।

गुँथित अलक तिलक कृत सुंदर सेंदूर माँग सँवारी॥

मृगज समान नैन अंजन जुत रुचिर रेख अनुसारी।

जटित लवंग ललित नासा पर दसनवल कृत कार॥

श्रीफल उरज कँसूँभी कंचुकी कसि ऊपर हार छबि न्यारी।

कुस कटि उदर गंभीर गँभीर मणि पुट जघन नितंबनि भारी॥

मनौं मृनाल भूषन भूषित भुज स्याम अंस पर डारी।

(जै श्री) हित हरिवंश जुगल करिनी गज विहरत वन पिय प्यारी ॥45॥

पद 46

विपिन घन कुंज रति केलि भुज मेलि रुचि,

स्याम स्यामा मिले सरद की जमिनी।

हृदै अति फूल समतुल पिय नागरी,

करिनि करि मन मत्त विवध गुन रामिनी॥

सरस गति हास परिहास आवैस वस,

दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी।

(जै श्री) हित हरिवंश सुनि लाल लावण्य भिदे,

प्रिया अति सुर सुख सुरत संग्रामिनी ॥46॥

पद 47

वन की लीला लालहि भावै।

पत्र प्रसुन प्रतिबिंबहिं नख सिख प्रिया जनावै॥

सकुच न सकत प्रकट परिरंभन अलि लंपट दुरि धावै।

संभ्रम देत कुलकाकि कामिनि रति रन कलह मचावै॥

उलटी सबैं समझाइ नैननि में अंजन रेख बनावै।

(जै श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनी स्याम कहावै ॥47॥

पद 48

बनी वृषभानु नंदिनी आजु।

भूषन वसन विविध पहिरे तन पिय मोहन हित साज॥

हाव भाव लावण्य भृकुटि लट हरत जुवति जन पाजु।

ताल भेद औधुर सुर सूचत नूपुर किंकिनि बाजू॥

नव निकुंज अभिराम सँग स्याम सँग नीकौ बन्यौ समाजु।

(जै श्री) हित हरिवंश विलास रास जुत जोरी अविचल राजू ॥48॥

पद 49

देखि देउ खोरि खोरि खारिक गिरि गहवर, विहरत कुँवर कँठ भुज मेलि॥

ये दोउ नवल किसोर रूप निधि, विद्रुम तमाल कनक मनि बेलि।

अधर अदन चुंबन परिरंभन, तन पुलकित आनंद रस झेलि॥

पट बंधन कंचुकी कुच परसत, कोप कपट निरखत कर पेलि।

(जै श्री) हित हरिवंश लाल रस लंपट, धाइ धरत उर बीच सँकेलि॥49॥

पद 50

नवल नागरी नवल नागर किसोर मिलि, कुँज्जु कौंमल कमल दलनि सिज्या रची।

गौर स्याम अल अंग रुचिर तापर मिले, सरस मनि नील मनौं कंचन खची॥

सुरत नीवी निबँध हेतु पिय, मानिनी – प्रिया की भुजनि में कलह मोहन मची॥

सुभ्र श्रीफल उरज पाँनि परसत, रोष – हुंकार दर्प दृग भंगि भामिनि लची॥

कोक कोटिक रस र‍हसि ‘हरिवंश हित’, विविध माधुरी किमि नॊंहिं बची।

प्रणयमन रसिक ललितादिक लोचन चषक, पिवत मकरंद सुख रासि अंतर सची ॥50॥

पद 51

दान दै री नवल किसोरी।

माँगत लाल लाड़िली नागर, प्रगट भई दिन दिन की चोरी॥

नव नारंग कनक हीराव लि, विद्रुम सरस जलज मनि गोरी।

पूरित रस पीयूष जुगल घट, कमल कदलि खंजन की जोरी॥

तौपै सकल सैंज दामिनि की, कत सतराति कुटिल दृग भोरी॥

नूपुर रव किंकिनी पिसुन घर, ‘हित हरिवंश’ कहत न थोरी ॥51॥

पद 52

देखौ माई सुंदरता की सींव।

व्रज नव तरुनि कदंब नागरी, निरखि करतिं अधरजीव॥

जौ कोउ कोटिक कल्प लगि जीवै रसनाटि का पावै।

तऊ रुचिर वदनारविंद की सोभा कहत न आवै॥

देव लोक भूलोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये।

सहज माधुरी अंग अंग की कहिं कासौं पटतरिये॥

(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर।

जाकी भू विलास बस पसुरि दिंन दिथकित रस सागर ॥52॥

पद 53

देखौ माई अबला के बल रासि।

अति गज मत्त निरंकुस मोहन; निरखि निरखि बँधे लट पाँसि॥

अबहीं पंगु भई मन की गति; बिनु उद्यम अनायासि॥

तबकी कहा कहाँ जब प्रिय प्रति; चाहति भृकुटि विलासि॥

कच संजम ब्याज भुज दरसति; मुसकनि वदन विकासि॥

हा हरिवंश अनीति रीति हित; कत डारति तन त्रासि ॥53॥

पद 54

नयो नेह नव रंग नयौ रस, नवल स्याम वृषभानु किसोरी।

नव पीतांबर नवल चूनरी, नई नई बूँदानें भीजत गोरी॥

नव ‘वृन्दावन’ मनोहर चित चातक बोलत मोर मोरी।

नव मुरली जु मलार गावै गति; श्रवन सुन्नत आयें घन घोरी॥

नव भूषन नव मुकुट विराजत; नई नई उरप लेत थोरी थोरी।

(जै श्री) हित हरिवंश असीस देत मुख चिरजीवी भूतल यह जोरी ॥54॥

पद 55

आजु दोउ दामिनि मिलि बहसी।

विच लै स्याम घटा अति नौतन, ताके रंग रसी॥

एक चमकि चहूँ ओर सखी री, अपने सुभाउ लसी।

आइ एक सरस गवन में, दुहुँ भुज बीच बसी॥

अंबुज नील उदै ससि विधु राजत, तिनकी कलन खसी।

(जै श्री) हित हरिवंश लोभ भेटन मन, पूरन सरद ससी ॥55॥

पद 56

हौं बलि जाउँ नागरी स्याम।

ऐसौ रंग करौ निसि वासर, वृंदा विपिन कुटी अभिराम॥

हास विलास सुरत रस सिंचन, पशुपति दग्ध जिवावत काम।

(जै श्री) हित हरिवंश लोचन अलि, रंग सफल सकल सुख धाम॥56॥

पद 57

प्रथम जमुना पुलिन प्रनऊँ (श्री) वृंदावन अति रम्य।

श्रीराधिका कृपा बिनु सबके मननि अगम्य॥

वर जमुना जल सींचन दिनहीं सरद बसंत।

विविध भाँति सुमननि के सौरभ अलकुल मंत॥

अरुन नूत पल्लव पर कूँजत कोकिल कीर।

निरतनि करत सिखी कुल अति आनंद अधीर॥

बहत पवन रुचिर सीत दायक सीतल मंद सुगंध।

अरुन नील सित मुकुलित जहँ तहँ पूषन बंध॥

अति कमनीय विराजत मंदिर नवल निकुंज।

सेवत सगन प्रीति जुत दिन भीनध्यन पुंज॥

रसिक रासि जहँ खेलत स्यामा स्याम किसोर।

उभै बाहु परिरंभित उठे उनींदे भोर॥

कनक कपिस पट सोभित सुभंग साँवरे अंग।

नील वसन कामिनि उर कंचुकी कसूँभी सुरँग॥

ताल रबाब मुरज डफ बाजत मधुर मृदंग।

सरस उकति गति सूचत वर बंसुरी मुख चंग॥

दोउ मिलि चोंचरी गावत गौरी राग अलापि।

मानस मृग बल वेधत भृकुटि धनुष दृग चापि॥

दोऊ कर तारिनु पटकत लटकत इत उत जात।

हो होरी बोलत अति आनँद कुलकात॥

रसिक लाल पर मेलति कामिनि बंधन धूरि।

पिय पिचकारिनु हिरकत तकि तकि कुंकुम पूरि॥

कब ह्यौं चंदन तरु निर्मित तरल हिंडोल।

चढ़ि दोउ जन झूलत फूलत करत किलोल॥

वर हिंडोर झँकोरसि कामिनि अधिक डरात।

पुलकि पुलकि येपथ अंग प्रीतम उर लपटात॥

हित चितवति निजु च‍ैरिनु उर आनँद न समात।

निरखि निपट नैंननिं सुख ह्न‍ौं तोरसि बलि जात॥

अति उदार विविध सुंदर सुरत सुर सुकुमारा।

(जै श्री) हित हरिवंश करौ दोऊ अचल बिहार॥57॥

पद 58

तेरे हित लैंन आई, बन ते स्याम पठाई: हरति कामिनि घन कदन काम कौ।

काहे कौं करत बाधा, सुनि री चतुर राधा; भेंटि कै मेटि री माई प्रगट जगत् भौ॥

देखि रजनी नीकी, रचना रुचिर पीकी; पुलिन नलिन नव उदित रह्यौ न धी।

तू तो अब सयानी, तैं मेरी एकौ न मानी; हौं तोसौं कहत हारी जुवति जुगति सौं॥

मोहनलाल छबीली, अपने रंग रंगीली; मोहत्त विहंग मधुर् मुरली र‍ौ।

तू तो अब गनत तन जीवन तब; (जै श्री) हित हरिवंश हरि भजहि भामिनि जुआ 58॥

पद 59

यह जु एक मन बहुत ठौर कौं, कहौ कौनें सचु पायौ।

जहँ तहँ विपत्ति जार जुवति लौं, प्रगट पिंगला गायौ॥

दै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि, परंत कौन पै थायौ।

कहहिं कौन अंक पर रायौ, जों गनिका जुत जायौ॥

(जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच सब काल ब्याल कौं खायौ।

यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल सँगि सिर नायौ ॥59॥

पद 60

कहाँ कहाँ इन नैननि की बात।

ये अलि प्रिया वदन अंबुज रस अटके अनत न जात॥

जब जब रुकति पलक संपुट लट अति आतुर अकुलात।

लंपट लव निमेष अंतर तैं अलप कल्प सत सात॥

श्रुति पै कंज दूर‍्यौ जन कुच जुग मग मद हृदै न समात।

(जै श्री) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात ॥60॥

पद 61

आजु सखी बन में जु बने प्रभु नाचत है ब्रज मंडन।

वैसे किसोर जुवति अंशुनि पर दियें विमल भुज दंड।

कौंमल कुटिल अलक सुछि सोभित अवलंबित जुग गंड।

मानहु मधुप थकित रस लंपट नील कमल के खंडन॥

हास विलास हरत सबको मन काम समूह विहंडन।

(श्री) हित हरिवंश करत अपनो जस प्रकट अखिल ब्रहॉंडन ॥61॥

पद 62

खेलत रास दुलहिनी दुलहु।

सुनहु न सखी सहित ललितादिक, निरखि निरखि नैंननि किन फूलहु॥

अति कल मधुर महा मोहन धुनि, उपजत हस सूता के कुलहु।

थ‍ेई थ‍ेई बचन मिथुन मुख निसरत, सुनि देह दसा किनु भूलहु॥

मृदु पद न्यास उठत कुंकुम रज, अदभुत बहे समीर दुकूलहु।

कबहुँ स्याम स्यामा दंतांचल – कुच कुच छुवत भुज मूलहु॥

अति लावन्य, रूप, अभिनय, गुन, नाहिन कोटि काम समतूलहु।

(जै श्री) हित हरिवंश प्रेम रस झूलहु ॥62॥

पद 63

मोहन मदन त्रिभंगी। मोहन मुनि मन रंगी॥

मोहन सुनि सचन प्रगट परमानंद गुन गंभीर कृपाला।

सीस किरीट श्रवण मनि कुंडल उर मंडित बन माला॥

पीतांबर तन धातु विभूषित कल किंकिनि कटि चंगी।

नख मनि तरनि चरन सरसीरुह मोहन मदन त्रिभंगी॥

मोहन बैंनूं बजावै। इहँ रव नारि बुलावै॥

आइ ब्रज नारि सुनत बंसी रव गृह पति बंधु बिसारै।

दरसन मदन गुपाल मनोरथ मनसिज ताप निवारै॥

हरषित वदन बंक अवलोकन सरस मधुर धुनि बैंनू बजावै।

मधुमय स्याम समान अधर धरे मोहन बैंनू बजावै॥

रास रचा बन माँही। विमल कल्पतरु छाँही॥

विमल कल्पतरु तीर सुपेसल सरद रैंन वर चंदा।

सीतल मंद सुगंध पवन बहै तहॉं खेलत नंद नंदा॥

अदभुत ताल मृदंग मनोहर किंकिनि शब्द कराहीं।

जमुना पुलिन रसिक रस सागर रच्यौ बन माँही॥

देखत मधुकर् केली। मोहे मृग बेली॥

मोहे मृगधनु सहित सुर सुंदरी प्रेम मगन पट घूटे।

उडगन चकित थकित ससि मंडल कोटि मदन लूटे॥

अधर पान परिरंभन अति रस आनंद मगन सहेली।

(जै श्री) हित हरिवंश रसिक सतु पावत देखत मधुकर् केली ॥63॥

पद 64

बैंनूं माई बाजै बंसीवट।

सदा बसंत रहत वृन्दावन पुलिन पवित्र जमुना तट॥

जटित क्रीत मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानों लट।

दसननि कुंद कली छवि लज्जित लज्जित कनक समान पीत पट॥

मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट।

दास अनन्य भजन रस कारन हरिवंश लीला नट ॥64॥

पद 65

मूल मदन धन निकुंज खेलत हरि, राका रुचिर सरद रजनी।

जमुना पुलिन तट सुरतरु के निकट, रचि‍त रास चलि मिलि सजनी॥

बाजत मृदु मृदंग नाचत सबैं सुघंग; तैं न श्रवन सुन्यौ बैंनू बजनी॥

(जै श्री) हित हरिवंश प्रभु राधिका रमन, मोंकौं भावै माई जगत भगत भजन॥65॥

पद 66

विहरत दोऊ प्रीतम कुंज।

अनुपम गौर स्याम तन शोभा वरषत सुख पुंज॥

अद्भुत खेलत महा मनथ की दुंदुभि भूषन राव।

झूलत सुभग परस्पर अंग अंग उपजत कोटिक भाव॥

भरि संगम अमित अति अबला निद्रा युत कटै नैंन।

पिय के अंक निसंक तंक तन आलस जुत कटैं सैन॥

लालन मिस आतुर पिय परसद उरु नाभि उरजात।

अद्भुत छटा विलोकि अवनि पर विथकित वेपथ गात॥

नागरि निरखि मदन विष व्यापत दियौ सुधाधर धीर।

सत्वर उठे महामधुप पीवत मिलत मीन बिनु नीर॥

अबहीं मैं मुख विलौकै विलौकै सु रसाल।

जागत व्यौ भ्रम भयौ परयो मन मनसिज कुल जाल॥

सकृदपि मयि अपराधमुन उपनयै सहज सनेह।

तव पद पंकज को निजु मंदिर पाल‍य सखि मम देह॥

प्रिया कहति कछु कह्नि‍तैं प्रिय नव निकुंज व राज।

सुंदर बचन कत करत वितरत रति लंपट बिनु काज॥

इतनीं श्रवन सु‍नत मानिनि मुख अंतर रह‍्यौ न धीर।

मति कातर विरहज दुख व्यापत बहुतर् स्वास समीर॥

(जै श्री) हित हरिवंश भुजनि आक‍रषे लै राखे उर माँझ।

मिथुन जुत कछु उपजयौ टूटि लव भिव भइ साँझ ॥66॥

पद 67

रुचिर राजत वधू कानन किसोरी।

सरस षोडस कियें, तिलक मृगमद दिये, नखनल जावक जीति, नखन जावक जीति,

मृगज लोचन उबटि अंग सिर खोरी॥

गंड पंडीर मंडित चिकुर चंद्रिका,

मेदिनि कबरी गुँथित सुरँग डोरी।

श्रवण तांटक कै, चिबुक पर बिंदु दै,

कसूँभी कंचुकी दुरे उरज फल कोरी॥

वलय केंकन दोति, नखन जावक जीति,

उदर रेख पट नील कटि थोरी।

सुभग जघन स्थली ववनित किंकि‍नि भली,

कोक संगी‍त रस सिंधु झकोरी॥

विविध लीला रचित रहसि हरिवंश हित;

रसिक सिरमौर राधा रमन जोरी।

भृकुटि निजित मदन मंद सस्मित वदन,

किंये रस दिवस घन स्याम पिय गोरी ॥67॥

पद 68

रास में रसिक मोहन बने भामिनी।

सुभग पावन पुलिन सरस सौरभ नलिन,

मत मधुकर् निकर सरद की जामिनी॥

त्रिविध रोचक पवन ताप दिनमनि दवन,

तहॉं छाँड़ि रमन सँग सत कामिनी।

वाल बीना मृदंग सरस नाचत सुघंग;

एक ते एक संगीत की स्वामिनी॥

राग रागिनि जमीं विपिन बरसत अमी,

अधर बिंबनि रमी मुरलि अभिरामिनी।

लाग कटुर उरप स्रुत सों सुलूप

लेति सुंदर् सुघर राधिका नागिनी॥

तत थै थै धरत गा‍ँव नीतन धरत,

पलटि डगमगि धरति मत गज गामिनी।

धाइ नवरंग धरी उरसि राजत खरी;

उभय कल हंस हरिवंश घन दामिनी ॥68॥

पद 69

मोहिनी मोहन रंगे प्रेम सुरँग,

मंत्र मुदित कल नाचत सुघंगो।

सकल कला प्रवी‍न कल्यान रागिनी लीन,

कहत न बनै माधुरी अंग अंगे॥

तरनि तनया तीर त्रिविध सखी समीर।

मानौं मुनि व्रत धरयौ कपोती कोकिला कीर॥

नागरि नव किशोर मिथुन मनसि चोर।

सरस गावत दोऊ मंजुल मद‍र घोर॥

कंकन किंकिनि धुनि मुखर नूपुर सुनि।

(जै श्री) हित हरिवंश रस बरषत नव तरुनी॥69॥

पद 70

आजु सँभारत नाँहिं गोरी।

फूली फिरत मत्त करिनी ज्यौं सुरत समुद्र झकोरी॥

आलस वलित अरुन धूसर मषि प्रगट करत दृग चोरी।

पिय पर करुन अमी रस बरषत अधर अरुनता थोरी॥

बाँधत भृंग उरज अंबुज पर अलकनि बंध किसोरी।

संगम किरचि किरचि कंचुकि बंध सिथिल भई कटि डोरी॥

देति असीस निरखि जुवती जन जिनकें प्रीति न थोरी।

(जै श्री) हित हरिवंश विपिन भूतल पर संतत अविचल जोरी ॥70॥

पद 71

स्याम सँग राधिका रास मंडल बनी।

बीच नंदलाल ब्रजवाल चंपक वरन,

ज्यौं घन तड़ित विच कनक मरकट मनि॥

लेति गति मान तत थै थेई हस्तक भेद,

स रे ग म प ध नि ये सप्त सुर नंदिनी।

निरतंत रस पहिर पट नील प्रगटित छबी,

वदन जतु जलद में मकर की चंदिनी॥

राग रागिनि ता‍न मान संगीत मत,

थकित राकेश नाम सरद की जामिनी।

(जै श्री) हित हरिवंश प्रभु हंस कटि केहरी,

दूरि कृत मदन मत गज गामिनी ॥71॥

पद 72

सुंदर पुलिन सुभग सुख दायक।

नव नव घन अनुराग परसपर खेलत कुँवर नागरि नाइक॥

सीतल हंस सुता रस बिचिनु परसि पवन सीकर मृदु वरषत।

वर मंदार कमल चंपक कुल सौरभ सरसि मिथुन मन हरषत॥

सकल सुघंग विलास पराविध नाचत नवल मिले सुर गावत।

मृगज मयूर मराल भ्रमर पिक अदभुत कोटि मदन सिर नावत॥

निर्मित कुसुम सैन मधुप पूरित भंजन कनक निकुंज विराजत।

रजनी मुख सुख रासि परस्पर सुरत समर दोऊ दल साजत॥

विट नृपति किसोरी कर धृत, बुधि बल नीवी बंधन मोचत।

‘नेति नेति’ बचनामृत बोलत प्रणय कोप प्रीतम नहिं सोचत॥

(जै श्री) हित हरिवंश रसिक ललितादिक लता भवन रँधनि अवलोकन।

अनुपम सुख भरि विवस असू आनंद वारि कंठ दृग रोकत ॥72॥

पद 73

खंजन मीन मृग मद मैंटत, कहा कहों नैननि कीं बात।

रानी सुंदरी कहाँ लों सिख‍ैई, मोहन वसीकरन की घातें॥

बंक निसक चपल अनियारे, अरुन स्याम सित रचे कह‍ौं तें।

डरत न हरत पर‍्यौ सवँभु मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं॥

नैंकु प्रसन्न दृगि पूरन करि, नहिं मोतत चितयति प्रमदातैं।

(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि, भावै सो करहु प्रेम के नातैं ॥73॥

पद 74

काहे कौं मान बढावति है बालक मृग लोचनि।

हौं डरनि कहि कछु न सकति एक बात सैंकोचनी॥

मत मुरली अंतर तब गावत जा‍गृत सैन विव‍ाकुति सोचनि।

(जै श्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय आतुर विट विरहज दुख मोचनि ॥74॥

पद 75

हौं जु कहति इन बात सखी, सुनि काहे डारत?

प्रांन‍रम‍न स‍ौ क्यौं ड‍र करत, आगस बिनु आरत॥

पिय चितवत तुव चंद वदन तन, तूँ अधमुख निजु चरन निहारत।

वे मृदु चिबुक प्रलोइ प्रवोधत, तूँ भामिनि कर स‍ौ कर टारत॥

विवस अधीर विरह अत्ति कातर औसर कछ‍वै न विचारत।

(जै श्री) हित हरिवंश रहसि प्रीतम मिलि, तृषित नैंन काहे न प्रतिपारत ॥75॥

पद 76

नागर‍ी निकुंज ऐंन किसलय दल रचित सैन,

कोक कला कुसल कुँवर अति उदार री।

सुरत रंग अंग अंग हाव भाव भृकुटि भंग,

माधुरी तरंग मथत कोटि मार री॥

मुखर नूपुरनि सुभाव किंकिनि विचित्र राव,

विरमि विरमि नाथ वदत वर बिहार री।

लाड़िली किसोरि राज हंस हंसिनी समाज,

सींचत हरिवंश न‍ैंन सुरस सार री॥76॥

पद 77

लटकति फिरति जुवति रस फूली।

लता भवन में सरस सकूल, पिय सँग हिंडोरे झूली॥

जद्यपि अति अनुराग रसासव पावन विवस नाहिन गति भूली।

आलस वलित नैंन विग‍लित लट, उर पर कछुक कंचुकी खूली॥

मरागजी माल सिथिल कटि बंधन, चिंतित कज्जल पीक दुकूली।

(जै श्री) हित हरिवंश मदन सर जरजर, विथकित स्याम संजीवनी मूली ॥77॥

पद 78

सुघंग नाचत नवल किसोरी।

थ‍ेई थ‍ेई कहति कहति प्रेम दिशि, वदन चंद मनि त्रिभित चकोर।

तान बंधन मान में नागरी देखत स्याम कहत हो हो होरी॥

(जै श्री) हित हरिवंश माधुरी अंग अंग, बरबस लियो मोहन चित चोरी ॥78॥

पद 79

रहसि रहसि मोहन पिय के संग री, लड़ैती अति रस लटकति।

सरस सुघंग अंग में नागरी, थेई थेई कहति अवनि पद पटकति॥

कोक कला कुल जानि सिरोमणि, अभिनय कुटिल भृकुटियनि मटकति।

विवस भये प्रीतम अलि लंपट, निरखि करज नासा पुट कटकति॥

गुन गुन रसिक राइ चूड़ामणि रिझवति पदिक हार पट झटकति।

(जै श्री) हित हरिवंश निकट दासीजन, लोचन चषक रसासव गटकति॥79॥

पद 80

वल्लवी सु‍क कनरी तमाल स्याम संग,

लागि रही अंग अंग मनोभिरामिनी।

वदन जोति मनि मयंक अलका तिलक छबि कलंक,

छपत्ति स्याम अंक मनौं जलद दामिनी॥

विगत वास हेम खंभ म‍नी भुजंग बैनी दंड,

पिय के कंठ प्रेम पुंज कामिनी।

(जै श्री) सोंभित हरिवंश नाथ सुरत आलस वंद,

उरज कनक कलस राधिका सुनामिनी॥80॥

पद 81

वृषभानु नंदिनी चंद्रकल गावै।

विकट अधर तान चर्चा री ताल सों, नंदनंदन मन‍सि मोद उपजावै॥

प्रथम मज्जन चारु चीर कुंडल तिलक, श्रवण कुंडल वदन चंदनि लजावै।

सुभग नवकेसरी रतन हट कजरी, अरु अर बंधुक कुंद दसन चमकावै॥

वलय केंकन चारु उरसि राजत हारु, कटि किंकिनी चरन नूपुर बजावै।

हंस कल गामिनि मदन मद कामिनि, नखनि मदयंतिका रंग रुचि राव‍ै॥

निरतंत सागरि रहसि रहसि नागरि नवल, चाँद चालि विविध भेदनि जनाव‍ै।

कोक विद्या विदित भाइ अभिनय निपुन, भू विलासिनी मकर केतनि नचावै॥

निविड़ कानन भवन बाहु रंजित रवन, सरस आलाप सुख पुंज बरसावै।

उभै संगम सिंधु पूरन पूरन बधू, द्रवत् मकरंद हरिवंश अलि पावै॥81॥

पद 82

नागरता की रासि किसोरी।

नव नागर कुल मौलि साँवरौ, वर बस कियो चित मुख मोरी॥

रूप रुचिर अंग अंग माधुरी, बिनु भूषन भूषित व्रज गोरी।

छिन छिन कुसल सुगंध अंग में, कोक रमस रस सिंधु झकोरी॥

चंचल रसिक मधुप मौंहन मन, राखे कनक कमल कुच कोरी।

प्रीतम नैन जुगल खंजन खन, बाँधे विविध निबंघ डोरी॥

अंचन‍ी उदर नाभि सरसी में, मनौं कछुक मदिक मधु घोरी।

(जै श्री) हित हरिवंश पीवत् सुंदर, स‍ौ द्रढ् सुक निग‍मनि की तोरी ॥82॥

पद 83

छाँड़ि‍टे मानिनी मान मन धरिबौ।

प्रनत सुंदर सुघर प्रांनवल्लभ नवल,

वचन आधीन सौं इती कत करिबौ॥

जपत हरि विवस तव नाम प्रतिपद विमल,

मनसि तव ध्यान ते निमिष नहि टरिबौ।

घटति पलु पलु सुभग सरद की जामिनी,

भामिनी सरस अनुराग दिसि‍ द‍रिबौ॥

हौं जु कहति निजु बात सुनि मनि सखि,

सुमुखि बिनु काज धन विरहज दुख भरि वै।

मिलत हरिवंश ‘हित’ कुंज किसलय सयन,

करत कल केलि सुख सिंधु में तिरिबौ॥83॥

पद 84

आजुब देखियत है दो प्यारी रंग भरी।

म‍ौपै न दुरति चोरी वृषभानु की किशोरी;

सिथिल कटि की डोरी, नंद के लालन सौं सूरत लरी॥

मोतियन् लर टूटी चिकुर चंदि का छूटी

रहसि रसिक लूटी गंडनि पीक परी।

नैननिं आलस बस अधर बिंब निरस;

पुलक प्रेम परस हित हरिवंश री राजत खरी॥84॥

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