श्री रासपञ्चाध्यायी
asutosinc@gmail.com
- November 30, 2025
- 1 min read
- 121 Views
श्री रासपञ्चाध्यायी
श्री हरिराम व्यासजी कृत-छन्द-त्रिपदी
सरद सुहाई आई रात। दस दिसि फूलि रही वन जाति। देखि श्याम मन सुख भयौ ।। ससि गो मण्डित जमुना कूल। बरषत विटप सदा फल फूल। त्रिविध पवन दुख दवन है। राधारवन बजायौ बैन। सुनि धुनि गोपिन उपज्यौ मैन। जहाँ तहाँ तें उठि चलीं।। चलत न दीनौं काहु जबाब। हरि प्यारे सौं बाढ्यौ भाव। रास रसिक गुन गाइहौं।॥१॥
घर डर बिसस्यौ बढयौ उछाहु। मन चिन्त्यौ पायौ हरि नाहु। ब्रज नाइक लाइक सुन्यौ । दूध पूत की छाँड़ी आस। गोधन भरता किये निरास। साँच्यौ हित हरि सों कियौ । खान पान तन की न सम्भार। हिलगि छुटायौ गृह ब्यौहार॥ सुध बुध मोहन हरि लई ॥ अञ्जन मञ्जन अंग सिंगार। पठ भूषन सिर छूटे बार। रास रसिक गुन गाइहौं।॥२॥
एक दुहावत तें उठि भगी। और चली सोवत तें जगी। उत्कण्ठा हरि सों बढ़ी। उफनत दूध न धस्यौ उतारि। सीझी थूली चूल्हेँ डारि। पुरुष तज्यौ जैवतहु तें।॥ पय प्याबत बालक धरि चली। पति सेवा कछु करी अनभली। धस्यौ रह्यौ भोजन भलौ।॥ तेल उबटनों न्हैबौ भूल। भाग्यन पाई जीवन मूल। रास रसिक गुन गाइहौं।॥३॥
अञ्जत एक नैन बिसस्यौ । कटि कंचकी लहँगा उर धस्यौ। हार लपेट्यौ चरन सौं ।॥ श्रवनन पहिरे उलटे तार। तिरनी पर चौकी सिंगार। चतुर चतुरता हरि लई ॥ जाको मन मोहन हरि लियौ। ताकौ काह कछु न कियौ । ज्यौं पति सौं तिय रति करै॥ श्यामहिं सूचत मुरली नाद। सुनि धुनि छूटे विषय सवाद। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥४॥
मात पिता पति रोकीं आनि। सही न पिय दरसन की हानि। सबही कौ अपमान कै॥ जाकौ मनुबा जासौं अटक्यौ। रहै न छिनहू ता बिनु हटक्यौ। कठिन प्रीति कौ फन्द है। जैसे सलिता सिंधुहि भजै। कोटिक गिरि भेदत नहिं लजै। तैसी गति इनकी भई। एक जु घर तें निकसी नहीं। हरि करुणा करि आये तहीं। रास रसिक गुन गाइहौं।॥५॥
नीरस कवि न कहैं रस रीति। रसिकहि लीला रस परतीति। यह सुख शुक-मत जानवौ ॥ ब्रज वनिता आईं पिय पास। चितवन सैनन भृकुटि विलास। हँसी बूझी हरि मान दै। नीकें आईं मारग माँझ। कुल की नारि न निकसें साँझ। कहा कहाँ तुम जोग्य हौ। ब्रज की कुशल कहौ बड़ भाग। क्यौं तुम आईं सुलभ सुहाग। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥६॥
अजहूँ फिरि अपने गृह जाहु। परमेश्वर करि मानौं नाहु। वन में बसिबौ निसि नहीं।॥ वृन्दावन तुम देख्यौ आइ। सुखद कुमुदनी-प्रफुलित जाइ। जमुना जल सीकर वने॥ घर में जुवती धर्महि फबै। ता बिनु सुत पति दुखित जु सबै। यह रचना बिधिना रची ॥ भरता की सेवा सुख सार। कपट तजे छूटै संसार। रास रसिक गुन गाइहौं।॥७॥
वृद्ध अभागौ जो पति होइ। मूरख रोगी तजै न जोड़। पतित अकेलौ छाँड़ियै ।। तजि भरता रहि जारहि लीन। ऐसी नारि न होइ कुलीन। जस विहुँन नर्कहि परै ॥ बहुत कहा समझाऊँ आज। मोहू गृह कछु करनौ काज। तुम ते को अति जान है। पिय के बचन सुनत दुख पाइ। व्याकुल धरनि परीं मुरझाइ। रास रसिक गुन गाइहौं।॥८॥
दारुन चिन्ता बढ़ी न थोर। कूर बचन कहे नन्द किसोर। और सरन सूझै नहीं। रुदन करत बढ़ी नदी गंभीर। हरि करिया बिनु को जानै पीर। कुच तुग्बिन अबलम्ब दै। तुम हरि बहुत हुती पिय आस। बिन अपराधहि करत निरास। कितव रुखाई छाँड़ि दै॥ निठुर बचन बोलहु जिनि नाथ। निज-दासी जिनि करहु अनाथ। रास रसिक गुन गाइहौं।॥९॥
सुख देखत सुख पावत नैन। श्रवन सिरात सनत कल बैन। तब चितबन सर्वसु हस्यौ मन्द ॥ हँसत उपजायौ काम। अधर सुधा दै करि बिश्राम। वरषि सींच विरहानलै ।। जब तें पिय देखे ये पाँइ। तब तैं हमें न और सुहाइ। कहा करें ब्रज जाइ कैं ।। सजन कुटुम्ब गुन रही न कानि । तुम बिमुखै पिय आतम हानि। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥१०॥
तुम हमकौं उपदेशो धर्म। ताकौ हम जानत नहिं मर्म। हम अबला मति हीन सब॥ दुख दाता सुत-पति गृह-बन्धु। तुम्हरी कृपा बिनु सब जग अन्ध। तुम सौं प्रीतम और को॥ तुमसों प्रीति करहिं ते धीर। तिनहिं न लोक वेद की पीर। पाप पुण्य तिनकै नहीं।। आसा पासि बँधी हम लाल। तुम विमुखे है है बेहाल। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥११॥
बैनु बजाइ बुलाई नारि। सिर धरि आईं कुल की गारिः। मन मधुकर लम्पट भयौ। सोई सुंदर चतुर सुजान। आरज पन्थ तजै सुनि गान। तो देखत पुरुषौ लजै ॥ बहुत कहा बरनैं यह रूप। और न त्रिभुवन तरुन अनूप। बलिहारी या रूप की ।। सुनि मोहन बिनती दै कान। अपयस है कीन्हे अपमान। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥१२॥
बिरद तुम्हारौ दीन दयाल। कुच पर कर धरि कर प्रतिपाल। भुज दण्डन खण्डहु विथा ।। जैसे गुनी दिखावै कला। कृपन करें नहि हलहू भला। सदय दहय हम पर करहु ॥ ब्रज की लाज बड़ाई तोहि। सुख पुजवत आई सब सोहि। तुमहीं हमरी गति सदा।। दीन बचन जुवतिन तब कहे। सुनि हरि नैनन नीर जु बहे। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥१३॥
हरि बोले हँसि ओली ओड़ि। करजोरे प्रभुता सब छोड़ि। हौ असाधु तुम साधु हौ। मो कारन तुम भईं निशंक । लोक बेद वपुरा को रंक। सिंघ सरन जम्बुक ग्रसै ।। बिनु ढामन हौं लीनौ मोल। करत निरादर भई न लोल। आबहु हिल मिल खेलिये।। मिलि जुवतिन घेरे ब्रजराज। मनहुँ निसाकर किरन समाज। रास रसिक गुन गाइहौं।॥१४॥
हरि मुख देखत फूले नैन। उर उमगे कछु कहत बनैन। श्यामहि गावत काम वस ।। हँसत हँसावत करत उपहास। मन में कहत करौ अब रास॥ गहि अंचल चंचल लच्यौ ।। लायौ कोमल पुलिन मँझार। नख सिख नटबर अंग सिंगार। पट भूषन जुवतिन सजे। कुच परसत पुजई सब साध। सुखसागर मन बढ्यौ अगाध। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥१५॥
रस में विरस जु अन्तरधान। गोपिन के उपज्यो अभिमान । बिरह कथा में कौन सुख । द्वादस कोस रास परमान। ताकौ कैसे होत बखान। आस पास जमुना झिली।। तामहि मान सरोवर ताल। कमल बिमल जल परम रसाल। खग मृग सेवें सुख भरे ॥ निकट कलपतरु वंशीवट। श्रीराधा रति गृह कुंजन अटा। रास रसिक गुन गाइहौं।॥१६॥
नव कुंमकुंम जल वरषत जहाँ। उड़त कपूर धूरि जहाँ तहाँ।। और फूल-फल को गने ॥ जहाँ श्यामघन रास जु रच्यौ। मर्कत मति कंचन सौं खच्यौ। शोभा कहत न आवही ।। जोरि मण्डली जुवतिन बनी। द्वै-द्वै बीच आप हरि धनी। अद्भुत कौतुक प्रकट कियौ ॥ घूँघट मुकुट विराजत सिरन । ससि चमकत मनों कौतिक किरन । रास रसिक गुन गाइहौं।॥१७॥
मनि कुंडल ताटंक विलोल। विहसत सज्जित ललित कपोल। नकबेसर नासा वनी ॥ कण्ठसिरी गज मोतिन हार।। चचर चुरी किंकिनी झनकार। चौकी दमकै उरजन लगी। कौस्तुभ मनि तें पीतहि जोति। दामिन हू तैं दसनन दोति। सरस अधर पल्लब बने॥ चिबुक मध्य अति साँबल बिन्दु । सबन देख रीझे गोबिंद। रास रसिक गुन गाइहौं।॥१८॥
नील कंचुकी माँडन लाल। भुजन नबैया उर वनमाल पीत पिछौरी श्याम तन ।। सुन्दर मुंदरी पहुँची पानि। कटि तट कछनी किंकिनि बानि। गुरु नितम्ब बैंनी रुरै ।। तारामंडल सूघन जघन। पाइन पैंजन नूपुर सघन । नखन महाबर खुलि रह्यौ।॥ श्रीराधा मोहन मण्डल माँझ । मनहुँ विराजत सन्ध्या साँझ । रास रसिक गुन गाइहौं ।॥१९॥
सधन विमान गगन भरि रह्यौ । कौतिक देखन जग उमह्यौ। नैन सफल सब के भये । वाजत देवलोक नीसान। बरषत कुसुम करत सुरगान। सुर-किन्नर जै धुनि करें। जुवतिन बिसरे पति-गति देखि। जीबन जनम सुफल करि लेखि॥ यह सुख हमकौ है कहाँ ।। सुन्दरता गुन-गुन की खान। रसना एक न परत बखान। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥२०॥
उरप लेत सुन्दर भामिनी। मानौ नाचत घन दामिनी। या छबि की उपमा नहीं। राधा की गति पिय नहिं लखी। रस सागर की सीवाँ नखी। बलिहारी या रूप की ॥ लेत सुघर औघर में मान। दै चुंबन आकर्षत प्रान। भेटत मेटत दुख सबै।राखत पियहि कुचन बिच बान। करबाबत अधरामृत पान। रास रसिक गुन गाइहौं।॥ २१॥
भूषन बाजत ताल मृदंग। अंग दिखावत सरस सुधंग। रंग रह्यौ न कह्यौ परै॥ कंकन नूपुर किंकिनि चुरी। उपजत धुनि मिश्रित माधुरी। सुनत सिराने श्रवन मन॥ मुरली मुरज रबाब उपंग। उघटत शब्द बिहारी संग। नागर सब गुण आगरौ।। गोपिन मण्डल मण्डित स्याम। कनक नीलमनि जनौं अभिराम। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥२२॥
पग पटकत लटकत लट बाहु। भौंहन मटकत हँसत उछाहु। अंचल चंचल भूमका॥ मनि कुण्डल ताटंग बिलोल। मुख सुख रासि कहैं मृदु बोल। गण्डन मण्डित स्वेद कन।। चोरी डोरी विगलित केश। घूमत लटकत मुकुट सुदेस। कुसुम खिसे सिर तें घने ॥ कृष्णबधू पावन गुन गाइ। रीझत मोहन कंठ लगाइ। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥२३॥
हरषित बैन बजायौ छैल। चन्दहि बिसरी घर की गैल। तारागन मन में लजे॥ मोहन धुनि बैकुण्ठहि गई। नारायण मन प्रीत जु भई। बचन कहत कमला सुनौ। कुंज बिहारी विहरत देख। जीबन जनम सफल करि लेख। यह सुख हमकौं है कहाँ॥ श्री बृन्दाबन हमते दूर। कैसे कर उड़ि लागै धूर। रास रसिक गुन गाइहौं।॥२४॥
धुनि कोलाहल दस दिस जात। कलप समान भई सुख रात। जीब जन्तु मैमन्त सब ।। उलटि बह्यौ जमुना कौ नीर।बालक बच्छ न पीवत छीर। राधा रवन ठगे सबै । गिरिबा तरुवर पुलकित गात। गोधन थन तै दूध चुचात। सुनि खग मृग मुनि ब्रत धस्यौ। फूली मही फूल्यौ गति पौन। सोवत ग्वाल तजे नहिं भौंन। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥२५॥
राग रागिनी मूरतबन्त। दूलह दुलहिन शरद बसन्त कोक कला संगीत गुरु ।। सप्त स्वरन की जाति अनेक । नीके मिलवत राधा एक। मन मोह्यौ हरि कौ सुघर ।। चन्द ध्रुवन के भेद अपार। नाँचत कुँवरि मिलै झपतार। सबै कह्यौ संगीत में।। सरस सुमति धुनि उघटत शबद। पिकन रिझावत गावत सुपद। रास रसिक गुन गाइहौं।॥२६॥
श्रमित भई टेकत पिय अंस। चलत सुलप मोहे गजहंस। तान मान मुनि मन थके ॥ चन्दन चर्चित गोरे बाहु। लेत सुवास पुलकित तन नाहु। दै चुंबन हरि सुख लह्यौ ।। साँवल गौर कपोल सुचारु। रीझ परस्पर खात उगारु। एक प्रान द्वै देह हैं। नाँचत गावत गुन की खान। राखत पियहि कुचन बिच बानि। रास रसिक गुन गाइहौं।॥ २७॥
अलि गावत पिक नादहि देत। मोर चकोर फिरत संग हेत। घन रु जुन्हाई हैं मनौ।।॥ कुच-कच-चिकुर परसि हँसि स्याम। भौंह चलत नैनन अभिराम। अंगन कोटि अनंग छबि ।। हस्तक भेद ललित गति लई। पट भूषन तन की सुध गई। कच बिगलित बाला गिरी। हरि करुना करि लई उठाई। श्रमकन पौंछत कंठ लगाइ। रास रसिक गुन गाइहौं।॥२८॥
तिनहिं लिवाय जमुन तट गयौ। दूरि कियौ श्रम अति सुख भयौ। जल में खेलत रंग रह्यौ । जैसे मद गज कूल बिदार। जैसें खेल्यौ संग लै नार। शंक न काहू की करी ॥ ऐसें लोक वेद की मैंड। तोरि कुँवर खेल्यौ करि अँड। मन में धरी फबी सबै॥ जल-थल क्रीडत बीडत नहीं। तिनकी लीला परत न कही। रास रसिक गुन गाइहौं ।॥२९॥
कह्यौ भागवत शुक अनुराग। कैसे समझें बिनु बड़भाग। श्री गुरु सुकल कृपा करी ।। ‘व्यास’ आस करि बरनै रास। चाहत है वृन्दावन बास। करि राधे इतनी कृपा।। निज दासी अपनी करि मोहि। नित प्रति श्यामा सेऊँ तोहि। नव निकुंज सुख पुञ्ज में।। हरिवंशी-हरिदासी जहाँ। मोहि करुणा करि राखौ तहाँ। नित्य विहार अधार दै। कहत सुनत बाढ़े रस रीति। श्रोतहि वक्तहि हरि पद प्रीति। रास रसिक गुन गाइहौं।॥३०॥
राग केदारौ-
स्याम नटुवा नटत राधिका संगे। पुलिन अद्भुत रच्यौ रूप गुन सुख सच्यौ, निरखि मनमथ बधू मान भंगे।॥ तत्त थेई थेई मान सप्त सुर पट गान, राग रागिनी तान श्रवन भंगे। लटकि मुँह मटकि पद पटकि पट झटकि हँसि बिविध कल माधुरी अंग अंगे ॥ रतन कंकन क्बनित किंकिनी नूपुरा, चर्चरी ताल मिलि मनि मृदंगे। लेत नागर उरप कुँवरि औघर तिरप व्यासदासी सुघर वर सुधंगे॥३१॥
राग गौरी-
पखाबज ताल रबाव बजाइ। सुलप लेत दोऊ सन्मुख मुख मुसिकत नैन चलाइ॥ पद पटकन नूपुर किंकिनि धुनि सुनि नवेरी जाइ। उरप मान मँह तिरप मान लै, सुर बंधान सुनाई। देशी सरस सुधंग सुकेसी नाँचत पियहि रिझाइ। काम बिवस स्यामहि तकि स्यामा रवकि कंठ लपटाइ ॥ गुन सागर की सीर्वा उमगी कबि न छबिहि कहि जाइ। व्यास स्वामिनी कौ सुख सर्वसु लूटत मोहन राइ॥३२॥
श्रीध्रुबदासजी कृत-राग केदारौ-
खेलत रास प्रेम रस भीनें। ललन बसन प्यारी के पहिरे, प्यारी बेष प्रीतम कौ कीनें ॥ मंग सुरंग रही फबि सजनी, झल कन मुकुट कहत नहिं आवै। कुंडल खुभी अरुन सारी तन, गौरांबर अतिही छवि पावै ॥ अति आनंद बिकच मन दोऊ लटकन अंग ललित सुखदाई। काछिनी सुदेस किंकिनी सोभित, उर बनमाल रही बनि माई। सहचरि एक लिये कर बीना, एकन सुभग मृदंग सज्यौरी। एकही ताल उठत भूषण धुनि, बाढ्यौ रंग अनंग लज्यौरी ॥ नाँचत अंग सुधग लियें दोऊ, गावत राग मिलै स्वर गौरी। अति नागर लावन्य सिन्धु में, भृकुटिन भाव बढ़त छिन सौ-री ॥ थेई-थेई कहत मंद गति लीयें, चलत सुलप प्रीतम पिय प्यारी। ललिताहि साखि दै-दै पुनि बिच-बिच लाग लेत दोऊ बदि-बदि बारी॥ सुंदर मुख कमलन पर सोभित, श्रम जल कें अलके झलकारी। या सुख कौं छबि निरखि-निरखि कैं, हित ध्रुब सब सहचरि बलिहारी॥३३॥
राग सारंग-
बंशीबट मूल खरे दंपति अनुराग भरे, गावत हैं सारंग पिय सारंग वर नैनी। उमहि कुँवरि करत गान सिखवत पिय विकट तान, सप्त स्वर सौं मधुर-मधुर लेत कोकिल बैनी । चित्रित चंदन सुअंग भूषण फूलन सुरंग, दसन बसन सहज रंग बेसर छबि दैनी। लसत कंठ जलज माल झलक स्वेद कन रसाल, दीरघ बर लोचन मषि रेख बनी पैनी ।। चहुँ दिशि सखियान भीर सकल प्रेम रस अधीर, उभय रूप राग रंग सुख अभंग लैनी उमड्यौ जल प्रेम नैन रहित भए रसन बैन, इहि गति रहौ मत्त चित्त हित ध्रुब दिन रैनी ॥३४॥
राग गौरी-
नवल लाल संग बाल निर्त्तत गति चंदचाल, मोहित भये शिखि मराल छबि निहारि री। गावत स्वर एक ताल भूषण रव अति रसाल सुनत श्रवन मृगज पवन थकित वारि री ॥ लटकत सब अंग-अंग होत नैन मैन पंग, श्रम जल कन बदन बने रुचिर चारु री। बाढ्यौ रस रति अपार नवल कुँवर विवि उदार, निरखत ध्रुब सहचरि हित नित बिहारु री ॥३५॥
श्रीनागरीदासजी कृत-राग चर्चरी-
उघरि मुख मुसकि मृदु ललित करताल दै, सुरत तांडब अलग लाग लीनी। बिविध बिधि रमत रति देत सुख प्रान पति, छामु कटि किंकिनी कुनित कीनी। उरष तिरपन लेत सरस आलाप गति, मुदित मद देंन मधु अधर दीनी। अमित उपजन सहित सार सुख संचि रति भाम हिय लसत रमि रंग भीनी। स्वाद चौपन चढ़ी लाल लाड़न लड़ी, अवनि दुति तड़ित घन छबि सुछीनी। कोक संगीत गुन मथन की साधुरी नागरीदास अलि दूगन भीनी ॥३६॥
राग चर्चरी-
विलसत लसत पानिप अंग। गज सु क्रीड़ा रत कुँवर दोऊ नचत सुरत सुधंग।। लोल कुंडल गंड मंडित, भाव भृकुटी भंग। अधर दसन सहास मृदु मुख, लसत विवि वर रंग।। मुक्तमाल सुढार उर पर, दिपत उरज उतंग। किंकिनी कल कुनित श्रवनन, उदित कोटि अनंग ॥ तलप सुरत किशोर कोमल, लई कुँवरि उछंग। दासनागरी कच सँबारत, करन बिथुरी मग॥३७॥
राग केदारौ-
अद्भुत कौतुक निर्त्तत होत है। कुँवर किशोर रंग रचि माते, उमड़त पानिप प्रेम पोत है। कुंडल लोल ललित नासा मणि, छबि समूह मुख हास उदोत है। बिंब अधर स्याम दसनाबलि, जगमगात अति ललित श्रोत है। झमकत हार उरज श्री फल बिच, लचक छाम कटि गतिन गोत है। नागरीदास विलास अकह गति सौरभ सत सद मदन भौत है।॥३८॥
दीनें गरवाहीं गति लेत डोले मंडल में बोलें तत्ता थेई थेई मुख रूप ललकें। हैं गये विवस मन श्रमित भये री तन, खिसे फूल सीस तें सिथिल भई अलकें।॥ इत किंकिनी छूटी उत बनमाल टूटी, लोल हार कुंडल कपोल झाईं झलकें। नागरीदास राधामोहन नचत देखि भूली सखी गान तान लागत न पलकें ॥
रास मंडल मध्य छवि छके स्यामा स्याम, लेत गति लपटि पलटि जात भरे रंग। गान धूनि नूपुर रह्यौ है रंग पूर तैसी मधुर मधुर बीना बाजत मृदंग ॥ चंद्रिका सिथिल इत मुकुटि झुकौंही होत, है गये विवस रस सुध न रही है अंग। नागरीदास गति नैनन की भई पंग, मुरझि गिस्यौ है रति सहित अनंग ॥३९॥
राग चर्चरी-
मुकुट वर्द्धन कुँवरि रास मण्डल लसी। कसूँभी तन कंचुकी पचरंग काछिनी नील उपरैनी कल किंकिनी कटि कसी। अंग अंग रंग उदित मुदित मुख माधुरी दसन दुति बंक अवलोकि ईषद हँसी। लाल लोभी ललक अधर मधु पान की, वारि तृन तोरि लै अंक भरि उर गसी । कोक गंभीर गुन नेह नव-नव निपुन, कोक कोबिद दोऊ मनन अति रति बसी। नागरीदासन हास उकति गतिन हुलास, सुविलास जोरी सरस रास रस रसमसी ॥४०॥
श्रीदामोदर स्वामीजी कृत-पद-
रसिक बर बंदिनी मधुर सुर गावै । नवल अद्भुत तान ताल समान गति बिविध भेदन भृकुटि नैंनन नचावै॥ धरनि पर पद धरत मोहनहि चकित है निरखि छबि सिंधु रस रूप प्यावै। सुलप अति लेत गति बजत नूपुर सरस सुनत रब बिवस हरि प्राणपति भावै॥ मंद सस्मित बदन अधर सोभा रदन हरखि प्रिय परखि सुख मोदन बढावै। बिसद कल केलि बर बेलि रंजित रबन भवन बृन्दाबिपिन सुखहि बरषावै। कुचन परषत हँसत लाल हिय में बसत लसत मनि कनक दुति काम उपजावै। रहसि प्रीतम मिले जुग्म अंग-अंग झिले ललित हित दास दामोदर तुमहि ध्यावै ॥४१॥
माई रंग भरे डोलें । रास मंडल मध्य दोऊ थेई-थेई-थर्ड बोलें। बदन सोभा सदन चारु श्रवन कुंडल लोलें। चमके घन दामिनी से नील-पीत निचोलें ।॥ अंग तमक दुति की दमक उठत रूप अलोलें।। मंद हास भ्रू बिलास बस करें बिन मोले। रीझि-रीझि अंग भरें होत पल न ओले। हित दामोदर प्रेम पगे आनन्द सिंधु कलोलें ॥४२॥
आज बनराज दोऊ रसिक वर राजैं। गौर अभिराम तन स्याम सुख धाम सखी देखि घन तडित रति काम लाजैं। विकच घन विटप कल फूल बल्ली हरित हेत सौं लपटि बनी बृन्द सोभा। मंजु गुलार सों भ्रमत भृंगाबली सरसि सरसिज बिकसि गन्ध लोभा ।। सर्वरीराज नहिं खण्ड मण्डल गगन किरण कुल अमल वन मध्य छाई। प्रेम तन-मन सने मध्य दोऊ बने रास मण्डल जुवति एक दाईं। चरन नूपुर बजत कटि सुकिंकिनी नदत चलत कर कंज कंकन सुहाए। अंग चल चारु उर हार चल कंचुकी उघटि पिय शब्द संगीत गाए। मुकट कबरी लटक मटकि भृकुटी ललित चपल दूग मीन मृग छबि जु हारी। दंत की पंक्ति दुति कुन्द कलिका लजत बदन उड़राज दुति मन्दकारी ॥ गान कल तान रस बान रतिराज दिये लगे खसि चाप कर सुद्धि भूली। पत्र रथ मौन धरि रहे मुनि जूथ जुत मगन सब बिश्ब बिधि सहित शूली ॥ निर्त्त गुन रूप रस हेत आनन्द सुख लह्यौ अति रंग नहिं कह्यौ आवै ॥ चित्त हिय हरखि दामोदर हित सदा धन्य सो रसिक इहि रसहि गावै ॥४३॥
ब्रज जुबति मंडनी राजत राधिका रस रंग भरी, रूप रासि गुन समुद्र लाल भावनी। तान मान गति बिलास उरप तिरप लास रास, भृकुटि भंग चपल अंग मधुर गावनी ।। गूँथित सखी सुमन केस संग सीप सुत सुदेश, झलक तिलक कल कपोल दृग चलाबनी। राजत राकेस बदन दाड़िम सम चमक दसन, सोभा सुख सदन मदन मद नसावनी ॥ प्यारौ लाल देत ताल चुटकी दै दृग बिशाल थेई-थेई भेद उधटि सुख बढावनी। अरुन बरन कंचुकी चल फरहरात नील अंचल, चंचल उर हारु चारु छबि सुहाबनी। कंकन कर रब सुदेस किंकिनी कल कटि प्रदेश, चरन कमल नूपुर छबि सों बजावनी। बाढ्यौ सखि अति आनंद गगन मगन भयौ चन्द, विथकित जड़ जंगम द्रुम जल बहावनी ॥ दुरन मुरन छीन लक रीझि-रीझि भरत अंक, परसि अंग-अंग स्याम हिय सिरावनी। दामोदर हित बिलास यह बिधि प्यारी खेल रास, बैठीं कुंज कुसुम सेज पिय रमाबनी॥४४॥
नाँचत आनन्द धाम सुख निधान स्यामा स्याम थेई-थेई उच्चार चारु बदन सो हैं। लेत कुँवरि अलग लाग गावत पिय ललित राग वाढ्यौ अनुराग देखि कोटि मैन मो हैं। बाम कर सौं वाम जोरि दक्षिन सौं दक्षिन कर चरनन ढिंग चरन चारु सन्मुख दोऊ जो हैं। भ्रमत लाल चक्र लोल फरहरात बर निचोल, हित दामोदर उपमा कौं दामिनि घन को हैं।॥४५॥
भज मन रास रसिक किशोर। गौर स्यामल सकल गुन निधि चतुर चित के चोर॥ सुभग मण्डल पर बिराजत जुगल सुन्दर बेष। बसन भूषन जगमगैं अति अंग-अंग सुदेस ।। चारु चरन सदेस निर्मल गति विलास विनोद। पदन पटकत नखन दमकन होत नव-नव मोद॥ जोरि कबहूँ कर परस्पर बदन सन्मुख चारु। घन घटा से चलत दोऊ भ्रमत करत बिहार।। मुकुट कबरी लटक भृकुटी मटक मधुरी दास। हरषि बरषत रंग भीनौं हित दामोदर दास ॥४६॥
पद-
वृन्दावन सुन्दरघन फूल बन्यौ बरन-बरन, रास रच्यौ सुभग तीर भानु नन्दिनी। नव मृदंग नवल ताल नवल बसन नवल माल, नवल लाल नवल बाल आनंद कंदिनी। नवल तान नव बंधान नवल स्वर सौं गान जान, नवल उरप तिरप मान नवल चंदिनी। दामोदर हित सु चारु देखरी यह नव बिहार, जोरी पिय गोरी रति राज बंदिनी ॥४७॥
पद-
निर्त्तत राधिका भरी रंग। वदत छिन छिन सुख सहेली, नवल लालन संग।। बिविध गुन गम्भीर उपजत हाव भाव तरंग। थेई-थेई उच्चार मुख विधु, चलत नैन कुरंग।। गूँथि सुमन सुदेस कबरी। झलक मोती मंग। ललित श्रवन सुलोल कुंडल कुटिल भृकुटि भंग।। बनी मंजुल उर उजागर कंचुकी जु सुरंग। नील सारी पहरी प्यारी, कला कुशल अनंग।॥ उरप तिरप सु लेत सुन्दरि, दमक जीवन अंग। रीझि प्यारौ हित दामोदर, भरी प्रेम उछंग ॥४८॥
पद-
आज सखी राधिका रंग भरी राजै। रसिक वर वन्दिनी रबनि कुल मण्डली, रसिकनी रास मंडल विराजै ॥ कुसुम कल मल्लिका गुँथी धम्मिल्लिका, मंग सिंदूर रँग लगत नीकौ। करण कुंडल ललित नील अंबर सुभग, झलक सिर फूल सखि मालती कौ। चंद-सौ वदन वर कंज से नैन विवि, भंग-सी भृकुटि चल चारु सोहै। नासिका कीर सी बिंब से अधर बर, सीधु से वचन सुनि स्याम मो है। रूप की बेलिसी उरज फल से फले, जलज कल कन्द सी भुज सुहाई। सकल सुख रासि पिय प्रेम हुल्लासिनी, माधुरी चातुरी एक ठाई। केलि रस सिंधु कल्लोलिनी गुन भवन, विपिन रानी रवन मोदकारी। जयति जै जयति दामोदर हित हित बनी, अचल बन भूमि जोरी विहारी ॥४९॥
राग मारु-
आजु रास रंग रह्यौ। हरि राधा खेलत रस प्रेम सिंधु बह्यौ । नैन चलन करन चलन चरन चलन आछें। पिय के सिर मुकुट लटक बैनी प्यारी पाछें।॥ किंकिनी कटि चारु हार नूपुर रव सोहै। मुरली धुनि श्रवणन सुन सु को जो न मो है। पिघरे तरु पाइन सुनि सलिता जल थाक्यौ। चन्द भयो गगन मगन नैकु न रथ हाँक्यौ। निर्त्त भेद राग रंग परतु कापै कह्यौ। हित दामोदर ललितादिक नैनन सुख लह्यौ ॥५०॥
५२
वर्षोत्सव तृतीय खण्ड
राग हमीर-
आजु सखि मुरलिका अधर चढ़ि राजी। कृष्ण कुल रसिक पति ललित कर कंज विवि, विश्व जित सप्त स्वरयुक्त बाजी॥ थकित मन्दार मिलि मन्द सीकर पवन, श्रवन सुनि मधुर धुनि धुनी थाकी। धीर तजि धरनिरुह निकर निर्झत झरत, अन्य चैतन्य सुध रहत काकी॥ वंश वर हंस धुनि अंस व्यापी जगत, तिमिर धृत मान मन विगत ठाँ ठाँई। वृंद निर्जर वधू सुनत रतिराज वस सिथिल तन चीर भरि नैन आई॥ चन्द गति मन्द सुनि भग्न युत मग्न भव चकित वृन्दारका’ जानि भूमैं। सिद्ध तप धीर जे साधि कैं जोग बिधि, ब्रह्म में मग्न मुनिचित्त घूमैं। सरस सुर वाम अभिराम धरि ताल तब, आलि कुल मंडनी राधिका प्यारी। कियौ कल गान मधु तान बंसी थकी, रीझि रस भीजि उर लाल धारी ॥ अंग-अंग पुलक सुख नैन जल झलमले, दलमले काम दल रास रानी। दामोदर हित महा रंग अद्भुत बढ्यौ, तलप पर अलप कटि केलि ठानी॥५१॥
राग भैरब-
अद्भुत नट भेष धरे नाँचत गिरधरन लाल, उघटत संगीत तत्त थेई-थेई ताधे। लेत उरप तिरप मान लाग डाट सुघर तान, आन आन गुण गननन गति बंधान साधे। शरद निसा पूर्ण चंद त्रिबिध बायु बहत मन्द, खग मृग द्रुम बेलि पत्र रटत राधे-राधे। जुबती मंडल समूह राग रंग अति कौतूह, राधा कृष्ण हित दामोदर चरण अम्बुज आराधे॥५२॥



