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Padawali Utsav

मंगला आरती के पद

  • November 30, 2025
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मंगला आरती के पद
मंगला आरती के पद

अष्ट्यम सेवा –  मंगला आरती के पद

राग भैरौ-

मंगल अद्भुत राजत दम्पति। मंगल रूप रासि सुख संपति ।। मंगल वृन्दावन घन कुंज। मंगल सहचरि आनंद पुंज।। मंगल श्री जमुना रस वारि। मंगल पुष्प भँवर गुंजार ।। मंगल भोग मंगल उदगार। मंगल षट रस मंगल थार ।। मंगल ताल मृदंग बजावैं। मंगल सखी युगल गुण गावैं॥ मंगल दुन्दुभी ध्वनि झालरी। मंगल अलिगण आरति करी॥ मंगल ललितादिक तहाँ ढोरें। मंगल चॅवर लिये चहुँ ओरे॥ मंगल जय-जयकार रसाल। मंगल नित्त करें वर बाल ॥ मंगल रसिक उपासक धीर। मंगल ब्रज जुवतिन की भीर ॥ मंगल श्री हरिवंश उदार। जै श्रीहित हरिलाल रूप उर धार ॥१॥

राग भैरौ-

राजत झल्लरी झनकार। करत मंगल आरती सखी हाथ कंचन थार ॥ विलसि निसि सुख सेज बैठे अलस लोचन चार। मरगजे अम्वर बने तन टूटि छूटे हार।। मुदित तन मन सहचरी जन खरीं कुंज दुआर। जाहि बलि-बलि हित दामोदर देखि रूप अपार ॥२॥

राग भैरो-

नेह भरी मंगल आरती। मंगल चहुँ दिसि जै भारती॥ मंगल बाजे बाजत संग। मंगल ही
बरसत रस रंग।। मंगल गान करत सब सखी। मंगल बरषा अद्भुत लाी॥ मंगल वरणों कौतुक कुंज। जाकौं सेंवत आंनद पुंज॥मंगल शोभित हैं बन थली। मंगल पूरित सौरभ भली ॥ मंगल शुक पिक सारो हंस। मंगल यश को करत प्रशंश ॥ मंगल दंपति हित हिय गंश । मंगल दरसत अलि हरिवंस ॥ मंगल तरु वेली छवि देत । मंगल रविजा लहरनु लेत ॥ मंगल बारत पुहुपावली। मंगल विधि निर्त्तत सब अली। मंगल भूषण वसन अनूप। गौर स्याम दोऊ मंगल रूप॥ वृन्दावन हित मंगल मई। इहि मंगल लखि हों बलि गई॥३॥

राग भैरौ-

लखि मंगल आरति मनि मई। मंगल जै जै बानी भई॥ मंगल यह पियरी की बार। मंगल पंछी करत उचार ॥ मंगल रूप सकल सहचरी। मंगल गान करत रस भरी ।। मंगल ताल तान गति लेत। मंगल उमँगि चल्यौ हिय हेत ।। मंगल बदन जगमगे प्रात। मंगल मनु फूले जल जात ।। मंगल भूषन दूति बढ़ि चली। मंगल दिपत कुंज बन गली ॥ मंगल तरु बेली फल फली मंगल अवनी शोभित भली ।। मंगल बहत तरनिजा नीर। मंगल परसत त्रिविध समीर। मंगल शोभित रति आगार। मंगल राजत युगल कुमार। मंगल मय मंगल जु अनन्त। गौर स्याम मूरति रस वंत ॥ बलि हित रूप प्रेम की आरति। वृन्दावन हित दृगन उतारत ॥४॥

राग भैरौ-

मंगल जोरी मंगल आरति। मंगल सहचरि मुदित उतारत॥मंगल गौर स्याम अति जोति। मंगल जोति वर्तिका होत।। मंगल सुभग सुधा द्वै सोत। मंगल जिततित सदन उदीत ।। मंगल लहर तरनिजा बढ़ी। मंगल बानी सुक पिक पढ़ी।। मंगल धुनि बाजनु ते कढ़ी। मंगल बेली विटपन चढ़ी।।मंगल बन संपति कौ धरें। मंगल बहु अवनी विस्तरें।॥ मंगल सब इहि मंगल ररैं। मंगल गान सहेली करें। मंगल मोर हंस मंडली। मंगल निर्त्त करत विधि भली ॥ मंगल गुंज मधुप रंग रली। मंगल ये सोभित बन गली ॥ मंगल सुरत भवन यह लसै। मंगल रसना बरषत यसै । मंगल मिथुन रहसि कौं रसैं। वृन्दावन हित के उर बसें ॥५॥

राग भैरौ-तालमूल

मंगल जोरी मंगल अली। सजि लाई आरति विधि भली ॥ टेक ॥ मंगल रचना परत न कही। मंगल जै धुनि पूरि जु रही। मंगल कानन मंगल मही। मंगल रविजा लहरिनु वही ॥१॥ मंगल झालर झाँझ मृदंग। मंगल अलि गावत मिलि संग।। मंगल गौर स्याम अँग-अँग। मंगल दरसत बरसत रंग।॥२॥ मंगल दंपति की रजधानी। मंगल संपति परै न बखानी।। मंगल उचरत हैं खग बानी। यह मंगल नित-नित सुख दानी॥३॥ मंगल मूरति मनु जुग हंस। मंगल भुजा परस्पर अंस।। या मंगल की करी प्रसंस। मन-क्रम-वच करि श्रीहरिवंश॥४॥ वृन्दावन हित रूपी धाम । लोक मुकट मणि अति अभिराम ।। मंगल पूरित आठौ जाम। जहाँ रस विलसत स्यामा स्याम ।। ५॥६॥

राग भैरौ-तालमूल

मंगल आरति साजी सजनी। जुगल प्रेम गरुवे की भजनी ॥ टेक ॥ प्रथम भई मंगल जय बानी। मंगल रविजा तीर रवानी मंगल बाजेनु ध्वनि मन मानी। मुदित लाल सुनि कानन रानी ।। जोति वर्तिका जगमग करनी। अधिक लसी तन चंपक बरनी ॥ आनंद के मन आनंद भरनी। वरवस रसिक लाल मन हरनी। यह आरति मंगल कौ मंगल। जा करि शोभित भयौ कुंज थल ।। थिरचर मुदित मानि मंगल भल। मंगल गावत सखी कंठ कल ।। गौर-स्याम हित रूप जु चहौ। वृन्दावन हित यह व्रत गहौ। रसिक सुमति मंगल जश कहौ। यह समाज सुख अविचल रहौ ॥७॥

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